श्रीमद्भगवद्गीता ११.३६ — स्थाने हृषीकेश
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✦ अर्थ
लौकिक दर्शन के विस्मय और भय के पश्चात अर्जुन अपना धैर्य पुनः पाकर स्तुति करने लगते हैं। वे कहते हैं कि यह उचित ही है कि श्रीकृष्ण की महिमा से सम्पूर्ण जगत् हर्षित होकर प्रेमपूर्वक अनुरक्त होता है, जबकि आसुरी शक्तियाँ भयभीत होकर भागती हैं और सिद्धजन नतमस्तक होकर वन्दना करते हैं। यह श्लोक भगवान की शक्ति के भय को उनकी महिमा से उपजे आनन्द और प्रेम के साथ सुन्दर सन्तुलन में रखता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 36 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूप दर्शन योग में, अति विशाल लौकिक रूप को देखकर अर्जुन सम्भलते हैं और प्रार्थनाओं की एक शृंखला अर्पित करते हैं। यह श्लोक उस स्तुति-गान का आरम्भ करता है, यह दृढ़ करते हुए कि जगत् श्रीकृष्ण की महिमा में ठीक ही हर्षित होता है जबकि आसुरी शक्तियाँ भागती हैं और सिद्धजन उनके समक्ष नतमस्तक होते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि भगवान का वही गुणगान, जैसा अर्जुन यहाँ करते हैं, हृदय को आनन्द देता है और समस्त भयकारी से रक्षा करता है — क्योंकि जहाँ भी भगवान का नाम और स्तुति गूँजती है, वहाँ आनन्द बढ़ता है और अन्धकार की शक्तियाँ अपना बल खो देती हैं।
मंत्र
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अर्जुन उवाच स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥
arjuna uvācha sthāne hṛiṣhīkeśha tava prakīrtyā jagat prahṛiṣhyaty anurajyate cha rakṣhānsi bhītāni diśho dravanti sarve namasyanti cha siddha-saṅghāḥ
अर्थ:अर्जुन ने कहा -- हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपकी महिमा से जगत् हर्षित होता है और अनुराग को प्राप्त होता है; भयभीत राक्षस सब दिशाओं में भाग जाते हैं और समस्त सिद्धगणों के समुदाय आपको नमस्कार करते हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.३६ — स्थाने हृषीकेश पाठ के लाभ
भगवान की महिमा का उत्सव मनाने वाला हर्षपूर्ण स्तुति का श्लोक
यह दृढ़ करता है कि भगवान की महिमा भक्तिमय जगत् को प्रेम में आकृष्ट करती है
साधक को स्मरण कराता है कि भगवान का स्मरण भय और बुराई को दूर करता है
हृदय को दिव्य की महानता में आनन्दित होने के लिए प्रेरित करता है
उन सिद्धों के आदर्श का सम्मान करता है जो भगवान के समक्ष नतमस्तक होते हैं
भगवान की शक्ति के प्रति श्रद्धा के साथ सन्तुलित भक्ति विकसित करता है
श्रीमद्भगवद्गीता ११.३६ — स्थाने हृषीकेश जप विधि
इस श्लोक का पाठ भगवान की हर्षपूर्ण स्तुति के रूप में करें, उन्हें इन्द्रियों के स्वामी हृषीकेश के रूप में सम्बोधित करते हुए। पाठ करते समय इस पर मनन करें कि भगवान की स्तुति किस प्रकार हृदय को हर्षित करती है और उसे प्रेम में आकृष्ट करती है, जबकि उनके नाम पर भय और नकारात्मकता भाग जाती है। यह ग्यारहवें अध्याय में प्रकट लौकिक रूप के भक्तिमय कीर्तन अथवा चिन्तन के लिए उपयुक्त श्लोक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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