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श्रीमद्भगवद्गीता १८.७३ — नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 गीता का अध्ययन करने के पश्चात, अथवा जब भी स्पष्टता और संशय से मुक्ति की खोज हो·📜 Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 73

अन्य नाम / खोज: nashto mohah smritir labdha · karishye vachanam tava · bhagavad gita 18.73 · gita 18 73 · arjuna's delusion destroyed · sthito smi gata sandehah

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अर्थ

सम्पूर्ण गीता सुनने के पश्चात यह अर्जुन का विजयी उत्तर है। वे घोषित करते हैं कि उनका मोह पूर्णतया नष्ट हो गया है और श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें तत्त्वज्ञान पुनः प्राप्त हो गया है। समस्त संशयों से मुक्त और ज्ञान में स्थित होकर वे भगवान के वचन का पालन करने का संकल्प करते हैं। यह श्लोक गीता-उपदेश की सफल पराकाष्ठा को दर्शाता है -- भ्रम का स्पष्टता में, और निराशा का शरणागति एवं दृढ़ संकल्प में रूपान्तरण।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 73 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

अठारहवें अध्याय 'मोक्ष संन्यास योग' में, श्रीकृष्ण द्वारा सम्पूर्ण उपदेश देने और यह पूछने के पश्चात कि अर्जुन का मोह दूर हुआ या नहीं, अर्जुन यह उत्तर देते हैं। श्रीकृष्ण को अच्युत कहकर सम्बोधित करते हुए वे पुष्टि करते हैं कि उनका भ्रम चला गया है, उनकी समझ कृपा से पुनः स्थापित हो गयी है, और अब वे भगवान के वचन के अनुसार कार्य करेंगे -- यही संकल्प गीता को पूर्ण करता है।

शास्त्रों में वर्णित

यह श्लोक गीता की शक्ति के जीवन्त प्रमाण के रूप में सँजोया जाता है -- कि भगवान की कृपा, उनके उपदेश के माध्यम से, हृदय के गहनतम मोह को पूर्णतया दूर कर सकती है और आत्मा को स्पष्टता, साहस तथा श्रद्धापूर्ण कर्म में पुनः स्थापित कर सकती है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

अर्जुन उवाचनष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥

arjuna uvācha naṣhṭo mohaḥ smṛitir labdhā tvat-prasādān mayāchyuta sthito ‘smi gata-sandehaḥ kariṣhye vachanaṁ tava

अर्थ:अर्जुन ने कहा -- हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति (तत्त्वज्ञान) प्राप्त हो गयी है। अब मैं संशयरहित होकर (अपने स्वरूप में) स्थित हूँ और मैं आपके वचन का पालन करूँगा।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

अर्जुनः उवाच🔊arjunaḥ uvāchaअर्जुन ने कहा
नष्टः मोहः🔊naṣhṭaḥ mohaḥमेरा मोह नष्ट हो गया है
स्मृतिः लब्धा🔊smṛitiḥ labdhāस्मृति (तत्त्वज्ञान) पुनः प्राप्त हो गयी है
त्वत्प्रसादात्🔊tvat-prasādātआपकी कृपा से
मया🔊mayāमेरे द्वारा
अच्युत🔊achyutaहे अच्युत, अविनाशी (श्रीकृष्ण)
स्थितः अस्मि🔊sthitaḥ asmiमैं (दृढ़ता से) स्थित हूँ
गतसन्देहः🔊gata-sandehaḥसंशयरहित
करिष्ये🔊kariṣhyeमैं करूँगा; मैं पालन करूँगा
वचनं तव🔊vachanaṁ tavaआपका वचन; आपका आदेश

श्रीमद्भगवद्गीता १८.७३ — नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा पाठ के लाभ

भगवान की कृपा से मोह के नाश का उत्सव मनाता है

साधक को स्पष्टता, दृढ़ निश्चय और संशयहीनता की ओर प्रेरित करता है

आध्यात्मिक उपदेश का आदर्श उत्तर प्रस्तुत करता है -- उस पर आचरण का संकल्प

पुष्टि करता है कि दिव्य कृपा तत्त्वज्ञान (स्मृति) को पुनः स्थापित करती है

स्पष्टता और निर्णायकता की खोज में पाठ करने हेतु एक शक्तिशाली श्लोक

गीता-अध्ययन के फल का प्रतीक -- ज्ञान दृढ़ता से स्थापित

श्रीमद्भगवद्गीता १८.७३ — नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयगीता का अध्ययन करने के पश्चात, अथवा जब भी स्पष्टता और संशय से मुक्ति की खोज हो

इस श्लोक का पाठ अपने जीवन में गीता-उपदेश के फल की पुष्टि के लिए करें। अर्जुन के शब्दों का जप करते समय प्रार्थना करें कि भगवान की कृपा से आपका अपना मोह दूर हो, और अर्जुन की भाँति प्राप्त ज्ञान पर आचरण का संकल्प करें। गीता-अध्ययन के समापन पर अथवा जब आपको संशय से दृढ़, श्रद्धापूर्ण कर्म की ओर बढ़ना हो, तब इसका पाठ विशेष रूप से प्रभावशाली है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्जुन घोषित करते हैं कि उनका मोह नष्ट हो गया है और श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें तत्त्वज्ञान पुनः प्राप्त हो गया है। अब समस्त संशयों से मुक्त और ज्ञान में दृढ़ होकर वे भगवान के आदेश के अनुसार कार्य करने का संकल्प करते हैं।
यह दर्शाता है कि श्रीकृष्ण का उपदेश पूर्णतया सफल हुआ। जो अर्जुन निराशा और भ्रम में आरम्भ हुए थे, वे मोह और संशय से मुक्त होकर, अपना कर्तव्य करने को तत्पर होकर समाप्त होते हैं। शोक से स्पष्टता की ओर यह रूपान्तरण ही समस्त संवाद का प्रयोजन है।
इसका अर्थ है 'मेरा मोह नष्ट हो गया है और मेरी स्मृति (तत्त्वज्ञान) पुनः प्राप्त हो गयी है'। अर्जुन पहचानते हैं कि आसक्ति से उत्पन्न भ्रम विलीन हो गया है और कृपा से उन्हें अपने सच्चे स्वरूप तथा कर्तव्य का ज्ञान पुनः मिल गया है।
'करिष्ये वचनं तव' का अर्थ है 'मैं आपके वचन के अनुसार कार्य करूँगा'। यह श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन के पालन का अर्जुन का संकल्प है। यह आध्यात्मिक शिक्षा की उचित पराकाष्ठा का प्रतिमान है -- केवल समझ नहीं, अपितु उसके अनुसार जीने का दृढ़ निश्चय।

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