श्रीमद्भगवद्गीता ११.३२ — कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्
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✦ अर्थ
भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के विश्वरूप दर्शन में भगवान श्रीकृष्ण यह गर्जना करते हैं कि वे स्वयं काल हैं — लोकों का संहार करने वाला प्रवृद्ध महाकाल, जो इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हो चुका है। वे अर्जुन से कहते हैं कि उसके बिना भी प्रतिपक्ष के योद्धा नष्ट होने वाले हैं। यह समस्त शास्त्रों में सबसे विस्मयकारी उद्घोषों में से एक है, जो भगवान को सृष्टि और संहार के पीछे की परम शक्ति के रूप में प्रकट करता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 32 · Sage Veda Vyasa (as part of the Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (traditionally Dvapara Yuga; text compiled c. 5th century BCE – 2nd century BCE)
यह श्लोक ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूप दर्शन योग में आता है, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना लौकिक विश्वरूप देखने के लिए दिव्यदृष्टि प्रदान करते हैं। अभिभूत और भयभीत अर्जुन पूछते हैं कि यह उग्र रूप कौन है। श्रीकृष्ण इस श्लोक से उत्तर देते हैं, स्वयं को लोकों का संहार करने वाला काल घोषित करते हुए, जो एकत्रित सेनाओं के संहार में पहले से ही प्रवृत्त है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि कोई साधारण नेत्र विश्वरूप को सहन नहीं कर सकता था; श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उसे देखने के लिए 'दिव्यचक्षु' प्रदान किया। अंधे राजा धृतराष्ट्र को वर्णन करते हुए संजय कहते हैं कि इस दर्शन का स्मरण मात्र करने से उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं और वे बार-बार आनंदित होते हैं।
मंत्र
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श्री भगवानुवाच कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥
śhrī-bhagavān uvācha kālo ’smi loka-kṣhaya-kṛit pravṛiddho lokān samāhartum iha pravṛittaḥ ṛite ’pi tvāṁ na bhaviṣhyanti sarve ye ’vasthitāḥ pratyanīkeṣhu yodhāḥ
अर्थ:श्रीभगवान् ने कहा -- मैं लोकों का नाश करने वाला प्रवृद्ध काल हूँ। इस समय, मैं इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ। जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा हैं, वे सब तुम्हारे बिना भी नहीं रहेंगे।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.३२ — कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् पाठ के लाभ
यह स्मरण कराकर निर्भयता जगाता है कि परम भगवान ही समस्त जीवन और मृत्यु के स्वामी हैं
शरणागति का भाव विकसित करता है — यह समझ कि समस्त घटनाओं के पीछे सच्चा कर्ता भगवान ही हैं
अहंकार के इस मिथ्या भाव को मिटाता है कि कर्म का एकमात्र कर्ता मैं ही हूँ
फल की चिंता किए बिना अपने धर्म का पालन करने का साहस प्रदान करता है
श्रीकृष्ण की लौकिक महिमा के प्रति श्रद्धा और विस्मय (ऐश्वर्य भक्ति) को गहरा करता है
साधक को भौतिक जगत की अनित्यता और दिव्य की नित्यता पर ध्यान करने में सहायता करता है
श्रीमद्भगवद्गीता ११.३२ — कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् जप विधि
शांत मुद्रा में पूर्व की ओर मुख करके बैठें। संस्कृत को धीरे-धीरे ऊँचे स्वर में पढ़ें, फिर उसके अर्थ पर मनन करें। इस श्लोक का पाठ विश्वरूप दर्शन (गीता अध्याय ११) के अध्ययन के अंग के रूप में करना सर्वोत्तम है। भगवान को उस सर्वव्यापी काल के रूप में देखें जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण किए हुए है। भौतिक लाभ के लिए नहीं, अपितु श्रद्धापूर्वक पाठ करें; यह साहस और शरणागति को प्रेरित करे। इसे ३, ९ अथवा ११ बार कहा जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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