Mantra.Tips
bhagavad-gitagitakrishnaarjuna-vishada-yoga

श्रीमद्भगवद्गीता १.३२ — न काङ्क्षे विजयं कृष्ण

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 गीता के प्रथम अध्याय के अध्ययन के समय, चिन्तनशील मनन में·📜 Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 32

अन्य नाम / खोज: na kankshe vijayam krishna · kim no rajyena govinda · bhagavad gita 1.32 · gita 1 32 · arjuna renounces kingdom · kim bhogair jivitena va

Share:

अर्थ

अर्जुन का शोक वैराग्य की पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है। श्रीकृष्ण को गोविन्द कहकर सम्बोधित करते हुए वे घोषित करते हैं कि उन्हें न विजय की कामना है, न राज्य की और न भोगों की, क्योंकि अपने ही स्वजनों के विनाश से प्राप्त इनका उन्हें कोई मूल्य नहीं दिखता। यह श्लोक मार्मिक रूप से दर्शाता है कि आसक्तिजनित शोक कैसे जीवन के लक्ष्यों को भी निरर्थक बना सकता है -- वही निराशा जिसे श्रीकृष्ण सच्चे, निष्काम वैराग्य की ओर मोड़ते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 32 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग में, जैसे-जैसे अर्जुन का शोक गहराता है, वे युद्ध के फलों की समस्त कामना त्याग देते हैं। श्रीकृष्ण को गोविन्द कहकर सम्बोधित करते हुए वे घोषित करते हैं कि अपने ही लोगों के वध से प्राप्त विजय, राज्य, भोग और जीवन तक उनके लिए मूल्यहीन हैं -- निराशा के ये वचन श्रीकृष्ण के रूपान्तरकारी उपदेश की भूमिका रचते हैं।

शास्त्रों में वर्णित

ऋषि देखते हैं कि राज्य और भोगों के प्रति अर्जुन की उदासीनता ने एक ऐसे हृदय को प्रकट किया जो पहले से ही संसार से विमुख हो रहा था, और भगवान ने इसी वैराग्य का उपयोग उन्हें शोकपूर्ण निराशा से विवेकियों के दीप्तिमान वैराग्य की ओर ले जाने के लिए किया।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

काङ्क्षे विजयं कृष्ण राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥

na kāṅkṣhe vijayaṁ kṛiṣhṇa na cha rājyaṁ sukhāni cha kiṁ no rājyena govinda kiṁ bhogair jīvitena vā

अर्थ:हे कृष्ण! मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य और न सुख। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन, अथवा भोगों से या जीवन से ही क्या लाभ?

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

न काङ्क्षे🔊na kāṅkṣheमैं नहीं चाहता
विजयम्🔊vijayamविजय
कृष्ण🔊kṛiṣhṇaहे कृष्ण
न च राज्यम्🔊na cha rājyamन राज्य
सुखानि च🔊sukhāni chaन ही सुख
किम् नः🔊kiṁ naḥहमें क्या लाभ
राज्येन🔊rājyenaराज्य से
गोविन्द🔊govindaहे गोविन्द (कृष्ण)
किम् भोगैः🔊kiṁ bhogaiḥभोगों से क्या लाभ
जीवितेन वा🔊jīvitena vāअथवा जीवन से ही

श्रीमद्भगवद्गीता १.३२ — न काङ्क्षे विजयं कृष्ण पाठ के लाभ

वैराग्य के भाव और सांसारिक लक्ष्यों के प्रति प्रश्न को प्रतिबिम्बित करता है

साधक को स्मरण कराता है कि राज्य और भोग सर्वोच्च लक्ष्य नहीं हैं

विजय के लिए अर्जुन की स्वार्थहीनता को प्रकट करता है

इस पर चिन्तन को आमन्त्रित करता है कि जीवन को सचमुच क्या अर्थ देता है

श्रीकृष्ण के उस उपदेश की भूमिका रचता है जो निराशा को विवेकपूर्ण वैराग्य में बदल देता है

हानि से प्राप्त लाभों की रिक्तता पर चिन्तन को प्रोत्साहित करता है

श्रीमद्भगवद्गीता १.३२ — न काङ्क्षे विजयं कृष्ण जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयगीता के प्रथम अध्याय के अध्ययन के समय, चिन्तनशील मनन में

इस श्लोक का पाठ प्रथम अध्याय के अध्ययन के समय करें, सुनते हुए कि अर्जुन श्रीकृष्ण को गोविन्द कहकर विजय, राज्य और भोग की समस्त कामना त्याग रहे हैं। शोकजनित त्याग और श्रीकृष्ण द्वारा सिखाए गए सच्चे वैराग्य के अन्तर पर चिन्तन करें। यह आपको आगे के अध्यायों की ओर ले जाए, जहाँ भगवान अपना कर्तव्य निभाते हुए फल की कामना के बिना कर्म करना सिखाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि उन्हें न विजय की कामना है, न राज्य की और न भोगों की। वे पूछते हैं कि जब राज्य, भोग या जीवन अपने ही स्वजनों के विनाश से प्राप्त हों, तो उनका क्या लाभ?
ठीक वैसा नहीं। अर्जुन का यह वैराग्य शोक और आसक्ति से उपजा है, एक प्रकार की निराशा है। श्रीकृष्ण आगे सच्चा वैराग्य सिखाते हैं — अपना कर्तव्य पूरे मन से करते हुए फल के प्रति अनासक्त रहना — जो शोकवश त्याग देने से बहुत भिन्न है।
'गोविन्द' श्रीकृष्ण का स्नेहपूर्ण नाम है, जिसका अर्थ है आनन्द देने वाले, गायों और इन्द्रियों के रक्षक। अपनी निराशा के बीच भी अर्जुन प्रभु को प्रेम और घनिष्ठता से सम्बोधित करते हैं, जो कृष्ण के साथ उनके गहन सम्बन्ध को प्रकट करता है।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides