श्रीमद्भगवद्गीता १.२९ — सीदन्ति मम गात्राणि
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✦ अर्थ
दोनों सेनाओं के बीच खड़े होकर अपने स्वजनों को युद्ध के लिए तत्पर देखकर अर्जुन विह्वल हो उठते हैं। इस श्लोक में वे अपने शोक के शारीरिक लक्षणों का वर्णन करते हैं — अंगों का शिथिल होना, मुख का सूखना, शरीर का काँपना और रोमांच होना। यह गीता में एक संवेदनशील हृदय के नैतिक शोक से टूटने का अत्यन्त सजीव चित्र है, और यहीं से श्रीकृष्ण के उपदेश की भूमिका बनती है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 29 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने को कहकर अर्जुन दोनों ओर युद्ध के लिए सज्जित पिताओं, पितामहों, गुरुओं, चाचाओं, भाइयों एवं मित्रों को देखते हैं। करुणा एवं शोक से अभिभूत होकर वे अपने शरीर के कम्पन एवं बल के क्षीण होने का वर्णन करते हैं। संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सुनाया गया यह विषाद ही श्रीकृष्ण के उपदेश का आरम्भ-बिन्दु बनता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
ऋषि कहते हैं कि अर्जुन का यह टूटना स्वयं एक छिपा हुआ वरदान था, क्योंकि यही भगवद्गीता का कारण बना — इसका प्रमाण कि हमारी गहनतम निराशा भी, प्रभु के समक्ष रखे जाने पर, परम ज्ञान में रूपान्तरित हो सकती है।
मंत्र
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सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥
sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati vepathuśh cha śharīre me roma-harṣhaśh cha jāyate
अर्थ:मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूख रहा है; मेरे शरीर में कम्प तथा रोमांच हो रहा है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १.२९ — सीदन्ति मम गात्राणि पाठ के लाभ
यह पुष्टि करता है कि महान आत्माएँ भी भय एवं शोक का अनुभव करती हैं — संघर्षरत भक्त के लिए सान्त्वना
साधक को स्मरण कराता है कि चिन्ता के शारीरिक लक्षण स्वाभाविक हैं और इन्हें पार किया जा सकता है
वह विरोधाभास प्रस्तुत करता है जिससे श्रीकृष्ण का स्थिरता (स्थितप्रज्ञ) का उपदेश उज्ज्वल हो उठता है
जब मन अभिभूत हो जाए, ठीक उसी क्षण ईश्वर की ओर मुड़ने को प्रेरित करता है
शोक एवं आसक्ति किस प्रकार शरीर एवं मन को प्रभावित करते हैं, इसकी आत्म-जागरूकता विकसित करने में सहायक
यह विश्वास जगाता है कि प्रभु को समर्पित निराशा ज्ञान का द्वार बन सकती है
श्रीमद्भगवद्गीता १.२९ — सीदन्ति मम गात्राणि जप विधि
प्रथम अध्याय का अध्ययन करते समय इस श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें। जप करते हुए अपने भीतर के किसी भी भय या शोक को सच्चाई से स्वीकार करें, जैसे अर्जुन ने श्रीकृष्ण के समक्ष किया। भावना को दबाने के बजाय उसे प्रभु को अर्पित करें और आगे के श्लोकों की ओर बढ़ें, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को विषाद से ज्ञान की ओर ले जाते हैं। इसे द्वितीय अध्याय के साथ पढ़ना सर्वाधिक सान्त्वना देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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