भाग्य सूक्तम्
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✦ अर्थ
भाग्य सूक्तम् ऋग्वेद (मण्डल ७, सूक्त ४१) का प्रसिद्ध भग-सूक्त है — एक प्रातःकालीन प्रार्थना जो भग का आवाहन करती है, जो आदित्यों में सौभाग्य, समृद्धि और प्रत्येक प्राणी के उचित भाग का स्वरूप है। यह सूर्योदय के समय अग्नि, इन्द्र, मित्र-वरुण, अश्विनों, पूषा आदि का आवाहन करता है, फिर भग से प्रार्थना करता है कि वह उपासक को गौ, अश्व, वीर सन्तान तथा देवों की चिरस्थायी कृपा प्रदान करे। यह धन, सफलता और शुभारम्भ के लिए जपा जाने वाला अत्यन्त लोकप्रिय वैदिक सूक्त है।
उत्पत्ति और कथा
Rigveda (Mandala 7, Sukta 41) · Rishi Vasishtha Maitravaruni · Vedic period (c. 1500-1000 BCE)
भाग्य सूक्तम् ऋग्वेद के सातवें मण्डल का भग-सूक्त है, जो परम्परागत रूप से महर्षि वसिष्ठ को आरोपित है। यह एक प्रातःकालीन सूक्त (प्रातरनुवाक) है: प्रथम प्रकाश के समय ऋषि समस्त तेजस्वी देवताओं — अग्नि, इन्द्र, मित्र एवं वरुण, अश्विनों, पूषा, ब्रह्मणस्पति, सोम एवं रुद्र — का आवाहन करते हैं, फिर सौभाग्य के आदित्य भग की ओर मुड़कर प्रार्थना करते हैं कि वे उपासक को गौ, अश्व, वीर सन्तान एवं देवों की चिरस्थायी सद्भावना का उसका उचित भाग प्रदान करें। चूँकि भग नियति एवं समृद्धि के स्वरूप हैं, यह सूक्त धन, सफलता एवं शुभारम्भ के लिए एक प्रिय वैदिक प्रार्थना बन गया।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परागत रूप से माना जाता है कि जो श्रद्धापूर्वक प्रातःकाल भाग्य सूक्तम् का पाठ करता है, उसे कभी अपने उचित भाग की कमी नहीं होती, क्योंकि भग वही देवता हैं जो सौभाग्य का विभाजन करते हैं; असहाय एवं राजा दोनों ही अपने भाग के लिए उन्हें पुकारते हैं, और वे किसी सच्चे उपासक को विमुख नहीं करते। श्री सूक्तम् के साथ पढ़ने पर यह लक्ष्मी की कृपा के द्वार खोलने एवं दुर्भाग्य को समृद्धि में बदलने वाला कहा जाता है।
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प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना । प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम ॥१॥
Prātaragniṃ prātarindraṃ havāmahe prātarmitrāvaruṇā prātaraśvinā | prātarbhagaṃ pūṣaṇaṃ brahmaṇaspatiṃ prātaḥ somamuta rudraṃ huvema ||1||
अर्थ:प्रातःकाल हम अग्नि का आवाहन करते हैं, प्रातः इन्द्र का, प्रातः मित्र और वरुण का, प्रातः दोनों अश्विनीकुमारों का; प्रातः हम भग, पूषा और ब्रह्मणस्पति का आवाहन करते हैं, प्रातः सोम तथा रुद्र का।
प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता । आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥२॥
Prātarjitaṃ bhagamugraṃ huvema vayaṃ putramaditeryo vidhartā | ādhraścidyaṃ manyamānasturaścidrājā cidyaṃ bhagaṃ bhakṣītyāha ||2||
अर्थ:प्रातःकाल हम सदा-विजयी, उग्र भग का आवाहन करते हैं — अदिति के उस पुत्र का जो सबका धारणकर्ता है; जिससे असहाय, वेगवान और राजा सभी कहते हैं — 'मुझे मेरा भाग दो'।
भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः । भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम ॥३॥
Bhaga praṇetarbhaga satyarādho bhagemāṃ dhiyamudavā dadannaḥ | bhaga pra ṇo janaya gobhiraśvairbhaga pra nṛbhirnṛvantaḥ syāma ||3||
अर्थ:हे भग, हमारे नेता! हे सत्य-धन वाले भग! हे भग, हमारी इस प्रार्थना को सफल करो, हमें हमारा अंश प्रदान करते हुए। हे भग, हमें गौ और अश्वों से समृद्ध करो; हे भग, हम वीर पुरुषों से युक्त, सन्तानवान हों।
उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्नाम् । उतोदिता मघवन्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम ॥४॥
Utedānīṃ bhagavantaḥ syāmota prapitva uta madhye ahnām | utoditā maghavansūryasya vayaṃ devānāṃ sumatau syāma ||4||
अर्थ:हम इस समय भी भाग्यवान हों, पूर्वाह्न में भी और दिन के मध्य में भी; और हे ऐश्वर्यवान, सूर्य के उदय होने पर भी हम देवों की कृपादृष्टि में बने रहें।
भग एव भगवाँ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम । तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुरएता भवेह ॥५॥
Bhaga eva bhagavāँ astu devāstena vayaṃ bhagavantaḥ syāma | taṃ tvā bhaga sarva ijjohavīti sa no bhaga puraetā bhaveha ||5||
अर्थ:हे देवो, भग ही ऐश्वर्य का दाता हो, और उसके द्वारा हम भाग्यवान बनें। हे भग, तुम्हें सब लोग पुकारते हैं; हे भग, तुम यहाँ हमारे आगे चलने वाले अग्रणी बनो।
समध्वरायोषसो नमन्त दधिक्रावेव शुचये पदाय । अर्वाचीनं वसुविदं भगं नो रथमिवाश्वा वाजिन आ वहन्तु ॥६॥
Samadhvarāyoṣaso namanta dadhikrāveva śucaye padāya | arvācīnaṃ vasuvidaṃ bhagaṃ no rathamivāśvā vājina ā vahantu ||6||
अर्थ:प्रातःकाल की उषाएँ हमारे यज्ञ में नमन करें, पवित्र स्थान पर दधिक्रा के समान आती हुईं; तेज अश्वों के समान जो रथ खींचते हैं, वे धन देने वाले भग को हमारे समीप ले आएँ।
अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः । घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥७॥
Aśvāvatīrgomatīrna uṣāso vīravatīḥ sadamucchantu bhadrāḥ | ghṛtaṃ duhānā viśvataḥ prapītā yūyaṃ pāta svastibhiḥ sadā naḥ ||7||
अर्थ:कल्याणमयी उषाएँ सदा हम पर उदित हों, अश्व, गौ और वीर सन्तान लाती हुईं, घृत बहाती हुईं और सब ओर परिपूर्ण। हे देवो, तुम सदा अपने कल्याणों से हमारी रक्षा करो।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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भाग्य सूक्तम् पाठ के लाभ
भग का आवाहन करता है, जो सौभाग्य, समृद्धि एवं उत्तम वस्तुओं में अपने उचित भाग के वैदिक देवता हैं
शुभ एवं सफल दिन के आरम्भ हेतु प्रातःकाल पाठ किया जाता है
गौ, अश्व, प्रचुरता एवं संसाधनों के रूप में धन की प्रार्थना करता है
उपासक को वीर सन्तान, योग्य कुटुम्ब एवं समृद्ध परिवार का आशीर्वाद देता है
अग्नि, इन्द्र, मित्र-वरुण, अश्विनों एवं अन्य प्रातःकालीन देवताओं की संयुक्त कृपा आकर्षित करने वाला माना जाता है
समृद्धि, कार्यों में सफलता एवं दुर्भाग्य के निवारण के लिए प्रयुक्त होता है
दिनभर देवों की 'सुमति' (शुभ कृपा) में बने रहने में सहायता करता है
भाग्य सूक्तम् जप विधि
स्नान कर सूर्योदय के समय पूर्व की ओर मुख करके बैठें। सातों मन्त्रों को स्पष्ट वैदिक उच्चारण के साथ धीरे-धीरे पढ़ें, आदर्श रूप से उदित होते सूर्य की ओर मुख करके। इसे परम्परागत रूप से सौभाग्य एवं शुभ दिन के लिए प्रातःकालीन प्रार्थना (प्रातरनुवाक) के रूप में पढ़ा जाता है, और श्री सूक्तम् के साथ होमों तथा लक्ष्मी/धन अनुष्ठानों में भी प्रयुक्त होता है। भग के समृद्धि-आशीर्वाद के आवाहन हेतु इसे ७ बार, या प्रतिदिन प्रातःकाल पढ़ना परम्परागत है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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