श्रीमद्भगवद्गीता १०.२२ — वेदानां सामवेदोऽस्मि
अन्य नाम / खोज: vedanam sama vedo smi · vedanam samavedo asmi · bhagavad gita 10.22 · gita 10 22 · indriyanam manash chasmi · among the vedas i am sama veda gita verse
अपनी भाषा/लिपि में पढ़ें
✦ अर्थ
दसवें अध्याय में अपनी दिव्य विभूतियों के प्रकाशन को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण और भी क्षेत्रों में श्रेष्ठ तत्त्व बताते हैं — शास्त्रों में मधुर सामवेद, देवों में इन्द्र, इन्द्रियों में मन, और समस्त प्राणियों में चेतना। चेतना के साथ अपना तादात्म्य बताकर वे प्रत्येक प्राणी की अन्तरतम सत्ता की ओर संकेत करते हैं, यह सिखाते हुए कि ईश्वर केवल बाहर महिमामय वस्तुओं में ही नहीं, अपितु हमारे भीतर की चेतना भी हैं।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 10, Verse 22 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
दसवें अध्याय, दिव्य विभूतियों के योग (विभूति योग) में, श्रीकृष्ण अर्जुन के लिए समस्त सृष्टि में अपनी शक्ति की श्रेष्ठतम अभिव्यक्तियों को खोलते हैं। यहाँ वे शास्त्रों और देवों से बढ़कर अनुभव के आन्तरिक उपकरणों — मन और चेतना — की ओर मुड़ते हैं, यह दर्शाते हुए कि वही परम तत्त्व बाहर महिमा में और भीतर समस्त प्राणियों की जागरूकता के रूप में प्रकाशित होता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
जिन साधकों ने 'प्राणियों में मैं चेतना हूँ' इस वाक्य पर ध्यान किया, वे बताते हैं कि ईश्वर की खोज, जो कभी बाहर की ओर थी, अचानक भीतर की ओर मुड़ गई और उनकी अपनी जागरूकता में विश्राम पा गई, जहाँ उन्होंने भगवान की निकटता को अपने ही स्वरूप के रूप में अनुभव किया।
मंत्र
किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः। इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥
vedānāṁ sāma-vedo ’smi devānām asmi vāsavaḥ indriyāṇāṁ manaśh chāsmi bhūtānām asmi chetanā
अर्थ:मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में वासव (इन्द्र) हूँ; मैं इन्द्रियों में मन और भूतप्राणियों में चेतना (ज्ञानशक्ति) हूँ।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें
श्रीमद्भगवद्गीता १०.२२ — वेदानां सामवेदोऽस्मि पाठ के लाभ
ईश्वर को प्रत्येक प्राणी के भीतर प्रकाशित चेतना के रूप में प्रकट करता है
बाह्य उपासना को आन्तरिक जागरूकता के साथ जोड़कर भक्ति को गहरा करता है
सामवेद, सबसे संगीतमय शास्त्र, को भगवान के रूप में सम्मानित करता है
मन को समस्त इन्द्रियों के पीछे साक्षी रूप में दिव्य को पहचानने का अभ्यास कराता है
समस्त जीवन को दिव्य चेतना से युक्त मानकर उसके प्रति श्रद्धा जगाता है
उस जागरूकता की ओर ध्यान मोड़कर शान्ति लाता है जो हमारा सच्चा स्वरूप है
श्रीमद्भगवद्गीता १०.२२ — वेदानां सामवेदोऽस्मि जप विधि
इस श्लोक को शान्ति से जपें, विशेषकर अन्तिम शब्दों 'भूतानामस्मि चेतना' — 'प्राणियों में मैं चेतना हूँ' — पर टिककर। मन को उस सरल जागरूकता में स्थिर होने दें जो समस्त अनुभव को जानती है, और उसे भगवान की उपस्थिति के रूप में पहचानें। यह श्लोक भक्ति से ध्यान तक का एक उत्तम सेतु है, जो जपने वाले को उस चेतना की ओर भीतर ले जाता है जो ईश्वर का अपना प्रकाश है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ये भी पढ़ें
ॐ
Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides