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परशुराम अष्टकम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः या संध्या; विशेष रूप से गुरुवार और एकादशी·📜 Traditional

अन्य नाम / खोज: shubhradeham sada krodharaktekshanam · parashurama ashtakam lyrics

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अर्थ

परशुराम अष्टकम् भगवान परशुराम — विष्णु के छठे अवतार, फरसाधारी, उग्र तेजस्वी योद्धा-ऋषि, जमदग्नि-पुत्र व समस्त शस्त्रों के स्वामी — की आठ श्लोकों की स्तुति है। श्रद्धा से इसका पाठ करने पर भगवान की कृपा और रक्षा प्राप्त होती है। यह मन को शांत करता है और भक्ति को बढ़ाता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional · Traditional · Classical

परशुराम अष्टकम् एक प्रिय पारंपरिक स्तोत्र है। यह परशुराम — विष्णु के छठे अवतार, फरसाधारी, उग्र तेजस्वी योद्धा-ऋषि, जमदग्नि-पुत्र व समस्त शस्त्रों के स्वामी — की आठ श्लोकों की स्तुति है।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि सच्चे और भक्तिमय हृदय से परशुराम अष्टकम् का पाठ करना उन भगवान की कृपा के निकट जाना है, जो प्रेम से उन्हें पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागते।

मंत्र

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शुभ्रदेहं सदा क्रोधरक्तेक्षणम् भक्तपालं कृपालुं कृपावारिधिम् विप्रवंशावतंसं धनुर्धारिणम् भव्ययज्ञोपवीतं कलाकारिणम् यस्य हस्ते कुठारं महातीक्ष्णकम् रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे १॥ सौम्यरुपं मनोज्ञं सुरैर्वन्दितम् जन्मतः ब्रह्मचारिव्रते सुस्थिरम् पूर्णतेजस्विनं योगयोगीश्वरम् पापसन्तापरोगादिसंहारिणम् दिव्यभव्यात्मकं शत्रुसंहारकम् रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे २॥ ऋद्धिसिद्धिप्रदाता विधाता भुवो ज्ञानविज्ञानदाता प्रदाता सुखम् विश्वधाता सुत्राताऽखिलं विष्टपम् तत्त्वज्ञाता सदा पातु माम् निर्बलम् पूज्यमानं निशानाथभासं विभुम् रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ३॥ दुःख दारिद्र्यदावाग्नये तोयदम् बुद्धिजाड्यं विनाशाय चैतन्यदम् वित्तमैश्वर्यदानाय वित्तेश्वरम् सर्वशक्तिप्रदानाय लक्ष्मीपतिम् मङ्गलं ज्ञानगम्यं जगत्पालकम् रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ४॥ यश्च हन्ता सहस्रार्जुनं हैहयम् त्रैगुणं सप्तकृत्वा महाक्रोधनैः दुष्टशून्या धरा येन सत्यं कृता दिव्यदेहं दयादानदेवं भजे घोररूपं महातेजसं वीरकम् रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ५॥ मारयित्वा महादुष्ट भूपालकान् येन शोणेन कुण्डेकृतं तर्पणम् येन शोणीकृता शोणनाम्नी नदी स्वस्य देशस्य मूढा हताः द्रोहिणः स्वस्य राष्ट्रस्य शुद्धिःकृता शोभना रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ६॥ दीनत्राता प्रभो पाहि माम् पालक! रक्ष संसाररक्षाविधौ दक्षक! देहि संमोहनी भाविनी पावनी स्वीय पादारविन्दस्य सेवा परा पूर्णमारुण्यरूपं परं मञ्जुलम् रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ७॥ ये जयोद्घोषकाः पादसम्पूजकाः सत्वरं वाञ्छितं ते लभन्ते नराः देहगेहादिसौख्यं परं प्राप्य वै दिव्यलोकं तथान्ते प्रियं यान्ति ते भक्तसंरक्षकं विश्वसम्पालकम् रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे ८॥ इति श्रीपरशुरामाष्टकं सम्पूर्णम्

śubhradehaṃ sadā krodharaktekṣaṇam bhaktapālaṃ kṛpāluṃ kṛpāvāridhim vipravaṃśāvataṃsaṃ dhanurdhāriṇam bhavyayajñopavītaṃ kalākāriṇam yasya haste kuṭhāraṃ mahātīkṣṇakam reṇukānandanaṃ jāmadagnyaṃ bhaje || 1|| saumyarupaṃ manojñaṃ surairvanditam janmataḥ brahmacārivrate susthiram pūrṇatejasvinaṃ yogayogīśvaram pāpasantāparogādisaṃhāriṇam divyabhavyātmakaṃ śatrusaṃhārakam reṇukānandanaṃ jāmadagnyaṃ bhaje || 2|| ṛddhisiddhipradātā vidhātā bhuvo jñānavijñānadātā pradātā sukham viśvadhātā sutrātā'khilaṃ viṣṭapam tattvajñātā sadā pātu mām nirbalam pūjyamānaṃ niśānāthabhāsaṃ vibhum reṇukānandanaṃ jāmadagnyaṃ bhaje || 3|| duḥkha dāridryadāvāgnaye toyadam buddhijāḍyaṃ vināśāya caitanyadam vittamaiśvaryadānāya vitteśvaram sarvaśaktipradānāya lakṣmīpatim maṅgalaṃ jñānagamyaṃ jagatpālakam reṇukānandanaṃ jāmadagnyaṃ bhaje || 4|| yaśca hantā sahasrārjunaṃ haihayam traiguṇaṃ saptakṛtvā mahākrodhanaiḥ duṣṭaśūnyā dharā yena satyaṃ kṛtā divyadehaṃ dayādānadevaṃ bhaje ghorarūpaṃ mahātejasaṃ vīrakam reṇukānandanaṃ jāmadagnyaṃ bhaje || 5|| mārayitvā mahāduṣṭa bhūpālakān yena śoṇena kuṇḍekṛtaṃ tarpaṇam yena śoṇīkṛtā śoṇanāmnī nadī svasya deśasya mūḍhā hatāḥ drohiṇaḥ svasya rāṣṭrasya śuddhiḥkṛtā śobhanā reṇukānandanaṃ jāmadagnyaṃ bhaje || 6|| dīnatrātā prabho pāhi mām pālaka! rakṣa saṃsārarakṣāvidhau dakṣaka! dehi saṃmohanī bhāvinī pāvanī svīya pādāravindasya sevā parā pūrṇamāruṇyarūpaṃ paraṃ mañjulam reṇukānandanaṃ jāmadagnyaṃ bhaje || 7|| ye jayodghoṣakāḥ pādasampūjakāḥ satvaraṃ vāñchitaṃ te labhante narāḥ dehagehādisaukhyaṃ paraṃ prāpya vai divyalokaṃ tathānte priyaṃ yānti te bhaktasaṃrakṣakaṃ viśvasampālakam reṇukānandanaṃ jāmadagnyaṃ bhaje || 8|| || iti śrīparaśurāmāṣṭakaṃ sampūrṇam ||

अर्थ:परशुराम — विष्णु के छठे अवतार, फरसाधारी, उग्र तेजस्वी योद्धा-ऋषि, जमदग्नि-पुत्र व समस्त शस्त्रों के स्वामी — की आठ श्लोकों की स्तुति।

परशुराम अष्टकम् पाठ के लाभ

परशुराम अष्टकम् के पाठ से भगवान की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्राप्त होती है, ऐसा माना जाता है।

यह भक्ति को बढ़ाता है, मन को शांत करता है और भगवान के स्मरण में हृदय को स्थिर करता है।

गुरुवार और एकादशी को तथा एकादशी एवं विष्णु पर्वों के समय यह सर्वाधिक शुभ है।

यह एक छोटा, मधुर स्तोत्र है जिसे कोई भी सीखकर श्रद्धा के साथ प्रतिदिन पाठ कर सकता है।

परशुराम अष्टकम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः या संध्या; विशेष रूप से गुरुवार और एकादशी
दिशाEast or North

स्नान करके भगवान की मूर्ति के समक्ष पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दीपक जलाएं और परशुराम अष्टकम् का धीरे-धीरे भक्ति के साथ पाठ करें। इसे प्रतिदिन पढ़ा जा सकता है, अथवा विशेष रूप से एकादशी और विष्णु पर्वों के समय। कृपा और रक्षा की प्रार्थना के साथ समापन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह परशुराम — विष्णु के छठे अवतार, फरसाधारी, उग्र तेजस्वी योद्धा-ऋषि, जमदग्नि-पुत्र व समस्त शस्त्रों के स्वामी — की आठ श्लोकों की स्तुति है।
यह एक पारंपरिक स्तोत्र है। इसका पाठ प्रातः या संध्या समय भक्ति के साथ किया जाता है, और विशेष रूप से गुरुवार एवं एकादशी को तथा एकादशी और विष्णु पर्वों के समय किया जाता है।

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