श्रीमद्भगवद्गीता ११.१७ — किरीटिनं गदिनं चक्रिणम्
अन्य नाम / खोज: kiritinam gadinam chakrinam · tejo rashim sarvato diptimantam · bhagavad gita 11.17 · gita 11 17 · radiant cosmic form · dipta analarka dyutim aprameyam
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✦ अर्थ
विश्वरूप का वर्णन जारी रखते हुए अर्जुन श्रीकृष्ण को मुकुटधारी तथा गदा और चक्र लिए हुए देखते हैं, परन्तु वे सब ओर अपरिमित तेज की राशि के रूप में प्रकाशमान हैं। वह प्रकाश इतना चकाचौंध करने वाला है — प्रज्वलित अग्नि और तीव्र सूर्य के समान — कि उसे देख पाना लगभग असम्भव है। यह श्लोक विश्वरूप की अभिभूत करने वाली प्रभा और अनन्तता को व्यक्त करता है, जो विष्णु के परिचित चिह्नों को असीम, परात्पर तेज के साथ मिला देता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 17 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
ग्यारहवें अध्याय विश्वरूपदर्शनयोग में, जब अर्जुन दिव्य दृष्टि से विश्वरूप का दर्शन करते हैं, तब वे उसके अभिभूत करने वाले लक्षणों का वर्णन करते हैं। यहाँ वे भगवान को मुकुटधारी तथा गदा और चक्र लिए हुए देखते हैं, जो सब ओर अपरिमित तेज से जाज्वल्यमान है — यह विश्वरूप दर्शन के उनके विस्मय-विमुग्ध वर्णन का अंग है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि विश्वरूप की प्रभा एक साथ उदित हजार सूर्यों के प्रकाश से भी अधिक थी, ऐसा तेज जिसे कोई मर्त्य नेत्र बिना सहायता के नहीं देख सकता था — जिसने अर्जुन को, कृपा द्वारा, भगवान की अपरिमित महिमा की एक झलक प्रदान की।
मंत्र
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किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम्। पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥
kirīṭinaṁ gadinaṁ chakriṇaṁ cha tejo-rāśhiṁ sarvato dīptimantam paśhyāmi tvāṁ durnirīkṣhyaṁ samantād dīptānalārka-dyutim aprameyam
अर्थ:मैं आपको मुकुट धारण किए हुए, गदा और चक्र लिए हुए, सब ओर से देदीप्यमान तेज की राशि के रूप में देख रहा हूँ; आप सब ओर प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान कान्ति वाले, देखने में अति कठिन और अप्रमेय (अपरिमित) हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.१७ — किरीटिनं गदिनं चक्रिणम् पाठ के लाभ
देदीप्यमान, अनन्त विश्वरूप का सजीव चिंतन कराता है
विष्णु के प्रिय चिह्नों को असीम प्रभा के साथ जोड़ता है
दिव्य की चकाचौंध करने वाली प्रभा के प्रति विस्मय जगाता है
साधक को स्मरण कराता है कि भगवान की महिमा अप्रमेय (अमाप) है
रूप के दर्शन (विज़ुअलाइज़ेशन) द्वारा श्रद्धा और भक्ति को गहन करता है
भगवान की महिमा के ध्यानपूर्ण स्मरण के लिए एक शक्तिशाली श्लोक
श्रीमद्भगवद्गीता ११.१७ — किरीटिनं गदिनं चक्रिणम् जप विधि
इस श्लोक का पाठ विश्वरूप की कल्पना करते हुए करें — मुकुटधारी, गदा और चक्र लिए हुए, सब ओर अनगिनत सूर्यों के प्रकाश से जाज्वल्यमान। पाठ करते समय उस चकाचौंध करने वाली, अपरिमित प्रभा को अपनी अन्तर्दृष्टि में भर लें, और विस्मय तथा भक्ति को जागृत होने दें। यह ग्यारहवें अध्याय में वर्णित भगवान की परात्पर महिमा के ध्यानपूर्ण स्मरण के लिए उपयुक्त है।
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