Mantra.Tips
durgadevishakradi-stutidurga-saptashati

हेतुः समस्तजगताम्

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा नवरात्रि के दौरान, स्थिर ध्यान के पश्चात्·📜 Durga Saptashati Chapter 4

अन्य नाम / खोज: hetuh samasta jagatam · hetuh samastajagatam trigunapi · adya prakriti verse durga saptashati · shakradi stuti prakriti verse

Share:

अर्थ

दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय की शक्रादि स्तुति का यह गूढ़ श्लोक देवी को समस्त अस्तित्व के कारण — आद्या प्रकृति — के रूप में प्रकट करता है। यद्यपि वे जगत् को रचने वाले तीनों गुणों की धारक हैं, तथापि स्वयं उनके दोषों से अछूती रहती हैं और विष्णु तथा शिव के लिए भी अपार हैं। समस्त ब्रह्माण्ड उनके अव्यक्त, परम स्वरूप का मात्र अंश कहा गया है।

उत्पत्ति और कथा

Durga Saptashati Chapter 4 · Sage Markandeya (Rishi Markandeya) · Ancient (c. 400–600 CE, Markandeya Purana)

देवी माहात्म्य के चौथे अध्याय में, देवी द्वारा महिषासुर का वध किए जाने के पश्चात्, इन्द्र और देवता उनकी स्तुति में शक्रादि स्तुति गाते हैं। पराक्रम के स्तोत्रों के बीच यह श्लोक उनके परात्पर स्वरूप की ओर मुड़ता है और उन्हें समस्त लोकों का अथाह कारण, वह आद्या प्रकृति घोषित करता है जिनका सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मात्र एक अंश है।

शास्त्रों में वर्णित

शाक्त परम्परा के सन्त मानते हैं कि इस श्लोक पर ध्यान करने से साधक का पृथक्, दोषबद्ध 'मैं' का भाव विलीन हो जाता है, क्योंकि यह पुष्टि करता है कि समस्त जगत् — और उसमें स्थित उपासक भी — निर्दोष, परम माता का ही एक अंश है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै- र्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत- मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या

hetuḥ samastajagatāṃ triguṇāpi doṣai- rna jñāyase hariharādibhirapyapārā sarvāśrayākhilamidaṃ jagadaṃśabhūta- mavyākṛtā hi paramā prakṛtistvamādyā

अर्थ:आप समस्त जगत् की कारण और तीनों गुणों से युक्त होने पर भी दोषों से युक्त नहीं जानी जातीं; आप हरि, हर आदि के लिए भी अपार हैं। आप सबकी आश्रय हैं; यह समस्त जगत् आपका अंशमात्र है, क्योंकि आप ही परम, अव्यक्त, आद्या प्रकृति हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

हेतुः🔊hetuḥकारण, उद्गम
समस्तजगताम्🔊samasta-jagatāmसमस्त लोकों की, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की
त्रिगुणा अपि🔊triguṇā apiयद्यपि तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से युक्त
दोषैः न ज्ञायसे🔊doṣaiḥ na jñāyaseआप दोषों से स्पर्श की हुई नहीं जानी जातीं
हरिहरादिभिः अपि🔊hariharādibhiḥ apiहरि (विष्णु), हर (शिव) तथा अन्य देवों द्वारा भी
अपारा🔊apārāअसीम, अथाह, माप से परे
सर्वाश्रया🔊sarvāśrayāसबकी आश्रय और शरण
अखिलम् इदम् जगत्🔊akhilam idaṃ jagatयह सम्पूर्ण जगत्
अंशभूतम्🔊aṃśabhūtamआपका एक अंशमात्र है
अव्याकृता🔊avyākṛtāअव्यक्त, अविभाजित
हि परमा🔊hi paramāक्योंकि (आप) परम हैं
प्रकृतिः त्वम् आद्या🔊prakṛtiḥ tvam ādyāआप ही आद्या, मूल प्रकृति हैं

हेतुः समस्तजगताम् पाठ के लाभ

देवी को आद्या प्रकृति — सबके परम मूल स्रोत — के रूप में समझने की गहराई देता है

सृष्टि के पीछे निराकार कारण पर चिन्तन करने वाले साधकों के लिए ध्यानपरक श्लोक

देवी की परात्परता पर ध्यान द्वारा विवेक (बुद्धि) और मन की स्थिरता प्रदान करता है

दुर्गा सप्तशती पाठ के भीतर सबकी आश्रयरूपा माता की कृपा पाने हेतु जपा जाता है

शक्ति को सत्ता के आधार के रूप में देखने वाली आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि से युक्त भक्ति जगाता है

यह पुष्टि करके मन को शान्त करता है कि समस्त जगत् देवी में ही अपने आधार रूप में टिका है

हेतुः समस्तजगताम् जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा नवरात्रि के दौरान, स्थिर ध्यान के पश्चात्

स्वच्छ, शान्त स्थान में पूर्व की ओर मुख करके दुर्गा की प्रतिमा के सम्मुख बैठें। श्वास को स्थिर करने के पश्चात् इस श्लोक का धीरे-धीरे पाठ करें, प्रत्येक पद पर ठहरते हुए — देवी समस्त लोकों की कारण, गुणों से अछूती, सबकी आश्रय। ११ या १०८ बार पाठ करें, अथवा दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय के सम्पूर्ण पाठ में सम्मिलित करें, और मौन चिन्तन में समाप्त करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसका अर्थ है 'समस्त लोकों का कारण।' दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय का यह श्लोक देवी को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के उद्गम — उस आद्या प्रकृति — के रूप में सम्बोधित करता है, जिनसे सब कुछ उत्पन्न होता है, फिर भी जो किसी दोष से अछूती रहती हैं।
यह शक्रादि स्तुति का अंश है — वह स्तुति जो इन्द्र और देवताओं ने दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय में, देवी द्वारा महिषासुर का वध करने के पश्चात्, अर्पित की।
आद्या प्रकृति का अर्थ है 'मूल, आदिम प्रकृति।' यह श्लोक बताता है कि यद्यपि देवी जगत् को रचने वाले तीनों गुणों को धारण करती हैं, फिर भी वे उनका अव्यक्त स्रोत हैं — परम, अविभाजित और विष्णु तथा शिव की पहुँच से भी परे।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides