श्रीमद्भगवद्गीता १४.४ — सर्वयोनिषु कौन्तेय
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✦ अर्थ
तीनों गुणों वाले अध्याय के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को समस्त जीवों के सार्वभौमिक पिता रूप में प्रकट करते हैं। समस्त सृष्टि में जितने भी रूप किसी भी योनि में प्रकट होते हैं, वे महान् प्रकृति रूपी गर्भ से उत्पन्न होते हैं, और वे स्वयं बीज देने वाले पिता हैं। यह गहन चित्र सिखाता है कि सर्वत्र प्रत्येक प्राणी ईश्वर का ही सन्तान है, जो उनकी शक्ति और मूल प्रकृति के संयोग से जन्मा है — जो समस्त जीवन के प्रति श्रद्धा और भगवान के साथ हमारे सच्चे पिता रूप में घनिष्ठता जगाता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 14, Verse 4 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
चौदहवाँ अध्याय, तीन गुणों के विभाग का योग (गुणत्रय-विभाग-योग), यह समझाता है कि प्रकृति के तीन गुण आत्मा को किस प्रकार बाँधते हैं। उनका वर्णन करने से पहले श्रीकृष्ण समस्त प्राणियों के मूल को स्थापित करते हैं, यह घोषणा करते हुए कि मूल प्रकृति सार्वभौमिक गर्भ है और वे बीज देने वाले पिता हैं — ताकि जीवन की समस्त विविधता उनकी शक्ति और मूल प्रकृति के संयोग से जन्मी समझी जाए।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भक्तों ने एकाकीपन के समय इस श्लोक से गहरी सान्त्वना पाई है, क्योंकि स्वयं को प्रत्येक प्राणी का पिता कहकर श्रीकृष्ण प्रत्येक आत्मा को आश्वस्त करते हैं कि वह इस ब्रह्माण्ड में कभी अनाथ नहीं, अपितु सदा ईश्वर के पितृत्व और देखरेख में सुरक्षित है।
मंत्र
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सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥
sarva-yoniṣhu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ tāsāṁ brahma mahad yonir ahaṁ bīja-pradaḥ pitā
अर्थ:हे कौन्तेय ! समस्त योनियों में जितनी मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि अर्थात् गर्भ है महद्ब्रह्म और मैं बीज की स्थापना करने वाला पिता हूँ।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १४.४ — सर्वयोनिषु कौन्तेय पाठ के लाभ
ईश्वर को समस्त सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के सार्वभौमिक पिता रूप में प्रकट करता है
ईश्वर के हमारे सच्चे पिता रूप में घनिष्ठ सम्बन्ध से भक्ति को गहरा करता है
समस्त जीवन को दिव्य की सन्तान मानकर श्रद्धा और करुणा जगाता है
सभी प्राणी एक ही दिव्य स्रोत से जन्मे हैं — यह जानकर सान्त्वना और अपनापन देता है
सृष्टि किस प्रकार आत्मा और प्रकृति के संयोग से उत्पन्न होती है, यह समझ दृढ़ करता है
सभी प्राणियों के एक समान माता-पिता प्रकट कर उनके बीच के पृथक्भाव को मिटाता है
श्रीमद्भगवद्गीता १४.४ — सर्वयोनिषु कौन्तेय जप विधि
इस श्लोक का जप इस सत्य पर चिन्तन करते हुए करें कि प्रत्येक प्राणी, हर योनि में, उसी एक दिव्य पिता का सन्तान है। यह आपके हृदय को समस्त प्राणियों के प्रति करुणा से विस्तृत करे और भगवान के अपने पिता रूप में निकटता से गरमाए। इसे धीरे-धीरे पढ़ें, यह अनुभव करते हुए कि जीवन का वही दिव्य बीज आपके भीतर और समस्त जीवों के भीतर निवास करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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