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श्रीमद्भगवद्गीता १८.५५ — भक्त्या मामभिजानाति

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातःकालीन ध्यान अथवा सायंकालीन भक्ति साधना के समय·📜 Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 55

अन्य नाम / खोज: bhaktya mam abhijanati · tato mam tattvato jnatva · bhagavad gita 18.55 · gita 18 55 · knowing god through devotion · vishate tad anantaram

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अर्थ

अठारहवें अध्याय के इस चरम उपदेश में श्रीकृष्ण घोषित करते हैं कि उन्हें केवल पराभक्ति के द्वारा ही तत्त्वत: जाना जा सकता है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक जानकारी नहीं, अपितु भगवान के स्वरूप और महिमा का प्रत्यक्ष साक्षात्कार है। भक्ति के द्वारा तत्त्वत: जान लेने पर भक्त तत्काल ही उनमें प्रवेश कर जाता है -- परमात्मा से एकत्व प्राप्त कर लेता है। यह श्लोक भक्ति को समस्त साधनों का शिखर एवं पराकाष्ठा सिद्ध करता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 55 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

अठारहवें और अंतिम अध्याय, मोक्ष संन्यास योग में, श्रीकृष्ण अपनी सम्पूर्ण शिक्षा के सूत्रों को समेटते हैं। ब्रह्म में स्थित आत्मा का वर्णन करने के पश्चात, वे घोषित करते हैं कि परम सत्य केवल भक्ति के द्वारा ही तत्त्वतः जाना जाता है, और जो उन्हें इस प्रकार जान लेता है वह उनमें प्रवेश कर जाता है। यह श्लोक गीता के समापन शरणागति उपदेश का द्वार बनता है।

शास्त्रों में वर्णित

महान भक्ति परम्पराएँ मानती हैं कि भक्ति ही ईश्वर के गहनतम ज्ञान का द्वार खोलती है — कि सर्वोच्च विद्वत्ता भी वहाँ नहीं पहुँच सकती जहाँ सच्चे प्रेम का एक आँसू पहुँच जाता है, क्योंकि भगवान स्वयं अपने स्वरूप को उस हृदय पर प्रकट करते हैं जो उनसे प्रेम करता है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥

bhaktyā mām abhijānāti yāvān yaśh chāsmi tattvataḥ tato māṁ tattvato jñātvā viśhate tad-anantaram

अर्थ:(पराभक्ति) के द्वारा वह मुझे तत्त्वत: जान लेता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ और मैं क्या हूँ। इस प्रकार तत्त्वत: जानने के पश्चात वह तत्काल ही मुझमें प्रवेश कर जाता है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

भक्त्या🔊bhaktyāप्रेममयी भक्ति के द्वारा
माम्🔊māmमुझे
अभिजानाति🔊abhijānātiवह सचमुच जान लेता है
यावान्🔊yāvānजितना; कितना महान
यः च अस्मि🔊yaḥ cha asmiजो और जैसा मैं हूँ
तत्त्वतः🔊tattvataḥतत्त्वतः; वास्तव में
ततः🔊tataḥतब; तत्पश्चात
माम्🔊māmमुझे
तत्त्वतः🔊tattvataḥतत्त्वतः; वास्तव में
ज्ञात्वा🔊jñātvāजानकर
विशते🔊viśhateप्रवेश करता है; मुझमें लीन हो जाता है
तदनन्तरम्🔊tat-anantaramतत्काल ही

श्रीमद्भगवद्गीता १८.५५ — भक्त्या मामभिजानाति पाठ के लाभ

प्रेममयी भक्ति (भक्ति) को ईश्वर को जानने का सर्वोच्च साधन सिद्ध करता है

भक्त को आश्वस्त करता है कि भगवान का सच्चा ज्ञान उनसे एकत्व की ओर ले जाता है

सिखाता है कि साक्षात्कार, न कि केवल बुद्धि, आध्यात्मिक साधना का लक्ष्य है

समस्त योगों के शिखर रूप में गहन, हार्दिक भक्ति को प्रेरित करता है

साधक को स्मरण कराता है कि भगवान को सचमुच 'तत्त्वतः' जाना जा सकता है

भक्ति के द्वारा परमात्मा में प्रवेश का वचन देता है

श्रीमद्भगवद्गीता १८.५५ — भक्त्या मामभिजानाति जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकालीन ध्यान अथवा सायंकालीन भक्ति साधना के समय

इस श्लोक का जप भगवान के प्रति प्रेममयी भक्ति विकसित करते हुए करें। पाठ करते समय इस आश्वासन पर ध्यान दें कि सच्ची भक्ति भगवान के सच्चे ज्ञान की ओर ले जाती है, और ऐसा ज्ञान उनमें प्रवेश में पराकाष्ठा पाता है। इस श्लोक को अपनी प्रार्थना को दिव्य के विषय में जानकारी पाने से प्रत्यक्ष, प्रेममयी साक्षात्कार की चाह की ओर गहरा करने दें। यह स्वाभाविक रूप से इसके बाद आने वाले शरणागति श्लोकों 18.62 और 18.66 के साथ मेल खाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि उन्हें केवल भक्ति, अर्थात प्रेममयी भक्ति, के द्वारा ही तत्त्वतः जाना जाता है। यह बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु भगवान कौन और कितने महान हैं, इसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार है, और इसी के द्वारा भक्त उनमें प्रवेश कर जाता है।
'विशते' का अर्थ है कि भक्त, भगवान को तत्त्वतः जान लेने पर, उनके साथ घनिष्ठ एकत्व प्राप्त करता है — उनके स्वरूप में स्थित हो जाता है। यह आत्मा की सर्वोच्च प्राप्ति का वर्णन करता है, जो भक्ति के बल पर परम सत्य में प्रवेश करती है।
सम्पूर्ण गीता में कर्म और ज्ञान के मार्ग सिखाने के पश्चात श्रीकृष्ण यहाँ उन्हें भक्ति से शिखर पर पहुँचाते हैं। वे घोषित करते हैं कि भक्ति वही साधन है जिसके द्वारा वे तत्त्वतः जाने और प्राप्त किए जाते हैं, प्रेममयी भक्ति को समस्त आध्यात्मिक साधना की पराकाष्ठा के रूप में प्रस्तुत करते हुए।
यह श्लोक श्रीकृष्ण के अंतिम शरणागति उपदेशों की ओर ले जाता है, जिनमें 18.62 ('उन्हीं की शरण में जाओ') और प्रसिद्ध 18.66 ('समस्त धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आओ') सम्मिलित हैं। मिलकर ये भक्ति और शरणागति को गीता के उपसंहार का हृदय रूप में प्रस्तुत करते हैं।

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