श्रीमद्भगवद्गीता ११.५५ — मत्कर्मकृन्मत्परमो
अन्य नाम / खोज: mat karma krin mat paramo · nirvairah sarva bhuteshu · bhagavad gita 11.55 · gita 11 55 · essence of the gita verse · sa mam eti pandava
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✦ अर्थ
यह ग्यारहवें अध्याय का अन्तिम एवं चरम श्लोक है, जिसमें श्रीकृष्ण अपने तक पहुँचने के मार्ग को एक ही श्लोक में सार रूप में कहते हैं। जो भक्त भगवान के लिए कर्म करता है, उन्हें परम लक्ष्य मानता है, उनसे प्रेम करता है, अनासक्त रहता है और किसी भी प्राणी से वैर नहीं रखता, वह उन्हें प्राप्त करता है। आदि शंकराचार्य ने इस श्लोक को सम्पूर्ण भगवद्गीता का सार कहा है, जो निष्काम कर्म, भक्ति और सर्वभूत-मैत्री के समस्त उपदेश को समेटे हुए है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 55 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
यह ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूपदर्शनयोग, का समापन श्लोक है। अपना विश्वरूप प्रकट करके और फिर उसे समेट कर, विचलित अर्जुन को आश्वस्त करने के पश्चात्, श्रीकृष्ण अपनी प्राप्ति का उपाय एक ही श्लोक में सार रूप में कहते हैं। टीकाकार, जिनमें सबसे प्रमुख आदि शंकराचार्य हैं, इसे सम्पूर्ण गीता का सारभूत निचोड़ मानते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
श्री शंकराचार्य ने सिखाया कि जो इस एक श्लोक को सच्चे अर्थों में जीता है, उसने सम्पूर्ण गीता को आत्मसात कर लिया है, और ऐसा भक्त — जो भगवान के लिए कर्म करता है, उनसे प्रेम करता है, अनासक्त है और सबके प्रति मित्रवत है — निःसन्देह उन्हें प्राप्त करता है।
मंत्र
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मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥
mat-karma-kṛin mat-paramo mad-bhaktaḥ saṅga-varjitaḥ nirvairaḥ sarva-bhūteṣhu yaḥ sa mām eti pāṇḍava
अर्थ:हे पाण्डव! जो पुरुष मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, जो मेरा भक्त है तथा आसक्ति से रहित है, और जो समस्त प्राणियों के प्रति निर्वैर है, वह मुझे प्राप्त होता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.५५ — मत्कर्मकृन्मत्परमो पाठ के लाभ
शंकराचार्य द्वारा सम्पूर्ण भगवद्गीता का सार माना गया
एक ही श्लोक में भगवान तक पहुँचने का पूर्ण, व्यावहारिक सूत्र देता है
निष्काम कर्म, भक्ति और अनासक्ति को एक ही मार्ग में जोड़ता है
समस्त प्राणियों के प्रति सार्वभौमिक मैत्री और वैरभाव से मुक्ति की प्रेरणा देता है
सच्चे भक्त को परमपद की प्राप्ति का आश्वासन देता है
आध्यात्मिक जीवन में नित्य मनन और संकल्प के लिए एक प्रभावशाली श्लोक
श्रीमद्भगवद्गीता ११.५५ — मत्कर्मकृन्मत्परमो जप विधि
इस श्लोक को नित्य संकल्प के रूप में जपें, क्योंकि यह गीता के सम्पूर्ण मार्ग का सार है। जप करते हुए सच्चे भक्त के इन पाँच लक्षणों पर मनन करें: भगवान के लिए कर्म करना, उन्हें परम लक्ष्य मानना, उनसे प्रेम करना, अनासक्त रहना, और किसी भी प्राणी से वैर न रखना। इसे दिनभर अपने आचरण का मार्गदर्शक बनने दें, जिससे साधारण कर्म भी भगवान को अर्पित हो जाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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