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श्रीमद्भगवद्गीता ११.४९ — मा ते व्यथा मा च विमूढभावो

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 भय अथवा चिन्ता के क्षणों में, और शान्ति हेतु सायंकालीन प्रार्थनाओं के समय·📜 Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 49

अन्य नाम / खोज: ma te vyatha ma cha vimudha bhavo · vyapeta bhih prita manah · bhagavad gita 11.49 · gita 11 49 · do not be afraid verse · krishna reassures arjuna

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अर्थ

अर्जुन को अति भयंकर विश्वरूप से विचलित और भयभीत देखकर श्रीकृष्ण उन्हें प्रेमपूर्वक आश्वस्त करते हैं। वे अर्जुन से कहते हैं कि वे न भयभीत हों और न मोहित, तथा भय से मुक्त एवं प्रसन्न मन होकर पुनः भगवान के परिचित, सौम्य रूप को देखें। यह कोमल श्लोक भगवान की करुणा को प्रकट करता है, जो अपनी महिमा दिखाते हुए भी भक्त को आश्वासन देकर सान्त्वना और स्थिरता प्रदान करते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 49 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

ग्यारहवें अध्याय विश्वरूप दर्शन योग में, अर्जुन के अति विस्मयकारी और भयावह विश्वरूप को देखने और भगवान के सौम्य रूप को देखने की प्रार्थना करने के पश्चात, श्रीकृष्ण उन्हें आश्वस्त करते हैं। वे अर्जुन से कहते हैं कि वे न डरें और न मोहित हों, और शान्त एवं प्रसन्न होकर पुनः भगवान के परिचित रूप को देखें।

शास्त्रों में वर्णित

भक्त इस श्लोक को भगवान के अपने सान्त्वना के वचन रूप में संजोते हैं, यह मानते हुए कि जो उनकी शरण लेता है उसे कभी भय अभिभूत नहीं कर सकता — क्योंकि वही भगवान जिनकी महिमा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भर देती है, अपने भक्त के हृदय को कोमलता से स्थिर करते हैं।

मंत्र

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मा ते व्यथा मा विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्। व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥

mā te vyathā mā cha vimūḍha-bhāvo dṛiṣhṭvā rūpaṁ ghoram īdṛiṅ mamedam vyapeta-bhīḥ prīta-manāḥ punas tvaṁ tad eva me rūpam idaṁ prapaśhya

अर्थ:मेरे इस प्रकार के घोर रूप को देखकर तुम्हें न तो भय हो और न ही मोह। भय से रहित और प्रसन्न मन होकर तुम पुनः मेरे इस (पूर्व) रूप को ही देखो।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

मा ते व्यथा🔊mā te vyathāतुम्हें भय अथवा व्यथा न हो
मा च विमूढभावः🔊mā cha vimūḍha-bhāvaḥऔर न कोई मोह हो
दृष्ट्वा🔊dṛiṣhṭvāदेखकर
रूपम् घोरम्🔊rūpaṁ ghoramघोर रूप को
ईदृक् मम इदम्🔊īdṛiṅ mama idamमेरे इस प्रकार के
व्यपेतभीः🔊vyapeta-bhīḥभय से रहित
प्रीतमनाः🔊prīta-manāḥप्रसन्न मन वाले होकर
पुनः त्वम्🔊punaḥ tvamपुनः तुम
तत् एव🔊tad evaउसी
मे रूपम् इदम्🔊me rūpam idamमेरे इस रूप को
प्रपश्य🔊prapaśhyaदेखो

श्रीमद्भगवद्गीता ११.४९ — मा ते व्यथा मा च विमूढभावो पाठ के लाभ

भय के विरुद्ध भगवान का प्रत्यक्ष आश्वासन देता है — 'भयभीत मत हो'

भय अथवा मोह के समय भक्त को सान्त्वना देता है

भयभीत हृदय के प्रति भगवान की कोमल करुणा को प्रकट करता है

अति विस्मयकारी अनुभवों के पश्चात शान्ति और प्रसन्नता पुनः स्थापित करता है

साधक को स्मरण कराता है कि भगवान विस्मित करने के साथ-साथ स्थिर भी करते हैं

साहस और शान्ति की कामना करते समय पाठ करने योग्य सान्त्वनादायक श्लोक

श्रीमद्भगवद्गीता ११.४९ — मा ते व्यथा मा च विमूढभावो जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयभय अथवा चिन्ता के क्षणों में, और शान्ति हेतु सायंकालीन प्रार्थनाओं के समय

इस श्लोक का पाठ तब करें जब भय अथवा भ्रम मन को व्यथित करे। उच्चारण करते समय श्रीकृष्ण के शब्दों 'भयभीत मत हो, मोहित मत हो' को अपने हृदय के प्रति कहे गए के रूप में ग्रहण करें, और अपने भय को प्रसन्न, शान्तिपूर्ण मन में घुल जाने दें। रात्रि में अथवा संकट में इसका पाठ विशेष रूप से सान्त्वनादायक है, भगवान की आश्वस्त करने वाली, कोमल उपस्थिति पर भरोसा करते हुए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकृष्ण भयभीत अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वे घोर विश्वरूप को देखकर न डरें और न मोहित हों। वे अर्जुन को आमन्त्रित करते हैं कि वे भय से मुक्त और प्रसन्न हृदय होकर पुनः भगवान के परिचित, सौम्य रूप को देखें।
जो विश्वरूप अर्जुन ने देखा वह अति विस्मयकारी और भयावह था, जिसमें काल के रूप में उसका सब कुछ ग्रस लेने वाला पक्ष भी सम्मिलित था। इस दर्शन से विचलित होकर अर्जुन भय से भर गए, जिससे इस श्लोक में श्रीकृष्ण का प्रेममय आश्वासन उत्पन्न हुआ।
यह भगवान की करुणा को प्रकट करता है। यद्यपि श्रीकृष्ण अपनी अनन्त महिमा और अपने भयावह लौकिक पक्ष को भी दिखाते हैं, फिर भी वे अपने भक्त को कोमलता से सान्त्वना देते हैं, भय दूर करते और शान्ति पुनः स्थापित करते हैं। भगवान विस्मित भी करते हैं और आश्वस्त भी, भक्त के हृदय की चिन्ता करते हुए।
इसका सन्देश 'भयभीत मत हो, मोहित मत हो' किसी भी चिन्ता या भ्रम के क्षण के लिए सान्त्वनादायक आश्वासन है। इसका पाठ भक्त को भगवान की शान्तिदायक उपस्थिति का अनुभव कराने और संकट के समय शान्त, प्रसन्न मन पुनः प्राप्त करने में सहायता करता है।

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