जय राधा माधव
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✦ अर्थ
जय राधा-माधव सर्वाधिक प्रिय वैष्णव भजनों में से एक है, जिसे श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने रचा, और जो मात्र दो पंक्तियों में सम्पूर्ण वृन्दावन का चित्र खींच देता है। यह कृष्ण को राधा के प्रियतम, कुंजों के क्रीड़ाशील, गोपियों के प्रिय, गोवर्धनधारी, यशोदानन्दन, ब्रजरंजन और यमुनातट के विहारी रूप में महिमामंडित करता है। असंख्य मन्दिरों में गाया जाने वाला और श्रील प्रभुपाद को अत्यन्त प्रिय यह भजन गायक के हृदय को सीधे मधुर ब्रज की ओर खींच ले जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Gitavali by Srila Bhaktivinoda Thakura · Srila Bhaktivinoda Thakura · Late 19th century CE
जय राधा-माधव की रचना अग्रणी गौड़ीय वैष्णव संत श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने की, और यह उनकी प्रसिद्ध भजन-पुस्तिका गीतावली का अंग है। मात्र दो छोटी पंक्तियों का होते हुए भी यह वृन्दावन के सम्पूर्ण सार और परिदृश्य को समेट लेता है: कृष्ण राधा के प्रियतम, कुंजों के क्रीड़ाशील स्वामी, गोपियों के प्रिय, गोवर्धनधारी, यशोदानन्दन, समस्त ब्रज के आनन्द और यमुना के तट के विहारी। यह विश्व भर के सर्वाधिक लोकप्रिय वैष्णव भजनों में से एक बन गया, विशेष रूप से तब जब श्रील प्रभुपाद ने इसे अपने प्रवचनों की नियमित प्रस्तावना बना लिया।
✦ शास्त्रों में वर्णित
ऐसा वर्णित है कि इलाहाबाद और गोरखपुर में जय राधा-माधव गाते समय श्रील प्रभुपाद इसके जगाए वृन्दावन के दर्शन में इतने तल्लीन हो गए कि प्रथम पंक्तियों के पश्चात् ही वे भाव-समाधि में चले गए — यह इस भजन की हृदय को सीधे ब्रज की भूमि में ले जाने की शक्ति का प्रमाण है।
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(जय) राधा-माधव (जय) कुञ्ज-बिहारी । (जय) गोपी-जन-वल्लभ (जय) गिरि-वर-धारी ॥
(jaya) rādhā-mādhava (jaya) kuñja-bihārī (jaya) gopī-jana-vallabha (jaya) giri-vara-dhārī
अर्थ:राधा-माधव (राधा के प्रियतम श्रीकृष्ण) की जय हो! वृन्दावन की कुंजों में विहार करने वाले की जय हो! गोपियों के प्रियतम की जय हो! गोवर्धन गिरि को धारण करने वाले की जय हो!
(जय) यशोदा-नन्दन (जय) ब्रज-जन-रञ्जन । (जय) यमुना-तीर-वन-चारी ॥
(jaya) yaśodā-nandana (jaya) braja-jana-rañjana (jaya) yamunā-tīra-vana-cārī
अर्थ:यशोदा के लाडले नन्दन की जय हो! ब्रजवासियों को आनन्दित करने वाले की जय हो! यमुना के तट के वनों में विचरण करने वाले की जय हो!
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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जय राधा माधव पाठ के लाभ
कुछ सरल शब्दों में ही वृन्दावन का सम्पूर्ण दर्शन कराता है — राधा, गोपियाँ, गोवर्धन, यशोदा, ब्रज और यमुना
ब्रज में कृष्ण की मधुर लीलाओं के प्रेमपूर्ण स्मरण (स्मरण) को जगाता है
इसकी सरल, मधुर धुन इसे समूह कीर्तन तथा नवसाधकों और बालकों के लिए उपयुक्त बनाती है
हृदय को शान्त एवं प्रसन्न करता है, मन को वृन्दावन के भाव से भर देता है
गौड़ीय वैष्णव एवं इस्कॉन समुदायों में प्रिय प्रातःकालीन भजन के रूप में सँजोया गया
बार-बार 'जय' (जय हो) गाने से भक्ति का आनन्दमय, महिमामय भाव विकसित होता है
जय राधा माधव जप विधि
दोनों पंक्तियों को पारम्परिक धुन में धीरे-धीरे और भाव-विभोर होकर गाएँ, प्रत्येक नामित लीला का चित्रण करते हुए — कुंजों में राधा-माधव, गोपियाँ, गोवर्धन, माता यशोदा, ब्रजवासी, यमुना के वन। यह कीर्तन रूप में गाने के लिए है, अकेले या समूह में मृदंग और करताल के साथ, हृदय को मधुर ब्रज की भूमि में स्थिर होने देते हुए। श्रील प्रभुपाद प्रायः प्रवचन देने से ठीक पूर्व इसे गाते थे।
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