ब्रह्मा गायत्री मंत्र
अन्य नाम / खोज: om vedatmanaya vidmahe hiranyagarbhaya dhimahi · brahma gayatri · brahmadev gayatri mantra
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✦ अर्थ
ब्रह्मा गायत्री मंत्र सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा की गायत्री छंद में वैदिक प्रार्थना है, जिन्हें वेदस्वरूप और सृष्टि के स्वर्णिम मूल हिरण्यगर्भ रूप में सम्बोधित किया गया है। यह सृष्टिकर्ता से बुद्धि को प्रकाशित करने की प्रार्थना है। यह विशेष रूप से ज्ञान, बुद्धि, सृजन-शक्ति और विद्या-अध्ययन में सफलता के लिए जपा जाता है।
उत्पत्ति और कथा
The Gayatri mantra of Brahma · Traditional (Vedic)
सार्वभौमिक गायत्री मंत्र के अतिरिक्त, वैदिक परम्परा प्रत्येक महान देवता को उसका अपना गायत्री देती है — पवित्र गायत्री छंद में एक प्रार्थना जो उस देवता से बुद्धि को प्रकाशित करने का आवाहन करती है। ब्रह्मा गायत्री विश्व के रचयिता ब्रह्मा का आवाहन करती है, जो वेदों की आत्मा (वेदात्मा) और हिरण्यगर्भ — वह स्वर्णिम कॉस्मिक गर्भ जिससे समस्त सृष्टि प्रकट होती है — हैं। "विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्" की शाश्वत शैली का अनुसरण करते हुए यह सर्वोपरि बुद्धि, ज्ञान और सृजन-शक्ति के लिए जपा जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
वेद हिरण्यगर्भ — ब्रह्मा से अभिन्न स्वर्णिम गर्भ — का वर्णन उस तत्त्व के रूप में करते हैं जो आदि में प्रकट हुआ और जिसने स्वर्ग व पृथ्वी को धारण किया; ब्रह्मा गायत्री द्वारा इस सृजनशील स्रोत का ध्यान करने से ज्ञान के सच्चे साधक में अन्तर्दृष्टि, स्मृति और मौलिक चिन्तन जागृत होता है, ऐसा परम्परा कहती है।
मंत्र
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ॐ वेदात्मनाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि । तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
Om Vedatmanaya Vidmahe Hiranyagarbhaya Dhimahi. Tanno Brahma Prachodayat.
अर्थ:ॐ। हम वेदस्वरूप को जानें, हिरण्यगर्भ का ध्यान करें; वे भगवान ब्रह्मा हमारी बुद्धि को प्रेरित व प्रकाशित करें।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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ब्रह्मा गायत्री मंत्र पाठ के लाभ
रचयिता ब्रह्मा का गायत्री मंत्र — वेदों एवं समस्त ज्ञान के स्रोत का आवाहन।
बुद्धि, विद्या, सृजनशीलता एवं बौद्धिक स्पष्टता के लिए, तथा अध्ययन और शोध में सफलता के लिए जपा जाता है।
ब्रह्मा को हिरण्यगर्भ — सृष्टि के बीज — रूप में सम्बोधित करता है, जो हमारी अपनी सृजन-शक्ति को जगाने की प्रार्थना है।
गायत्री रूप में यह विद्महे-धीमहि-प्रचोदयात् की शाश्वत शैली पर बुद्धि को प्रकाशित करता है।
जप, ध्यान तथा उपासना और अध्ययन के आरम्भ के लिए उपयुक्त एक पूर्ण दैनिक वैदिक मंत्र।
सन्ध्या काल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में, पूर्वाभिमुख होकर, अध्ययन या सृजन-कार्य से पूर्व विशेष रूप से प्रभावी।
ब्रह्मा गायत्री मंत्र जप विधि
स्नान के पश्चात्, शान्त मन से पूर्वाभिमुख बैठकर "ॐ वेदात्मनाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि। तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्" का माला पर 108 बार जप करें। समस्त गायत्री मंत्रों की भाँति इसे आदर्श रूप से सन्ध्या कालों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में जपा जाता है। वेदों की आत्मा रचयिता ब्रह्मा को हृदय में धारण करें। इसे प्रतिदिन, सार्वभौमिक गायत्री मंत्र के साथ जपा जा सकता है, और अध्ययन, अध्यापन या किसी भी सृजन-कार्य से पूर्व प्रायः जपा जाता है।