श्रीमद्भगवद्गीता १.२१ — सेनयोरुभयोर्मध्ये
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✦ अर्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान को हृषीकेश और अच्युत कहकर सम्बोधित करते हुए, अपने सारथी बने श्रीकृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने की प्रार्थना करते हैं। वे युद्ध आरम्भ होने से पूर्व रणभूमि में एकत्र योद्धाओं का निरीक्षण करना चाहते हैं। यही वह क्षण है जब अर्जुन अपने स्वजनों, गुरुजनों और मित्रों के सामने आते हैं, और यहीं से वह विषाद उत्पन्न होता है जो सम्पूर्ण गीता-उपदेश का कारण बनता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 21 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
प्रथम अध्याय 'अर्जुन विषाद योग' में, शंखों के निनाद के पश्चात् और दोनों सेनाओं के युद्ध हेतु तैयार खड़े होने पर, अर्जुन अपने सारथी कृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने को कहते हैं। संजय इसे नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। यह प्रार्थना अर्जुन को सीधे अपने स्वजनों के सामने ले आती है, और वही शोक जगाती है जो भगवद्गीता का अवसर बनता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि भगवान ने अपने भक्त के प्रेमवश अर्जुन के सारथी का विनम्र पद स्वीकार किया — और जो अपने जीवन के सारथी कृष्ण को बना लेता है, वह संसार की प्रत्येक रणभूमि से अचूक रूप से पार ले जाया जाता है।
मंत्र
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अर्जुन उवाच हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥
arjuna uvācha senayor ubhayor madhye rathaṁ sthāpaya me ’chyuta
अर्थ:अर्जुन ने कहा -- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कीजिये, जिससे मैं युद्ध की इच्छा से खड़े इन योद्धाओं का निरीक्षण कर सकूँ कि इस रणसंग्राम में मुझे किनके साथ युद्ध करना है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १.२१ — सेनयोरुभयोर्मध्ये पाठ के लाभ
भगवान की उस विनम्रता को दर्शाता है जब वे भक्त के सारथी और मार्गदर्शक बनते हैं
साधक को स्मरण कराता है कि कार्य से पूर्व जीवन की रणभूमि को रुककर स्पष्ट देख ले
कृष्ण को हृषीकेश — इन्द्रियों के स्वामी — रूप में आत्मसंयम हेतु आवाहित करता है
अर्जुन के समर्पण और कृष्ण के उपदेश हेतु चिन्तनशील भूमिका रचता है
अपने जीवन के स्थिर सारथी रूप में भगवान की ओर मुड़ने को प्रेरित करता है
यह विश्वास जगाता है कि भगवान को केन्द्र में रखने से संकट में स्पष्टता आती है
श्रीमद्भगवद्गीता १.२१ — सेनयोरुभयोर्मध्ये जप विधि
इस श्लोक को गीता के प्रथम अध्याय का अध्ययन करते समय पढ़ें। जपते समय कृष्ण को आत्मा के स्वेच्छुक सारथी के रूप में चित्रित करें, जो शरीर रूपी रथ को जीवन के संघर्षों के ठीक मध्य में ले जाते हैं। चिन्तन करें कि भगवान को 'हृषीकेश' (इन्द्रियों के स्वामी) और 'अच्युत' (अविनाशी) कहना किस प्रकार समर्पण और विश्वास दोनों को व्यक्त करता है। अध्याय आगे बढ़ाने से पूर्व इस श्लोक से मन को स्थिरता में बैठने दें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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