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हनुमान् वडवानल स्तोत्रम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 मंगलवार एवं शनिवार (हनुमान को प्रिय), अथवा स्नान के पश्चात् प्रातःकाल; परम्परागत अभ्यास इसे 41 दिनों तक प्रतिदिन पढ़ने का है·📜 Hanumad Vadvanala Stotra — a Tantric protective hymn from the Hanuman devotional tradition

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अर्थ

हनुमान् वडवानल स्तोत्र भगवान हनुमान का एक उग्र, रक्षात्मक तान्त्रिक स्तोत्र है, जिसकी रचना परम्परानुसार रावण के धर्मात्मा भ्राता विभीषण ने की। 'वडवानल' नाम हनुमान की शक्ति की तुलना समुद्र के भीतर जलने वाली बडवाग्नि से करता है, जो समस्त अनिष्ट को भस्म कर देती है। शक्तिशाली बीजाक्षरों युक्त आज्ञापक मन्त्रगद्य में रचित यह स्तोत्र हनुमान से प्रार्थना करता है कि वे समस्त ज्वर-रोगों को काट दें, भूत-प्रेत और दुष्ट ग्रहों को भगा दें, काला जादू और विष को निष्फल करें, तथा भक्त की समस्त विपत्ति, दारिद्र्य और संकट से रक्षा करें।

उत्पत्ति और कथा

Hanumad Vadvanala Stotra — a Tantric protective hymn from the Hanuman devotional tradition · Traditionally ascribed to Vibhishana (the viniyoga names Sri Ramachandra as the rishi) · Classical / medieval Tantric tradition, rooted in the Ramayana legend

परम्परा के अनुसार, इस स्तोत्र की रचना रावण के भ्राता तथा राम के महान् भक्त विभीषण ने की। हनुमान को अपनी जलती पूँछ से लंका को भस्म करते तथा राक्षससेना को कुचलते देखकर, विभीषण उस वानर-वीर की शक्ति से अभिभूत हो गए और उन्हें 'वडवानल' — समुद्र के भीतर सब कुछ निगल जाने वाली बडवाग्नि — कहकर स्तुति की। यह स्तोत्र एक उग्र रक्षात्मक मन्त्र के रूप में रचा गया है: केवल हनुमान के कार्यों (लंका दहन, समुद्र-सेतु, रावण के शिर काटना, सीता को सान्त्वना) का वर्णन करने के बजाय, यह सीधे ज्वरों, आत्माओं, अनिष्टकारी ग्रहों तथा प्रत्येक संकट के निवारण की आज्ञा देता है, जो इसे रक्षा एवं आरोग्य हेतु हनुमान के सर्वाधिक शक्तिशाली कवच-तुल्य स्तोत्रों में से एक बनाता है।

शास्त्रों में वर्णित

ज़िद्दी ज्वरों, रहस्यमय रोगों अथवा काले जादू एवं दुष्ट आत्माओं की पीड़ा से ग्रस्त भक्त लम्बे समय से इस स्तोत्र की शरण लेते आए हैं, और परम्परा मानती है कि इसे 41 दिनों तक प्रतिदिन पढ़ने से अनेकों को उन कष्टों से मुक्ति मिली है जिन्हें कोई अन्य उपाय छू भी न सका। कहा जाता है कि जहाँ यह स्तोत्र श्रद्धा से पढ़ा जाता है, वहाँ हनुमान घर के चारों ओर अग्नि की दीवार बनकर खड़े रहते हैं, जिससे कोई आत्मा, अभिशाप या अनिष्टकारी ग्रह भक्त को हानि पहुँचाने के लिए पार न कर सके।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

अस्य श्रीहनुमद्वडवानलस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः, श्रीवडवानलहनुमान् देवता, मम सर्वोपद्रवशान्त्यर्थे जपे विनियोगः॥

asya śrī-hanumad-vaḍavānala-stotra-mantrasya śrī-rāmachandra ṛṣiḥ, śrī-vaḍavānala-hanumān devatā, mama sarvopadrava-śāntyarthe jape viniyogaḥ॥

अर्थ:विनियोग — इस श्रीहनुमद्वडवानल स्तोत्रमन्त्र के ऋषि श्रीरामचन्द्र हैं, देवता श्रीवडवानल हनुमान् हैं; मेरे समस्त उपद्रवों की शान्ति के लिए जप में इसका विनियोग है।

श्लोक 2

ह्रां ह्रीं नमो भगवते श्रीमहाहनुमते प्रकटपराक्रम सकलदिग्मण्डल यशोवितान धवलीकृत जगत्त्रितय वज्रदेह रुद्रावतार लङ्कापुरीदहन उमाअर्गलमन्त्र उदधिबन्धन दशशिरःकृन्तन सीताआश्वासन वायुपुत्र अञ्जनीगर्भसम्भूत श्रीरामलक्ष्मणानन्दकर कपिसैन्यप्राकार सुग्रीवसाह्यकारक पर्वतोत्पाटन कुमारब्रह्मचारिन् गम्भीरनाद सर्वपापग्रहवारण सर्वज्वरोच्चाटन डाकिनीविध्वंसन॥

oṁ hrāṁ hrīṁ oṁ namo bhagavate śrī-mahā-hanumate prakaṭa-parākrama sakala-dig-maṇḍala yaśo-vitāna dhavalī-kṛta jagat-tritaya vajra-deha rudrāvatāra laṅkā-purī-dahana umā-argala-mantra udadhi-bandhana daśa-śiraḥ-kṛntana sītā-āśvāsana vāyu-putra añjanī-garbha-sambhūta śrī-rāma-lakṣmaṇānanda-kara kapi-sainya-prākāra sugrīva-sāhya-kāraka parvatotpāṭana kumāra-brahmachārin gambhīra-nāda sarva-pāpa-graha-vāraṇa sarva-jvarochchāṭana ḍākinī-vidhvaṁsana॥

अर्थ:ॐ ह्रां ह्रीं ॐ। प्रकट पराक्रम वाले, अपने यश के वितान से समस्त दिशाओं और तीनों लोकों को धवल करने वाले, वज्रदेह, रुद्र के अवतार, लंकापुरी को दग्ध करने वाले, उमा के अर्गला-मन्त्र के स्वामी, समुद्र को बाँधने वाले, दशमुख (रावण) के शिरों को काटने वाले, सीता को आश्वासन देने वाले, वायुपुत्र, अञ्जनी के गर्भ से उत्पन्न, श्रीराम-लक्ष्मण को आनन्द देने वाले, वानरसेना के प्राकार, सुग्रीव के सहायक, पर्वतों को उखाड़ने वाले, कुमार ब्रह्मचारी, गम्भीर नाद वाले, समस्त पाप-ग्रहों के निवारक, समस्त ज्वरों के उच्चाटक, डाकिनियों के विध्वंसक — श्रीमहाहनुमान् को नमस्कार।

श्लोक 3

ह्रां ह्रीं नमो भगवते महावीरवीराय सर्वदुःखनिवारणाय ग्रहमण्डल सर्वभूतमण्डल सर्वपिशाचमण्डलोच्चाटन भूतज्वर एकाहिकज्वर द्वयाहिकज्वर त्र्याहिकज्वर चातुर्थिकज्वर सन्ततज्वर विषमज्वर तापज्वर माहेश्वर वैष्णवज्वरान् छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि यक्षब्रह्मराक्षस भूतप्रेतपिशाचान् उच्चाटय उच्चाटय॥

oṁ hrāṁ hrīṁ oṁ namo bhagavate mahāvīra-vīrāya sarva-duḥkha-nivāraṇāya graha-maṇḍala sarva-bhūta-maṇḍala sarva-piśācha-maṇḍalochchāṭana bhūta-jvara ekāhika-jvara dvyāhika-jvara tryāhika-jvara chāturthika-jvara santata-jvara viṣama-jvara tāpa-jvara māheśvara vaiṣṇava-jvarān chhindhi chhindhi bhindhi bhindhi yakṣa-brahma-rākṣasa bhūta-preta-piśāchān uchchāṭaya uchchāṭaya॥

अर्थ:ॐ ह्रां ह्रीं ॐ। महावीरों में वीर, समस्त दुःखों के निवारक भगवान को नमस्कार: ग्रहमण्डल, समस्त भूतमण्डल और समस्त पिशाचमण्डल को उच्चाटित करो! भूतज्वर, एकाहिक, द्वयाहिक, त्र्याहिक, चातुर्थिक ज्वर, सततज्वर, विषमज्वर, तापज्वर तथा माहेश्वर और वैष्णव ज्वरों को छिन्न करो, छिन्न करो! भिन्न करो, भिन्न करो! यक्ष, ब्रह्मराक्षस, भूत, प्रेत, पिशाचों को उच्चाटित करो, उच्चाटित करो!

श्लोक 4

ह्रां ह्रीं नमो भगवते श्रीमहाहनुमते ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां सौं एहि एहि हं हं हं हं नमो भगवते श्रीमहाहनुमते श्रवणचक्षुर्भूतानां शाकिनी डाकिनीनां विषमदुष्टानां सर्वविषं हर हर आकाशभुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय प्रहारय प्रहारय सकलमायां भेदय भेदय॥

oṁ hrāṁ hrīṁ oṁ namo bhagavate śrī-mahā-hanumate oṁ hrāṁ hrīṁ hrūṁ hraiṁ hrauṁ hraḥ oṁ āṁ hāṁ hāṁ hāṁ oṁ sauṁ ehi ehi oṁ haṁ oṁ haṁ oṁ haṁ oṁ haṁ oṁ namo bhagavate śrī-mahā-hanumate śravaṇa-chakṣur-bhūtānāṁ śākinī ḍākinīnāṁ viṣama-duṣṭānāṁ sarva-viṣaṁ hara hara ākāśa-bhuvanaṁ bhedaya bhedaya chhedaya chhedaya māraya māraya śoṣaya śoṣaya mohaya mohaya jvālaya jvālaya prahāraya prahāraya sakala-māyāṁ bhedaya bhedaya॥

अर्थ:ॐ ह्रां ह्रीं ॐ। श्रीमहाहनुमान् को नमस्कार। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः; ॐ आं हां हां हां ॐ सौं — आओ, आओ! ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं। श्रीमहाहनुमान् को नमस्कार: कान और नेत्र को पीड़ित करने वाले भूतों का, शाकिनी-डाकिनियों का, विषम-दुष्टों का समस्त विष हर लो, हर लो! आकाश और भुवन को भेदो, भेदो! छेदो, छेदो! मारो, मारो! शोषो, शोषो! मोहित करो, मोहित करो! जलाओ, जलाओ! प्रहार करो, प्रहार करो! समस्त माया को भेदो, भेदो!

श्लोक 5

ह्रां ह्रीं नमो भगवते महाहनुमते ह्रां ह्रीं हूं फट् स्वाहा।

oṁ hrāṁ hrīṁ oṁ namo bhagavate mahā-hanumate oṁ hrāṁ hrīṁ hūṁ phaṭ svāhā।

अर्थ:ॐ ह्रां ह्रीं ॐ। श्रीमहाहनुमान् को नमस्कार। ॐ ह्रां ह्रीं हुं फट् स्वाहा।

श्लोक 6

नमो भगवते श्रीमहाहनुमते भूतप्रेतपिशाचब्रह्मराक्षस शाकिनीडाकिनीगणान् सर्वग्रहान् सर्वज्वरान् सर्वोपद्रवान् सर्वापत्तीः सर्वदारिद्र्यं हर हर भक्तानां रक्षां कुरु कुरु ह्रां ह्रीं हुं फट् स्वाहा॥

oṁ namo bhagavate śrī-mahā-hanumate bhūta-preta-piśācha-brahma-rākṣasa śākinī-ḍākinī-gaṇān sarva-grahān sarva-jvarān sarvopadravān sarvāpattīḥ sarva-dāridryaṁ hara hara bhaktānāṁ rakṣāṁ kuru kuru oṁ hrāṁ hrīṁ oṁ huṁ phaṭ svāhā॥

अर्थ:ॐ। श्रीमहाहनुमान् को नमस्कार: भूत-प्रेत-पिशाच-ब्रह्मराक्षस, शाकिनी-डाकिनी गणों को, समस्त ग्रहों को, समस्त ज्वरों को, समस्त उपद्रवों को, समस्त आपत्तियों को और समस्त दारिद्र्य को हर लो, हर लो! भक्तों की रक्षा करो, रक्षा करो! ॐ ह्रां ह्रीं ॐ हुं फट् स्वाहा।

श्लोक 7

इति श्रीविभीषणकृतं हनुमद्वडवानलस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

iti śrī-vibhīṣaṇa-kṛtaṁ hanumad-vaḍavānala-stotraṁ sampūrṇam॥

अर्थ:इस प्रकार श्रीविभीषण द्वारा रचित हनुमद्वडवानल स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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वडवानल🔊vaḍavānalaवडवानल — समुद्र के भीतर जलने वाली बडवाग्नि (अश्वमुखी अग्नि) — हनुमान की सर्वभक्षी शक्ति का रूपक
ॐ ह्रां ह्रीं🔊oṁ hrāṁ hrīṁॐ ह्रां ह्रीं — हनुमान की रक्षात्मक ऊर्जा का आवाहन करने वाले शक्तिशाली बीजाक्षर
नमो भगवते श्रीमहाहनुमते🔊namo bhagavate śrī-mahā-hanumateभगवान् श्रीमहाहनुमान् को नमस्कार
प्रकटपराक्रम🔊prakaṭa-parākramaप्रकट, स्पष्ट पराक्रम वाले
वज्रदेह🔊vajra-dehaवज्र के समान कठोर (हीरक) देह वाले
रुद्रावतार🔊rudrāvatāraरुद्र (शिव) के अवतार
लङ्कापुरीदहन🔊laṅkā-purī-dahanaलंकापुरी को दग्ध करने वाले
उदधिबन्धन🔊udadhi-bandhanaजिन्होंने समुद्र को बाँधने/सेतु बाँधने में सहायता की
वायुपुत्र🔊vāyu-putraवायु (पवनदेव) के पुत्र
अञ्जनीगर्भसम्भूत🔊añjanī-garbha-sambhūtaअञ्जनी के गर्भ से उत्पन्न
कुमारब्रह्मचारिन्🔊kumāra-brahmachārinयुवा, आजीवन ब्रह्मचारी
सर्वपापग्रहवारण🔊sarva-pāpa-graha-vāraṇaसमस्त पाप एवं अनिष्टकारी ग्रहों के निवारक
सर्वज्वरोच्चाटन🔊sarva-jvarochchāṭanaसमस्त ज्वरों के उच्चाटक (नाश करने वाले)
डाकिनीविध्वंसन🔊ḍākinī-vidhvaṁsanaडाकिनियों (दुष्ट आत्माओं) के विध्वंसक
सर्वदुःखनिवारणाय🔊sarva-duḥkha-nivāraṇāyaसमस्त दुःखों को दूर करने वाले को (नमस्कार)
एकाहिकज्वर🔊ekāhika-jvaraएकाहिक ज्वर — प्रतिदिन आने वाला ज्वर
चातुर्थिकज्वर🔊chāturthika-jvaraचातुर्थिक ज्वर — हर चौथे दिन आने वाला ज्वर
विषमज्वर🔊viṣama-jvaraविषम / दुःसाध्य ज्वर
छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि🔊chhindhi chhindhi bhindhi bhindhiछिन्न करो, छिन्न करो! भिन्न करो, भिन्न करो! (आपत्तियों के नाश की आज्ञा)
उच्चाटय उच्चाटय🔊uchchāṭaya uchchāṭayaउच्चाटित करो, उच्चाटित करो (दुष्ट शक्तियों को भगाओ)
शाकिनी डाकिनीनाम्🔊śākinī ḍākinīnāmशाकिनी-डाकिनियों का (हानिकारक आत्माओं के वर्ग)
सर्वविषं हर हर🔊sarva-viṣaṁ hara haraसमस्त विष हर लो, हर लो
शोषय शोषय🔊śoṣaya śoṣayaशोषो, शोषो (आपत्ति को सुखा दो)
हुं फट् स्वाहा🔊huṁ phaṭ svāhāहुं फट् स्वाहा — आवाहन को सील एवं विसर्जित करने वाले उग्र समापन मन्त्राक्षर
सर्वदारिद्र्यं हर हर🔊sarva-dāridryaṁ hara haraसमस्त दारिद्र्य को हर लो, हर लो
भक्तानां रक्षां कुरु कुरु🔊bhaktānāṁ rakṣāṁ kuru kuruभक्तों की रक्षा करो, रक्षा करो
इति श्रीविभीषणकृतम्🔊iti śrī-vibhīṣaṇa-kṛtamइस प्रकार (यह स्तोत्र) विभीषण द्वारा रचित

हनुमान् वडवानल स्तोत्रम् पाठ के लाभ

काले जादू, बुरी नज़र, अभिशाप और नकारात्मक तान्त्रिक शक्तियों से शक्तिशाली रक्षा प्रदान करता है

परम्परागत रूप से ज़िद्दी ज्वरों तथा पुराने, दुःसाध्य रोगों से मुक्ति के लिए पढ़ा जाता है

भूत-प्रेत, शाकिनी-डाकिनी तथा अन्य दुष्ट आत्माओं को दूर भगाता है

अनिष्टकारी ग्रहों (ग्रह दोष) के बुरे प्रभावों को निष्फल करता है और बाधाओं को दूर करता है

विष तथा क्रूर, शत्रुभावी प्राणियों के अनिष्ट का प्रतिकार करने वाला कहा जाता है

श्रद्धा से जप करने पर विपत्ति, दुर्भाग्य और दारिद्र्य को दूर करता है

भक्त एवं घर के चारों ओर साहस, निर्भयता तथा एक रक्षात्मक कवच प्रदान करता है

हनुमान् वडवानल स्तोत्रम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयमंगलवार एवं शनिवार (हनुमान को प्रिय), अथवा स्नान के पश्चात् प्रातःकाल; परम्परागत अभ्यास इसे 41 दिनों तक प्रतिदिन पढ़ने का है

यह एक उग्र रक्षात्मक तान्त्रिक स्तोत्र है, अतः इसे लापरवाही से नहीं, अपितु स्वच्छता, श्रद्धा एवं स्थिरता के साथ करना चाहिए। स्नान करके हनुमान की प्रतिमा के समक्ष बैठें, तिल के तेल का दीप जलाएँ; सिन्दूर एवं माला अर्पित करना शुभ है। विनियोग से आरम्भ करें, फिर दृढ़ संकल्प के साथ स्तोत्र का सस्वर पाठ करें, बीज-मन्त्रों (ॐ ह्रां ह्रीं... हुं फट् स्वाहा) का सावधानी से उच्चारण करते हुए। अनेक साधक किसी विशेष आपत्ति, रोग या ज़िद्दी संकट को दूर करने हेतु इसे 41 दिनों तक प्रतिदिन एक बार, बिना नागा पढ़ते हैं। अन्त में रक्षा की प्रार्थना तथा हनुमान के प्रति कृतज्ञता अर्पित करके समापन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'वडवानल' (या वडवानल) पौराणिक बडवाग्नि है — एक अश्वमुखी अग्नि जो समुद्र के नीचे निरन्तर जलती रहती है। यह स्तोत्र हनुमान की प्रचण्ड, सर्वभक्षी शक्ति की तुलना इस अग्नि से करता है, यह संकेत करते हुए कि वे प्रत्येक रोग, दुष्ट आत्मा और संकट को वैसे ही भस्म कर सकते हैं जैसे बडवाग्नि जल को।
परम्परा इसका श्रेय विभीषण को देती है, जो रावण के धर्मात्मा छोटे भ्राता थे और राम के भक्त बने। लंका दहन तथा युद्ध के समय हनुमान की प्रबल शक्ति को देखकर, विभीषण ने उनकी स्तुति में यह रक्षात्मक स्तोत्र रचा कहा जाता है; अन्तिम पंक्ति 'इति विभीषणकृतम्' है।
यह एक रक्षात्मक एवं आरोग्यकारी स्तोत्र है, जो हर प्रकार के संकटों के विरुद्ध आवाहित किया जाता है — ज़िद्दी ज्वर एवं पुराने रोग, काला जादू एवं बुरी नज़र, भूत-प्रेत, अनिष्टकारी ग्रह दशा (ग्रह दोष), विष, तथा सामान्य विपत्ति, दारिद्र्य एवं भय। यह हनुमान से इन आपत्तियों को काटने, भगाने एवं भस्म करने तथा भक्त की रक्षा करने की प्रार्थना करता है।
चूँकि यह बीजाक्षरों युक्त एक उग्र मन्त्र-स्तोत्र है, इसे स्वच्छता, भक्ति एवं एकाग्रता के साथ, आदर्शतः मंगलवार या शनिवार को पढ़ना सर्वोत्तम है। किसी विशेष रोग या संकट से मुक्ति चाहने पर एक सामान्य अभ्यास है इसे 41 दिनों तक प्रतिदिन बिना नागा एक बार पढ़ना, साथ ही हनुमान की रक्षा में श्रद्धा बनाए रखना।

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