Mantra.Tips
bhagavad-gitagitakrishnavibhuti-yoga

श्रीमद्भगवद्गीता १०.२१ — आदित्यानामहं विष्णुः

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातःकालीन ध्यान, सूर्योदय के समय, अथवा सूर्य और चन्द्रमा के तेज का चिन्तन करते हुए·📜 Bhagavad Gita Chapter 10, Verse 21

अन्य नाम / खोज: adityanam aham vishnur · adityanam aham vishnu · bhagavad gita 10.21 · gita 10 21 · jyotisham ravir anshuman · among the adityas i am vishnu gita verse

Share:

अर्थ

यह श्लोक दसवें अध्याय — विभूति योग — में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य विभूतियों की महान् सूची का आरम्भ करता है। वे प्रत्येक वर्ग में सर्वाधिक तेजस्वी सत्ता की ओर संकेत करते हैं — आदित्यों में विष्णु, ज्योतियों में सूर्य, नक्षत्रों में चन्द्रमा — और अर्जुन को सिखाते हैं कि जो भी सबसे महिमामय और तेजोमय है उसमें परमात्मा को पहचानें। इनका चिन्तन करते हुए भक्त समस्त सृष्टि के शिखर पर प्रकाशित ईश्वर का दर्शन करना सीखता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 10, Verse 21 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

दसवें अध्याय, विभूति योग में, अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से उनकी अभिव्यक्तियों का वर्णन करने को कहते हैं ताकि वे उन पर ध्यान कर सकें। कृष्ण अपनी विभूतियों की विस्तृत सूची से उत्तर देते हैं, और यह श्लोक उस प्रकटीकरण का आरम्भ करता है — कई वर्गों में श्रेष्ठतम सत्ता का नाम लेकर, ताकि अर्जुन जहाँ भी तेज सर्वाधिक हो वहाँ परमात्मा का दर्शन करें।

शास्त्रों में वर्णित

जिन भक्तों ने इस श्लोक को हृदय में धारण किया, वे बताते हैं कि सूर्योदय और पूर्णिमा का चन्द्रमा मात्र प्राकृतिक घटनाएँ न रहकर भगवान का जीवन्त दर्शन बन गए, जिसने उनके हृदय को विस्मय से भर दिया और आकाश की ओर प्रत्येक दृष्टि को मौन उपासना में बदल दिया।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥

ādityānām ahaṁ viṣhṇur jyotiṣhāṁ ravir anśhumān marīchir marutām asmi nakṣhatrāṇām ahaṁ śhaśhī

अर्थ:मैं (बारह) आदित्यों में विष्णु और ज्योतियों में अंशुमान् सूर्य हूँ; मैं (उनचास) मरुतों (वायु देवताओं) में मरीचि हूँ और नक्षत्रों में शशी (चन्द्रमा) हूँ।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

आदित्यानाम्🔊ādityānāmबारह आदित्यों में (अदिति के पुत्रों में)
अहम्🔊ahamमैं
विष्णुः🔊viṣhṇuḥभगवान विष्णु
ज्योतिषाम्🔊jyotiṣhāmज्योतिर्मय पदार्थों में
रविः🔊raviḥसूर्य
अंशुमान्🔊anśhu-mānतेजस्वी, प्रकाशमान
मरीचिः🔊marīchiḥमरीचि
मरुताम्🔊marutāmमरुतों में (वायु देवताओं में)
अस्मि🔊asmiमैं हूँ
नक्षत्राणाम्🔊nakṣhatrāṇāmनक्षत्रों में
अहम्🔊ahamमैं
शशी🔊śhaśhīचन्द्रमा

श्रीमद्भगवद्गीता १०.२१ — आदित्यानामहं विष्णुः पाठ के लाभ

मन को सृष्टि के सर्वाधिक महिमामय और तेजस्वी प्राणियों में ईश्वर का दर्शन करने का अभ्यास कराता है

कृष्ण को सूर्य, चन्द्र और देवताओं के सार रूप में प्रकट कर भक्ति को गहरा करता है

प्रकृति के प्रति दृष्टि में पवित्रता और तेजोमयता का भाव लाता है

मन को दिव्यता के स्पष्ट, उन्नत चित्र देकर ध्यान को सुदृढ़ करता है

भगवान की अनन्त विभूतियों के प्रति विस्मय और श्रद्धा जगाता है

परम तेज के चिन्तन द्वारा हृदय को स्थिर और उन्नत करता है

श्रीमद्भगवद्गीता १०.२१ — आदित्यानामहं विष्णुः जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकालीन ध्यान, सूर्योदय के समय, अथवा सूर्य और चन्द्रमा के तेज का चिन्तन करते हुए

इस श्लोक का धीरे-धीरे जप करें, प्रत्येक छवि पर रुकते हुए — आदित्यों में विष्णु, तेजस्वी सूर्य, नक्षत्रों में शीतल चन्द्रमा — और प्रत्येक को परमात्मा की ओर खुलती एक खिड़की के रूप में अनुभव करें। दिन का आरम्भ करने हेतु यह एक सुन्दर चिन्तन है, जो नेत्र को प्रत्येक महिमामय वस्तु में ईश्वर खोजने का अभ्यास कराता है। प्रत्येक आवृत्ति मन को समस्त प्रकाश के पीछे विद्यमान तेजोमय उपस्थिति की ओर उठाने दें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों (दिव्य ऐश्वर्यों) का वर्णन आरम्भ करते हैं, यह घोषित करते हुए कि वे आदित्यों में विष्णु, ज्योतियों में तेजस्वी सूर्य, मरुतों में मरीचि और नक्षत्रों में चन्द्रमा हैं। शिक्षा यह है कि सृष्टि के प्रत्येक वर्ग में जो सबसे महिमामय और तेजोमय है, उसके द्वारा ईश्वर को सर्वोत्तम रूप से पहचाना जा सकता है।
विभूतियाँ भगवान की विशेष अभिव्यक्तियाँ या ऐश्वर्य हैं। इस श्लोक से आरम्भ कर कृष्ण अनेक वर्गों में श्रेष्ठतम सत्ता का नाम लेते हैं — देवताओं, ज्योतियों, नक्षत्रों, ऋषियों, पर्वतों, नदियों आदि में — ताकि अर्जुन समस्त वस्तुओं के शिखर पर प्रकाशित एक ही परमात्मा को देख सकें।
सूर्य और चन्द्रमा सभी को दिखाई देने वाली सर्वाधिक तेजस्वी ज्योतियाँ हैं। इनका नाम लेकर कृष्ण हमें प्रकाश और जीवन के इन्हीं स्रोतों में दिव्य उपस्थिति का अनुभव करने को आमन्त्रित करते हैं, जिससे आकाश की ओर हमारी दृष्टि स्मरण और उपासना का कार्य बन जाती है।
जब भी आप सूर्योदय देखें, चन्द्रमा को निहारें, या किसी भी परम सुन्दर वस्तु को देखें, स्मरण करें कि उसकी महिमा भगवान के अपने तेज की एक चिंगारी है। इससे प्राकृतिक सौन्दर्य के साधारण क्षण भी ईश्वर के जीवन्त स्मरण में बदल जाते हैं।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides