श्रीमद्भगवद्गीता १.४७ — एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये
अन्य नाम / खोज: evam uktva arjunah sankhye · rathopastha upavishat · bhagavad gita 1.47 · gita 1 47 · arjuna casts down his bow · shoka samvigna manasah
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✦ अर्थ
यह प्रथम अध्याय का अन्तिम श्लोक है, जिसे संजय कह रहे हैं। अपने शोक और युद्ध न करने के तर्कों को व्यक्त करने के पश्चात अर्जुन अपने प्रसिद्ध गाण्डीव धनुष को बाणों सहित नीचे रख देते हैं और शोक से व्याकुल मन से रथ की बैठक पर बैठ जाते हैं। यह श्लोक अर्जुन के विषाद को पूर्ण करता है और श्रोता को श्रीकृष्ण के उत्तर के लिए तैयार करता है, जिससे द्वितीय अध्याय का महान उपदेश आरम्भ होता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 47 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
अपने स्वजनों और गुरुजनों से लड़ने की व्यथा व्यक्त करने के पश्चात अर्जुन पूर्णतः हतोत्साह हो जाते हैं। प्रथम अध्याय के इस समापन श्लोक में संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि कैसे अर्जुन के हाथों से धनुष और बाण छूट गये और वे शोक में डूबे मन से रथ की बैठक पर बैठ गये -- वह क्षण जो आगे के अध्यायों में श्रीकृष्ण के उपदेश को मार्ग देता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
टीकाकार देखते हैं कि जिस क्षण अर्जुन ने असहायता में अपना धनुष नीचे रखा, वही भगवद्गीता के ज्ञान का जन्म-क्षण बन गया -- यह स्मरण कराता हुआ कि जब भक्त और कुछ नहीं कर सकता, तब भगवान सब कुछ करने लगते हैं।
मंत्र
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सञ्जय उवाच एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥
sañjaya uvācha evam uktvārjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśhat visṛijya sa-śharaṁ chāpaṁ śhoka-saṁvigna-mānasaḥ
अर्थ:संजय ने कहा -- रणभूमि में इस प्रकार कहकर शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गये।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १.४७ — एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये पाठ के लाभ
अर्जुन विषाद योग, अर्जुन के शोक के अध्याय की पराकाष्ठा को अंकित करता है
साधक को स्मरण कराता है कि समर्पण प्रायः वहाँ आरम्भ होता है जहाँ हमारा अपना बल चुक जाता है
दर्शाता है कि अहंकार के 'शस्त्र' त्यागना ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व हो सकता है
द्वितीय अध्याय के दीप्तिमान उपदेश के आरम्भ से पूर्व एक चिन्तनशील विराम स्थापित करता है
भक्त को असहायता के क्षणों को कृपा के द्वार के रूप में स्वीकारने में सहायता करता है
परम्परागत रूप से गीता के प्रथम अध्याय का पाठ पूर्ण करने के लिए पढ़ा जाता है
श्रीमद्भगवद्गीता १.४७ — एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये जप विधि
इस श्लोक का पाठ गीता के प्रथम अध्याय को समाप्त करने के लिए करें। जप करते समय अर्जुन को अपना महान धनुष नीचे रखते हुए देखें, उनका बल चुका हुआ और हृदय टूटा हुआ। उस स्तब्धता में रुकें, यह पहचानते हुए कि आत्मा, जब अपने आप कुछ और नहीं कर सकती, स्वाभाविक रूप से दिव्य की ओर मुड़ जाती है। फिर द्वितीय अध्याय में आगे बढ़ें, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को -- और साधक को -- शोक से ऊपर उठाने लगते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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