षण्मुख पञ्चरत्नम्
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✦ अर्थ
षण्मुख पञ्चरत्नम् भगवान मुरुगन (षण्मुख) की "पञ्चरत्न" स्तुति है — पाँच रत्न-श्लोक, जो षण्मुख, शिव-पुत्र, मयूरवाहन और वेलधारी प्रभु को वंदन करते हैं। यह श्रृंगेरी आचार्य को आरोपित एक मधुर स्तोत्र है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional (Sringeri lineage) · Sringeri Acharya · Medieval
षण्मुख पञ्चरत्नम् पारम्परिक रूप से श्रृंगेरी आचार्य को आरोपित है। यह षण्मुख (भगवान मुरुगन) की "पञ्चरत्न" स्तुति है — पाँच रत्न-श्लोक, जो षण्मुख, शिव-पुत्र, मयूरवाहन और वेलधारी प्रभु को वंदन करते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि षण्मुख पञ्चरत्नम् का सच्चे और श्रद्धालु हृदय से पाठ करना प्रभु की कृपा के निकट जाना है, जो प्रेमपूर्वक पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागते।
मंत्र
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ॐ श्रीगणेशाय नमः । स्फुरद्विद्युद्वल्लीवलयितमगोत्सङ्गवसतिं भवाप्पित्तप्लुष्टानमितकरुणाजीवनवशात् । अवन्तं भक्तानामुदयकरमम्भोधर इति प्रमोदादावासं व्यतनुत मयूरोऽस्य सविधे ॥ १॥ सुब्रह्मण्यो यो भवेज्ज्ञानशक्त्या सिद्धं तस्मिन्देवसेनापतित्वम् । इत्थं शक्तिं देवसेनापतित्वं सुब्रह्मण्यो बिभ्रदेष व्यनक्ति ॥ २॥ पक्षोऽनिर्वचनीयो दक्षिण इति धियमशेषजनतायाः । जनयति बर्ही दक्षिणनिर्वचनायोग्यपक्षयुक्तोऽयम् ॥ ३॥ यः पक्षमनिर्वचनं याति समवलम्ब्य दृश्यते तेन । ब्रह्म परात्परममलं सुब्रह्मण्याभिधं परं ज्योतिः ॥ ४॥ षण्मुखं हसन्मुखं सुखाम्बुराशिखेलनं सन्मुनीन्द्रसेव्यमानपादपङ्कजं सदा । मन्मथादिशत्रुवर्गनाशकं कृपाम्बुधिं मन्महे मुदा हृदि प्रपन्नकल्पभूरुहम् ॥ ५॥ इति जगद्गुरु शृङ्गेरीपीठाधिप श्रीचन्द्रशेखरभारती श्रीपादैः विरचिता श्रीषण्मुखपञ्चरत्नस्तुतिः समाप्ता ।
oṃ śrīgaṇeśāya namaḥ | sphuradvidyudvallīvalayitamagotsaṅgavasatiṃ bhavāppittapluṣṭānamitakaruṇājīvanavaśāt | avantaṃ bhaktānāmudayakaramambhodhara iti pramodādāvāsaṃ vyatanuta mayūro'sya savidhe || 1|| subrahmaṇyo yo bhavejjñānaśaktyā siddhaṃ tasmindevasenāpatitvam | itthaṃ śaktiṃ devasenāpatitvaṃ subrahmaṇyo bibhradeṣa vyanakti || 2|| pakṣo'nirvacanīyo dakṣiṇa iti dhiyamaśeṣajanatāyāḥ | janayati barhī dakṣiṇanirvacanāyogyapakṣayukto'yam || 3|| yaḥ pakṣamanirvacanaṃ yāti samavalambya dṛśyate tena | brahma parātparamamalaṃ subrahmaṇyābhidhaṃ paraṃ jyotiḥ || 4|| ṣaṇmukhaṃ hasanmukhaṃ sukhāmburāśikhelanaṃ sanmunīndrasevyamānapādapaṅkajaṃ sadā | manmathādiśatruvarganāśakaṃ kṛpāmbudhiṃ manmahe mudā hṛdi prapannakalpabhūruham || 5|| iti jagadguru śṛṅgerīpīṭhādhipa śrīcandraśekharabhāratī śrīpādaiḥ viracitā śrīṣaṇmukhapañcaratnastutiḥ samāptā |
अर्थ:षण्मुख (भगवान मुरुगन) की "पञ्चरत्न" स्तुति — पाँच रत्न-श्लोक, जो षण्मुख, शिव-पुत्र, मयूरवाहन व वेलधारी प्रभु को वंदन करते हैं।
षण्मुख पञ्चरत्नम् पाठ के लाभ
षण्मुख पञ्चरत्नम् का पाठ प्रभु की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा लाने वाला माना जाता है।
भक्ति बढ़ाता है, मन को शान्त करता है और प्रभु के स्मरण में हृदय को स्थिर करता है।
मंगलवार और कृत्तिका को तथा स्कन्द षष्ठी और कृत्तिका में सर्वाधिक शुभ।
एक छोटा, मधुर स्तोत्र जिसे कोई भी सीखकर श्रद्धा से प्रतिदिन पाठ कर सकता है।
षण्मुख पञ्चरत्नम् जप विधि
स्नान कर देवता के चित्र के सम्मुख पूर्व की ओर मुख करके बैठें। दीपक जलाएँ और षण्मुख पञ्चरत्नम् का धीरे-धीरे श्रद्धापूर्वक पाठ करें। इसे प्रतिदिन, या विशेषकर स्कन्द षष्ठी और कृत्तिका में पढ़ा जा सकता है। कृपा और रक्षा हेतु प्रार्थना से समापन करें।