श्रीमद्भगवद्गीता १०.३६ — द्यूतं छलयतामस्मि
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✦ अर्थ
दिव्य विभूतियों के योग के इस श्लोक में श्रीकृष्ण घोषित करते हैं कि वे ही विजय, दृढ़ निश्चय, तेजस्वियों का तेज और सात्त्विकों का सत्त्व हैं। यह श्लोक साहस और आत्मविश्वास का सशक्त स्रोत है, क्योंकि यह प्रकट करता है कि समस्त विजय, समस्त संकल्प और समस्त आन्तरिक तेज भगवान से ही प्रवाहित होते हैं। इसका जप करना अपने प्रयासों को उसी शक्ति के साथ जोड़ना है जो सफलता प्रदान करती है और विजय के स्रोत रूप में परमात्मा का आश्रय लेना है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 10, Verse 36 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
दसवें अध्याय, दिव्य विभूतियों के योग (विभूति योग) में, श्रीकृष्ण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी शक्ति की श्रेष्ठतम अभिव्यक्तियों को सूचीबद्ध करते हैं। यहाँ वे स्वयं को विजय, संकल्प, तेज और सद्गुण बताते हैं, यह प्रकट करते हुए कि विजयी होने की शक्ति और श्रेष्ठ चरित्र की कान्ति स्वयं परम तत्त्व की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कठिन परीक्षाओं का सामना करने वाले भक्तों ने इस श्लोक से साहस पाया है, क्योंकि 'मैं विजय और दृढ़ निश्चय हूँ' घोषित करके श्रीकृष्ण उन्हें आश्वस्त करते हैं कि विजय की शक्ति भगवान की ही है; अनेक बताते हैं कि परिणाम को उन्हें समर्पित करके उन्हें अप्रत्याशित स्थिरता और सफलता मिली।
मंत्र
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द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्। जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥
dyūtaṁ chhalayatām asmi tejas tejasvinām aham jayo ’smi vyavasāyo ’smi sattvaṁ sattvavatām aham
अर्थ:मैं छल करने वालों में द्यूत हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ, मैं विजय हूँ; मैं व्यवसाय (उद्यमशीलता) हूँ और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १०.३६ — द्यूतं छलयतामस्मि पाठ के लाभ
भगवान को विजय के स्रोत रूप में प्रकट कर साहस और आत्मविश्वास भरता है
किसी भी श्रेष्ठ प्रयास में दृढ़ निश्चय (व्यवसाय) और संकल्प को सुदृढ़ करता है
सफलता के अपने प्रयास को समस्त विजय के पीछे की दिव्य शक्ति के साथ जोड़ता है
तेजस्वी भगवान की भक्ति द्वारा आन्तरिक तेज और कान्ति जगाता है
सत्त्व — चरित्र की पवित्रता और सद्गुण — के विकास को प्रोत्साहित करता है
यह आश्वासन देता है कि सच्ची सफलता भगवान से प्रवाहित होने वाली कृपा है
श्रीमद्भगवद्गीता १०.३६ — द्यूतं छलयतामस्मि जप विधि
इस श्लोक को किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य से पहले जपें, 'जयोऽस्मि, व्यवसायोऽस्मि' — 'मैं विजय हूँ, मैं दृढ़ निश्चय हूँ' — पर टिकते हुए। अपने प्रयास को विजय के सच्चे स्रोत रूप में भगवान को अर्पित करें, और अपने भीतर संकल्प तथा आन्तरिक तेज को उठते हुए अनुभव करें। यह श्लोक आपकी इच्छाशक्ति को स्थिर करे और स्मरण कराए कि उचित रूप से खोजी गई सफलता भगवान से प्रवाहित कृपा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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