दुर्जनः परिहर्तव्यः
अन्य नाम / खोज: durjanah parihartavyah · durjanah parihartavyo vidyayalankrito api san · jewelled serpent shloka · mani na bhushitah sarpah · bhartrhari shloka on bad company
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✦ अर्थ
भर्तृहरि के नीतिशतक का यह तीक्ष्ण श्लोक चेतावनी देता है कि केवल विद्वान होने के कारण किसी दुर्जन की संगति नहीं करनी चाहिए। जैसे मणि धारण करने से सर्प कम घातक नहीं हो जाता, वैसे ही दुष्ट स्वभाव वाला व्यक्ति कितना भी परिष्कृत ज्ञान वाला क्यों न हो, भयंकर ही रहता है। यह श्लोक संगति के चुनाव में विवेक सिखाता है और सच्चरित्र को केवल विद्या या बाह्य चमक से कहीं ऊपर रखता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhartrhari Niti Shataka · Bhartrhari · Classical Sanskrit literature (c. 5th century CE)
नीतिशतक भर्तृहरि के तीन प्रसिद्ध शतकों में से पहला है, जो आचरण, ज्ञान और सांसारिक रीतियों पर सौ सूक्तियों का संग्रह है। चरित्र और विवेक पर इसके अनेक श्लोकों में, यह श्लोक मणि-अलंकृत सर्प के अविस्मरणीय चित्र का प्रयोग करके चेतावनी देता है कि दुष्ट स्वभाव वाला व्यक्ति, चाहे कितना भी विद्वान हो, त्याज्य है — क्योंकि ज्ञान किसी दुष्ट हृदय को सुरक्षित नहीं बना सकता।
✦ शास्त्रों में वर्णित
नीति के शिक्षक इस श्लोक का स्मरण तब करते हैं जब प्रतिभा को भलाई समझ लिया जाता है, और विद्यार्थियों को याद दिलाते हैं कि सबसे खतरनाक लोग प्रायः सबसे प्रतिभाशाली होते हैं। कहा जाता है कि जो इस चेतावनी पर ध्यान देता है वह बहुत दुःख से बच जाता है, क्योंकि वह किसी साथी को केवल चतुराई से नहीं, चरित्र से परखता है।
मंत्र
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दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालङ्कृतोऽपि सन्। मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः॥
durjanaḥ parihartavyo vidyayālaṅkṛto'pi san। maṇinā bhūṣitaḥ sarpaḥ kim asau na bhayaṅkaraḥ॥
अर्थ:दुर्जन को त्याग देना चाहिए, भले ही वह विद्या से अलंकृत क्यों न हो। जैसे मणि से सुशोभित सर्प — क्या वह कम भयंकर हो जाता है? यह श्लोक चेतावनी देता है कि केवल विद्या किसी व्यक्ति को संगति योग्य नहीं बना देती; दुष्ट स्वभाव कितना भी विद्वान क्यों न दिखे, भयंकर ही रहता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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दुर्जनः परिहर्तव्यः पाठ के लाभ
अपनी संगति और मित्रों के चुनाव में विवेक सिखाता है
चेतावनी देता है कि सच्चरित्र के बिना विद्या भी खतरनाक हो सकती है
सद्गुण और सच्चाई को केवल ज्ञान या चतुराई से ऊपर रखता है
एक सजीव, अविस्मरणीय चित्र प्रस्तुत करता है — मणिधारी किन्तु घातक सर्प
आकर्षक किन्तु दुष्ट स्वभाव वाले लोगों के प्रति सतर्कता को प्रोत्साहित करता है
चरित्र और सत्संगति पर मनन के लिए एक छोटा, स्मरणीय श्लोक
दुर्जनः परिहर्तव्यः जप विधि
श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें, उस तीक्ष्ण चित्र को मन में धारण करते हुए जिसमें सर्प मणि से सुशोभित है फिर भी कम घातक नहीं। मनन करें कि सच्ची सुरक्षा सच्चरित्र में है, केवल प्रतिभा में नहीं, और इसे अपनी संगति के चुनाव में अपने विवेक को तीक्ष्ण करने दें। यह प्रायः नीति (व्यावहारिक ज्ञान) और सत्संगति के महत्त्व की शिक्षाओं में उद्धृत किया जाता है।