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श्रीदत्तात्रेय वज्रकवचम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 गुरुवार, दत्त जयन्ती, तथा दिन के आरम्भ से पूर्व प्रातःकाल·📜 Datta-sampradaya and Tantric tradition (associated with the Rudrayamala); traditionally revealed to the sage Narada

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अर्थ

श्रीदत्तात्रेय वज्रकवचम् एक अत्यन्त प्रभावशाली 'वज्र-कवच' स्तोत्र है, जो भगवान् दत्तात्रेय से भक्त के शरीर, मन और परिवेश के प्रत्येक अंग की रक्षा की प्रार्थना करता है। यह अंग-रक्षण के रूप में रचित है और परम्परा में इसे नारद को प्रकट किया गया कहा जाता है; यह सिर, इन्द्रियों, देह तथा आठों दिशाओं को दिगम्बर अवधूत की सर्वव्यापी उपस्थिति से सुरक्षित करता है। यह दत्त परम्परा के सर्वाधिक प्रसिद्ध रक्षा-स्तोत्रों में से एक है, जिसे सुरक्षा, आरोग्य और भयनिवारण के लिए पढ़ा जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Datta-sampradaya and Tantric tradition (associated with the Rudrayamala); traditionally revealed to the sage Narada · Traditional (revealed of old to the sage Narada within the Datta tradition) · Ancient (Puranic / Agamic)

वज्रकवचम् दत्त-सम्प्रदाय के समृद्ध रक्षा-साहित्य का अंग है, जिसमें भगवान् दत्तात्रेय — ब्रह्मा, विष्णु और शिव के अवधूत स्वरूप — एक अजेय कवच के रूप में आह्वान किए जाते हैं। अंग-रक्षण के शास्त्रीय रूप में रचित यह स्तोत्र उन भगवान् को बुलाता है, जो सहस्रार, इन्द्रियों और समस्त दिशाओं में व्याप्त हैं, कि वे भक्त की पूर्णतः रक्षा करें। परम्परा मानती है कि यह 'वज्र-कवच' सर्वप्रथम दिव्य ऋषि नारद को सुनाया गया और तब से दत्त भक्त इसे हर प्रकार के संकट एवं रोग से रक्षा हेतु पढ़ते आए हैं।

शास्त्रों में वर्णित

दत्त परम्परा ऐसे भक्तों के वृत्तान्तों से भरी है, जो प्रतिदिन के पाठ द्वारा इस 'वज्र' कवच को धारण कर दुर्घटनाओं, रोग, शत्रु-अभिचार और गम्भीर संकट से सुरक्षित रहे — क्योंकि कवच स्वयं घोषित करता है कि जो अंग असुरक्षित रह गए, उनकी भी सदा रक्षा दिगम्बर दत्तात्रेय करते हैं, जो शरणागत को कभी नहीं त्यागते।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

दत्तात्रेय शिरः पातु सहस्राब्जेषु संस्थितः। भालं पात्वानसूयेयश्चन्द्रमण्डलमध्यगः॥

Om Dattaatreya Shirah paatu Sahasraabjeshu samsthitah. Bhaalam paatv-Anasuyeyash-Chandra-mandala-madhya-gah.

अर्थ:ॐ। सहस्रदल कमल में विराजमान भगवान् दत्तात्रेय मेरे सिर की रक्षा करें; चन्द्रमण्डल के मध्य में स्थित अनसूयानन्दन मेरे भाल की रक्षा करें॥

श्लोक 2

कूर्चं मनोमयः पातु हं क्षं द्विदलपद्मभूः। ज्योतीरूपोऽक्षिणी पातु पातु शब्दात्मकः श्रुती॥

Koorcham mano-mayah paatu Ham Ksham dvi-dala-padma-bhooh. Jyoti-roopo'kshinee paatu paatu shabdaatmakah shrutee.

अर्थ:जो मनःस्वरूप, हं-क्षं बीजों सहित द्विदल कमल में उदित हैं, वे भ्रूमध्य की रक्षा करें; ज्योतिःस्वरूप मेरे नेत्रों की रक्षा करें, और शब्दात्मक मेरे कानों की रक्षा करें॥

श्लोक 3

नासिकां पातु गन्धात्मा मुखं पातु रसात्मकः। जिह्वां वेदात्मकः पातु दन्तोष्ठौ पातु धार्मिकः॥

Naasikaam paatu gandhaatmaa mukham paatu rasaatmakah. Jihvaam vedaatmakah paatu dantoshthau paatu dhaarmikah.

अर्थ:गन्धात्मक मेरी नासिका की रक्षा करें; रसात्मक मेरे मुख की रक्षा करें; वेदात्मक मेरी जिह्वा की रक्षा करें; और धार्मिक मेरे दाँत-ओठों की रक्षा करें॥

श्लोक 4

कपोलावत्रिभूः पातु पात्वशेषं ममात्मवित्। सर्वाङ्गं पातु सर्वेशः सर्वगः सर्वतोमुखः॥

Kapolaav-Atri-bhooh paatu paatv-ashesham mam-aatma-vit. Sarvaangam paatu Sarveshah Sarva-gah sarvato-mukhah.

अर्थ:अत्रिनन्दन मेरे कपोलों की रक्षा करें, और मेरा आत्मवेत्ता शेष समस्त की रक्षा करें; सर्वव्यापी, सर्वतोमुख सर्वेश मेरे सम्पूर्ण अंग की रक्षा करें॥

श्लोक 5

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं मे सदा पातु दत्तात्रेयो दिगम्बरः॥

Rakshaa-heenam tu yat-sthaanam varjitam kavachena tu. Tat-sarvam me sadaa paatu Dattaatreyo Digambarah.

अर्थ:जो भी स्थान रक्षारहित रह गया और इस कवच द्वारा छूट गया — उन सबकी सदा रक्षा दिगम्बर दत्तात्रेय करें॥

श्लोक 6

इन्द्रादिदिक्षु मां पातु शङ्खचक्रगदाधरः। वज्रिणं वारुणीशं पातु पाशधरो हरिः॥

Indraadi-dikshu maam paatu Shankha-chakra-gadaa-dharah. Vajrinam Vaaruneesham cha paatu paasha-dharo Harih.

अर्थ:शंख-चक्र-गदाधारी इन्द्रादि दिशाओं में मेरी रक्षा करें; पाशधारी हरि वहाँ रक्षा करें जहाँ वज्रधारी (इन्द्र) और वरुणेश विराजते हैं॥

श्लोक 7

इदं तु कवचं दिव्यं वज्रकल्पं महाद्भुतम्। दत्तात्रेयस्य योगीन्द्र नारदाय पुरा जगौ॥

Idam tu kavacham divyam vajra-kalpam mahaadbhutam. Dattaatreyasya yogeendra Naaradaaya puraa jagau.

अर्थ:यह दिव्य, महाद्भुत, वज्र के समान दृढ़ कवच — योगीन्द्र दत्तात्रेय का वज्रकवच है — जिसे प्राचीन काल में नारद को सुनाया गया था॥

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

ॐ दत्तात्रेय शिरः पातु🔊Om Dattaatreya Shirah paatuॐ, भगवान् दत्तात्रेय मेरे सिर की रक्षा करें
सहस्राब्जेषु संस्थितः🔊Sahasraabjeshu samsthitahजो सहस्रदल कमल (सहस्रार) में विराजमान हैं
भालं पातु🔊Bhaalam paatuवे मेरे भाल (ललाट) की रक्षा करें
अनसूयेयः🔊Anasuyeyahअनसूयानन्दन (दत्तात्रेय)
चन्द्रमण्डलमध्यगः🔊Chandra-mandala-madhya-gahजो चन्द्रमण्डल के मध्य (आज्ञा-क्षेत्र) में स्थित हैं
ज्योतीरूपः अक्षिणी पातु🔊Jyoti-roopah akshinee paatuज्योतिःस्वरूप वे मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करें
शब्दात्मकः श्रुती पातु🔊Shabdaatmakah shrutee paatuशब्दस्वरूप वे मेरे दोनों कानों की रक्षा करें
नासिकां पातु गन्धात्मा🔊Naasikaam paatu gandhaatmaaगन्धस्वरूप मेरी नासिका की रक्षा करें
मुखं पातु रसात्मकः🔊Mukham paatu rasaatmakahरसस्वरूप मेरे मुख की रक्षा करें
जिह्वां वेदात्मकः पातु🔊Jihvaam vedaatmakah paatuवेदस्वरूप मेरी जिह्वा की रक्षा करें
दन्तोष्ठौ पातु धार्मिकः🔊Dantoshthau paatu dhaarmikahधार्मिक (धर्मात्मा) मेरे दाँतों और ओठों की रक्षा करें
कपोलौ अत्रिभूः पातु🔊Kapolau Atri-bhooh paatuअत्रिनन्दन मेरे कपोलों (गालों) की रक्षा करें
सर्वाङ्गं पातु सर्वेशः🔊Sarvaangam paatu Sarveshahसर्वेश (सबके स्वामी) मेरे सम्पूर्ण अंग की रक्षा करें
सर्वगः सर्वतोमुखः🔊Sarva-gah sarvato-mukhahसर्वव्यापी, सर्वतोमुख (सब दिशाओं में मुख वाले)
रक्षाहीनं तु यत्स्थानम्🔊Rakshaa-heenam tu yat-sthaanamजो भी स्थान रक्षारहित रह गया
वर्जितं कवचेन तु🔊Varjitam kavachena tuऔर इस कवच द्वारा छूट गया
तत्सर्वं मे सदा पातु🔊Tat-sarvam me sadaa paatuउन सबकी सदा मेरी रक्षा करें
दत्तात्रेयो दिगम्बरः🔊Dattaatreyo Digambarahदिगम्बर दत्तात्रेय द्वारा
शङ्खचक्रगदाधरः🔊Shankha-chakra-gadaa-dharahशंख, चक्र और गदाधारी
कवचं दिव्यं वज्रकल्पम्🔊Kavacham divyam vajra-kalpamयह दिव्य कवच, वज्र के समान दृढ़ एवं अप्रतिहत
नारदाय पुरा जगौ🔊Naaradaaya puraa jagauजो प्राचीन काल में (ऋषि द्वारा) नारद को सुनाया गया था

श्रीदत्तात्रेय वज्रकवचम् पाठ के लाभ

भगवान् दत्तात्रेय को रक्षा के सर्वव्यापी 'वज्र' (वज्रसम) कवच के रूप में आह्वान करता है।

प्रत्येक अंग, इन्द्रिय और आठों दिशाओं की रक्षा करता है, कुछ भी असुरक्षित नहीं छोड़ता।

परम्परागत रूप से भय, संकट, रोग, अभिचार (काला जादू) और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने हेतु पठित।

साहस, सुरक्षा तथा सद्गुरु की स्थिर, घेरने वाली उपस्थिति प्रदान करता है।

रोगनिवारक माना जाता है, क्योंकि दत्त की समस्त पीड़ाओं के हर्ता के रूप में स्तुति है।

भक्ति तथा दत्त की कृपा पर पूर्ण निर्भरता को सुदृढ़ करता है।

गुरुवार और दत्त जयन्ती को पढ़े जाने पर विशेष रूप से प्रभावशाली।

श्रीदत्तात्रेय वज्रकवचम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयगुरुवार, दत्त जयन्ती, तथा दिन के आरम्भ से पूर्व प्रातःकाल

स्नान के पश्चात पूर्वाभिमुख होकर भगवान् दत्तात्रेय की मूर्ति के सम्मुख बैठें और दीप जलाएँ। वज्रकवचम् का धीरे-धीरे पाठ करें, प्रत्येक अंग के नामोल्लेख के साथ उस पर मन से दत्त की रक्षा स्थापित करते हुए (अंग-न्यास)। इसे आदर्शतः प्रातः सम्पूर्ण दिन को कवचित करने हेतु जपा जाता है, तथा यात्रा से पूर्व या संकट के समय भी पढ़ा जा सकता है। अन्त में स्वयं को पूर्णतः दिगम्बर भगवान् की रक्षा में समर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह भगवान् दत्तात्रेय को सम्बोधित एक रक्षा-स्तोत्र ('कवच' अर्थात् कवच) है, जिसमें उनकी रक्षा प्रत्येक अंग, इन्द्रिय और दिशा पर आह्वान की जाती है। 'वज्र' अर्थात् वज्र, यह दर्शाता है कि यह कवच अभेद्य है। यह दत्त परम्परा के सर्वाधिक पूजनीय रक्षा-स्तोत्रों में से एक है।
श्लोक-दर-श्लोक यह दत्त से सिर, ललाट, भ्रूमध्य, नेत्र, कान, नासिका, मुख, जिह्वा, दाँत, गाल और सम्पूर्ण देह, फिर आठों दिशाओं, और अन्ततः किसी भी अनुल्लिखित अंग की रक्षा की प्रार्थना करता है। इस प्रकार यह भगवान् की उपस्थिति का पूर्ण, चतुर्दिक् कवच रचता है।
परम्परानुसार भगवान् दत्तात्रेय का यह 'वज्र-कवच' प्राचीन काल में दिव्य ऋषि नारद को सुनाया गया, और यह दत्त-सम्प्रदाय तथा तान्त्रिक (रुद्रयामल) परम्परा में सुरक्षित है। तब से दत्त भक्तों द्वारा यह संजोया एवं प्रसारित किया जाता रहा है।
यह गुरुवार, गुरु के दिन, तथा दत्त जयन्ती पर सर्वाधिक शुभ है। अनेक लोग आने वाले दिन की रक्षा हेतु प्रत्येक प्रातः इसका पाठ करते हैं, तथा यात्रा से पूर्व या भय एवं संकट के समय भी।

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