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श्रीमद्भगवद्गीता १८.६२ — तमेव शरणं गच्छ

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 सायंकाल अथवा संकट के किसी क्षण में, जब भगवान में शान्ति और शरण की खोज हो।·📜 Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 62

अन्य नाम / खोज: tam eva sharanam gachchha · sarva bhavena bharata · bhagavad gita 18.62 · gita 18 62 · param shanti verse · sthanam prapsyasi shashvatam

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अर्थ

यह प्रकट करने के पश्चात कि भगवान प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करते हैं, श्रीकृष्ण अर्जुन को अत्यन्त कोमल और स्पष्ट उपदेश देते हैं — सम्पूर्ण भाव से केवल उसी की शरण में जाओ। ऐसी पूर्ण शरणागति का फल है परम और शाश्वत शान्ति तथा सनातन धाम की प्राप्ति, जो अपने प्रयत्न से नहीं अपितु भगवान की कृपा से मिलती है। यह श्लोक गीता के पूर्ण शरणागति और उससे प्राप्त शान्ति के सबसे सुन्दर आमन्त्रणों में से एक है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 62 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

अठारहवें अध्याय मोक्षसंन्यासयोग में, श्रीकृष्ण प्रकट करते हैं कि परम भगवान सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं और अपनी शक्ति से उन्हें संचालित करते हैं। तदनन्तर वे अर्जुन को प्रेमपूर्वक प्रेरित करते हैं कि वे उस अन्तर्यामी भगवान की सम्पूर्ण भाव से शरण में जाएँ, और दिव्य कृपा द्वारा परम शान्ति तथा शाश्वत धाम का वचन देते हैं — यह उपदेश गीता के शरणागति विषयक अन्तिम वचन की पूर्वसूचना देता है।

शास्त्रों में वर्णित

भक्ति परम्परा के सन्त साक्षी देते हैं कि जिस क्षण भक्त सम्पूर्ण हृदय से शरणागत होता है, जीवन का भार उतर जाता है और एक अटल शान्ति उतर आती है — क्योंकि हृदय में निवास करने वाले स्वयं भगवान उस भक्त का भार वहन कर लेते हैं जो उनकी शरण में जाता है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥

tam eva śharaṇaṁ gachchha sarva-bhāvena bhārata tat-prasādāt parāṁ śhāntiṁ sthānaṁ prāpsyasi śhāśhvatam

अर्थ:हे भारत! तुम सम्पूर्ण भाव से उसी (ईश्वर) की शरण में जाओ। उसकी कृपा से तुम परम शान्ति और शाश्वत धाम को प्राप्त करोगे।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

तम्🔊tamउस (भगवान) की
एव🔊evaही; केवल
शरणं गच्छ🔊śharaṇaṁ gachchhaशरण में जाओ; समर्पण करो
सर्वभावेन🔊sarva-bhāvenaसम्पूर्ण भाव से; पूरे हृदय से
भारत🔊bhārataहे अर्जुन, भरतवंशी
तत्प्रसादात्🔊tat-prasādātउसकी कृपा से
परां शान्तिम्🔊parāṁ śhāntimपरम शान्ति
स्थानम्🔊sthānamधाम; अवस्था
प्राप्स्यसि🔊prāpsyasiतुम प्राप्त करोगे
शाश्वतम्🔊śhāśhvatamशाश्वत; नित्य

श्रीमद्भगवद्गीता १८.६२ — तमेव शरणं गच्छ पाठ के लाभ

भगवान के प्रति पूर्ण, सम्पूर्ण हृदय से शरणागति का प्रत्यक्ष आह्वान

शरणागत भक्त को परम शान्ति (परम शान्ति) का वचन देता है

भगवान की कृपा से शाश्वत धाम की प्राप्ति का आश्वासन देता है

अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान के संरक्षण में सौंपकर चिंता को दूर करता है

सिखाता है कि केवल प्रयत्न नहीं, अपितु कृपा ही परम शान्ति प्रदान करती है

भय, शोक या अनिश्चितता के समय पाठ करने के लिए एक सान्त्वनादायक श्लोक

श्रीमद्भगवद्गीता १८.६२ — तमेव शरणं गच्छ जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयसायंकाल अथवा संकट के किसी क्षण में, जब भगवान में शान्ति और शरण की खोज हो।

इस श्लोक का पाठ तब करें जब मन विश्राम और शरण चाहता हो। 'तमेव शरणं गच्छ' का पाठ करते समय चिंता को त्यागें और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को हृदय में निवास करने वाले भगवान को अर्पित करें। 'परम शान्ति' — परम शान्ति — के वचन पर मन को टिकाएँ, जो उनकी कृपा से प्राप्त होती है। रात्रि में या किसी कठिन परिस्थिति का सामना करने से पूर्व इसका पाठ विशेष रूप से शान्तिदायक है, जो हृदय को शरणागति में स्थिर करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकृष्ण अर्जुन को सम्पूर्ण भाव से केवल भगवान की शरण में जाने को कहते हैं। यह पूर्ण, सम्पूर्ण हृदय से शरणागति का आह्वान है, जिसके पश्चात व्यक्ति भगवान की कृपा से परम शान्ति और शाश्वत धाम को प्राप्त करता है।
'सर्वभावेन' का अर्थ है 'सम्पूर्ण भाव से' अथवा 'पूरे हृदय से'। यह संकेत करता है कि श्रीकृष्ण जिस शरणागति का आह्वान करते हैं वह पूर्ण है — विचार, भाव और संकल्प की — न कि भगवान की ओर कोई आंशिक या संकोचपूर्ण मोड़।
यह श्लोक 'परम शान्ति', परम और चिरस्थायी शान्ति, तथा 'शाश्वतम् स्थानम्', शाश्वत धाम की प्राप्ति का वचन देता है। विशेष रूप से, ये 'तत्प्रसादात्' — भगवान की कृपा से — प्राप्त होते हैं, जो आत्म-प्रयत्न पर शरणागति को महत्त्व देता है।
18.61 में श्रीकृष्ण प्रकट करते हैं कि भगवान सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। यह श्लोक (18.62) उसका स्वाभाविक उत्तर है — उस अन्तर्यामी भगवान की शरण में जाओ। यह प्रसिद्ध 18.66 की भी भूमिका तैयार करता है, जहाँ श्रीकृष्ण अपना अन्तिम, परम शरणागति का आह्वान देते हैं।

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