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बर्हापीडाभिरामाय गोविन्दाय नमो नमः

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातः एवं सायंकालीन पूजा, कृष्ण-भजन के पूर्व या पश्चात्, एवं जन्माष्टमी पर·📜 Traditional Krishna namaskara (salutation) shloka recited in Vaishnava worship of Govinda

अन्य नाम / खोज: barhapidabhiramaya · barhapidabhiramaya ramayakuntha medhase · rama manasa hamsaya govindaya namo namah · govinda namaskara shloka

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अर्थ

यह अत्यंत प्रिय नमस्कार-श्लोक चार मनोहर नामों के माध्यम से गोविन्द को बारम्बार प्रणाम करता है — उनके मोरपंख-मुकुट का सौन्दर्य, आनन्द के स्रोत होना, उनकी अकुण्ठ बुद्धि, और लक्ष्मी के मानस-सरोवर में सदा विहार करने वाला हंस होना। संक्षिप्त और सुमधुर, इसे कृष्ण-पूजा एवं भजन के पूर्व या पश्चात् नमस्कार के रूप में पढ़ा जाता है। प्रत्येक नाम हृदय को गोविन्द की सुन्दरता और कृपा के निकट ले आता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Krishna namaskara (salutation) shloka recited in Vaishnava worship of Govinda · Traditional (anonymous) · Classical / medieval devotional period

यह नमस्कार-श्लोक गोविन्द के चार प्रिय रूपों — उनके मोरपंख-मुकुट का सौन्दर्य, आनन्द-दायक स्वभाव, अकुण्ठ बुद्धि, और लक्ष्मी के हृदय के हंस होने — को एक मनोहर नमस्कार में पिरो देता है। इसकी सुमधुर लय एवं दोहरा 'नमो नमः' इसे उन भक्तों के बीच एक प्रिय प्रणाम-श्लोक बना देता है जो कृष्ण को गोविन्द, गौओं के सर्व-मनोहर रक्षक, के रूप में सम्बोधित करते हैं।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा से माना जाता है कि जो ऐसे नमस्कारों से गोविन्द को बारम्बार प्रणाम करता है, उसे लक्ष्मी का भी स्नेह प्राप्त होता है, क्योंकि वे वहीं निवास करती हैं जहाँ गोविन्द का सम्मान होता है, और भक्त कहते हैं कि प्रभु को सच्चा बारम्बार नमस्कार घर में कृपा एवं सौभाग्य दोनों को आकर्षित करता है।

मंत्र

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बर्हापीडाभिरामाय रामायाकुण्ठमेधसे। रमामानसहंसाय गोविन्दाय नमो नमः॥

Barhapidabhiramaya ramayakuntha-medhase, Rama-manasa-hamsaya govindaya namo namah.

अर्थ:गोविन्द को बारम्बार नमस्कार है — जो मोरपंख के मुकुट से मनोहर हैं, समस्त आनन्द के स्रोत हैं, अकुण्ठित एवं सदा तीक्ष्ण बुद्धि वाले हैं, और जो रमा (लक्ष्मी) के मानस-सरोवर में विहार करने वाले हंस हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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बर्हापीड🔊barha-pidaमोरपंख का मुकुट / शिखामणि
अभिरामाय🔊abhiramayaउन्हें जो (मोरपंख के मुकुट से) मनोहर एवं रमणीय हैं
रामाय🔊ramayaउन्हें जो सबको आनन्द देते हैं, आनन्द के स्रोत हैं
अकुण्ठमेधसे🔊akuntha-medhaseउन्हें जो अकुण्ठित, सदा तीक्ष्ण बुद्धि वाले हैं
रमा🔊ramaरमा (लक्ष्मी), सौभाग्य की देवी
मानस🔊manasaमन, मानस-सरोवर
हंसाय🔊hamsayaउस हंस को (जो लक्ष्मी के मन के सरोवर में विहार करता है)
गोविन्दाय🔊govindayaगोविन्द को, गौओं एवं पृथ्वी के रक्षक को
नमो नमः🔊namo namahबारम्बार नमस्कार, मैं पुनः-पुनः प्रणाम करता हूँ

बर्हापीडाभिरामाय गोविन्दाय नमो नमः पाठ के लाभ

गोविन्द को एक मधुर, संक्षिप्त नमस्कार, दैनिक प्रणाम हेतु आदर्श

प्रत्येक नाम एक सुन्दर केन्द्र प्रदान करता है, मन को कृष्ण की कृपा की ओर खींचता है

मोरपंख-मुकुट का चित्र हृदय को वृन्दावन के प्रभु की सुन्दरता से भर देता है

कण्ठस्थ करने एवं 'नमो नमः' (बारम्बार प्रणाम) के रूप में बार-बार जपने में सरल

बारम्बार प्रणाम के द्वारा विनम्रता एवं प्रेममयी भक्ति का विकास करता है

अकुण्ठ बुद्धि वाले गोविन्द की स्तुति भक्त की अपनी समझ को निर्मल करती है, ऐसा माना जाता है

बर्हापीडाभिरामाय गोविन्दाय नमो नमः जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातः एवं सायंकालीन पूजा, कृष्ण-भजन के पूर्व या पश्चात्, एवं जन्माष्टमी पर

इसे हार्दिक नमस्कार के रूप में जपें, प्रत्येक 'नमो नमः' पर अन्तर्मन से प्रणाम करते हुए। प्रत्येक नाम पर ध्यान करते हुए मोरपंख से सुशोभित, शान्त एवं मनोहर गोविन्द का दर्शन करें। इसे प्रायः पूजा एवं भजन के पूर्व या पश्चात् नमस्कार के रूप में तीन या ग्यारह बार पढ़ा जाता है, और हृदय को गोविन्द की ओर मोड़े रखने हेतु जप के रूप में भी दोहराया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसका अर्थ है 'मोरपंख के मुकुट से मनोहर हो उठे प्रभु को', जो कृष्ण/गोविन्द का एक नाम है। पूर्ण श्लोक एक नमस्कार है: 'गोविन्द को बारम्बार नमस्कार', जो उनकी सुन्दरता, आनन्दमय स्वभाव, तीक्ष्ण बुद्धि एवं लक्ष्मी के हृदय में निवास की स्तुति करता है।
'रमा-मानस-हंसाय' का अर्थ है वह हंस जो रमा अर्थात् लक्ष्मी के मानस (मन-सरोवर) में विहार करता है। जैसे हंस स्वच्छ सरोवर में आनन्द लेता है, वैसे ही गोविन्द सदा सौभाग्य की देवी के हृदय को आनन्दित करते हैं — यह कहने का काव्यमय ढंग है कि वे लक्ष्मी के प्रिय प्रभु हैं।
'नमो नमः' की पुनरावृत्ति का अर्थ है 'मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ', जो गहन एवं निरन्तर श्रद्धा व्यक्त करती है। ऐसा बारम्बार नमस्कार भक्ति-श्लोकों की विशेषता है, जो बताती है कि प्रभु के सम्मुख एक प्रणाम कभी पर्याप्त नहीं।
इसे कृष्ण-पूजा एवं भजन के पूर्व या पश्चात् नमस्कार-श्लोक के रूप में पढ़ा जाता है, और प्रायः कई बार दोहराया जाता है या गोविन्द के प्रति भक्ति एवं विनम्रता के विकास हेतु जप के रूप में प्रयुक्त होता है।

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