श्रीमद्भगवद्गीता १४.२६ — मां च योऽव्यभिचारेण
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✦ अर्थ
इस तेजस्वी श्लोक में, तीनों गुण आत्मा को किस प्रकार बाँधते हैं इसका वर्णन करने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण उनसे ऊपर उठने का उपाय देते हैं — अव्यभिचारी भक्ति। जो पुरुष स्थिर, अनन्य भक्ति से भगवान की सेवा करता है, वह सत्त्व, रज और तम से अतीत होकर ब्रह्मभाव को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है। यह गहन शिक्षा है कि शुद्ध भक्ति स्वयं ही मुक्ति का साधन है, जो भक्त को प्रकृति के बन्धनों से ऊपर उठाकर परमात्मा से एकत्व में ले जाती है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 14, Verse 26 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
चौदहवाँ अध्याय, गुणत्रय विभाग योग, बताता है कि किस प्रकार सत्त्व, रज और तम देहधारी आत्मा को बाँधते हैं। इन गुणों तथा उनसे अतीत हुए पुरुष के लक्षणों का वर्णन करने के पश्चात्, श्रीकृष्ण इस श्लोक में अतिक्रमण का उपाय प्रकट करते हैं — उनकी अव्यभिचारी भक्तिमयी सेवा, जो साधक को गुणों से ऊपर उठाकर ब्रह्म से एकत्व तक ले जाती है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
इस श्लोक को भक्तों ने सदा इस आश्वासन रूप में सँजोया है कि स्थिर प्रेम का सरल मार्ग परम लक्ष्य तक ले जाता है; अनेक सन्त जिन्होंने जटिल साधनाओं का त्याग किया, साक्षी हैं कि अविचल भक्ति ने ही उन्हें सांसारिक बन्धन से परे ब्रह्म के आनन्द में पहुँचा दिया।
मंत्र
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मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
māṁ cha yo ’vyabhichāreṇa bhakti-yogena sevate sa guṇān samatītyaitān brahma-bhūyāya kalpate
अर्थ:जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १४.२६ — मां च योऽव्यभिचारेण पाठ के लाभ
अव्यभिचारी भक्ति को तीनों गुणों को पार करने का प्रत्यक्ष साधन बताता है
वचन देता है कि स्थिर भक्ति ब्रह्म से एकत्व (मुक्ति) के योग्य बनाती है
भगवान की प्रेममयी सेवा में दृढ़ता और एकाग्रता को प्रोत्साहित करता है
भक्ति की शक्ति से साधक को प्रकृति के गुणों के बन्धन से मुक्त करता है
भक्ति और मुक्ति के मार्गों को एक सरल साधना में जोड़ता है
विश्वास जगाता है कि ईश्वर का शुद्ध प्रेम सभी सांसारिक बन्धनों के पार ले जाता है
श्रीमद्भगवद्गीता १४.२६ — मां च योऽव्यभिचारेण जप विधि
इस श्लोक को अव्यभिचारी भक्ति की प्रतिज्ञा के रूप में जपें, 'अव्यभिचारेण भक्तियोगेन' — 'अविचल भक्ति के द्वारा' पर ध्यान केन्द्रित करते हुए। यह आपके संकल्प को दृढ़ करे कि आप स्थिर, अविचलित हृदय से भगवान की सेवा करें, इस विश्वास के साथ कि ऐसी भक्ति स्वयं ही आपको तीनों गुणों के खिंचाव से ऊपर उठा देती है। पूजा या जप से पूर्व इसका पाठ कर अपनी साधना को निरन्तर, पूर्ण प्रेम में स्थिर करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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