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श्रीमद्भगवद्गीता ८.६ — यं यं वापि स्मरन्भावं

🕉️ hindu·📿 108× जप·🕐 प्रतिदिन, विशेषकर सायंकाल या सोने से पूर्व, और स्मरण की आजीवन साधना के रूप में·📜 Bhagavad Gita Chapter 8, Verse 6

अन्य नाम / खोज: yam yam vapi smaran bhavam · yam yam va api smaran bhavam tyajaty ante kalevaram · bhagavad gita 8.6 · gita 8 6 · final thought at death verse · tad bhava bhavitah

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अर्थ

यह प्रसिद्ध श्लोक मृत्यु के क्षण में अन्तिम विचार की शक्ति को प्रकट करता है। शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस भाव का स्मरण करता है, वही भाव वह अगले जन्म में प्राप्त करता है — क्योंकि अन्तिम विचार जीवन भर के चिन्तन से ढलता है। यह सिखाता है कि हम वही बनते हैं जिसका हम निरन्तर चिन्तन करते हैं, और इसलिए जीवन भर भगवान का स्मरण करने की प्रेरणा देता है, ताकि वे ही हमारा स्वाभाविक अन्तिम विचार बन जाएँ।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 8, Verse 6 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

आठवें अध्याय अक्षर-ब्रह्म योग में श्रीकृष्ण अर्जुन के परब्रह्म, आत्मा और मृत्यु के समय क्या होता है — इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं। वे समझाते हैं कि प्रयाण के क्षण की मनःस्थिति ही भविष्य की अवस्था को निर्धारित करती है, और फिर भगवान के निरन्तर स्मरण का परामर्श देते हैं, ताकि अन्तिम विचार परम लक्ष्य की ओर ले जाए।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा स्मरण कराती है कि कैसे राजा भरत, अपनी महान तपस्या के बावजूद, मृग रूप में जन्मे क्योंकि उनका अन्तिम विचार उस मृगशावक से चिपका रहा जिससे वे प्रेम करते थे — इस श्लोक का जीवन्त उदाहरण — जबकि जो भक्त अन्तिम क्षण में भगवान का स्मरण करते हैं वे उन्हें प्राप्त करते हैं; इसीलिए सन्त आजीवन स्मरण का आग्रह करते हैं।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ tyajatyante kalevaram taṁ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ

अर्थ:हे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

यं यम्🔊yam yamजो जो भी
वा🔊अथवा
अपि🔊apiभी
स्मरन्🔊smaranस्मरण करता हुआ
भावम्🔊bhāvamभाव, चिन्तन का विषय
त्यजति🔊tyajatiत्यागता है
अन्ते🔊anteअन्त में (जीवन के अन्त में)
कलेवरम्🔊kalevaramशरीर को
तम् तम्🔊tam tamउसी उसी भाव को
एव🔊evaनिश्चय ही
एति🔊etiप्राप्त होता है
कौन्तेय🔊kaunteyaहे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
सदा🔊sadāसदा
तद्भावभावितः🔊tat-bhāva-bhāvitaḥउस भाव के चिन्तन में लीन

श्रीमद्भगवद्गीता ८.६ — यं यं वापि स्मरन्भावं पाठ के लाभ

मृत्यु के समय अन्तिम विचार के निर्णायक महत्त्व को प्रकट करता है

जीवन भर भगवान के निरन्तर स्मरण की प्रेरणा देता है

सिखाता है कि हम वही बनते हैं जिसका हम अभ्यासपूर्वक चिन्तन करते हैं

ऐसी स्थिर साधना को प्रोत्साहित करता है कि अन्तिम विचार ईश्वर का ही हो

तैयारी और स्मरण के द्वारा मृत्यु के प्रति निर्भयता लाता है

साधक को उच्च पुनर्जन्म और अन्ततः मोक्ष की ओर ले जाता है

श्रीमद्भगवद्गीता ८.६ — यं यं वापि स्मरन्भावं जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयप्रतिदिन, विशेषकर सायंकाल या सोने से पूर्व, और स्मरण की आजीवन साधना के रूप में

इस श्लोक का पाठ स्वयं को यह स्मरण कराने के लिए करें कि भगवान का निरन्तर स्मरण विकसित करना है, क्योंकि अन्तिम विचार जीवन भर की आदत को प्रतिबिम्बित करता है। प्रतिदिन ईश्वर-स्मरण का अभ्यास — विशेषकर रात में सोने से पहले, जो प्रतिदिन की एक छोटी 'मृत्यु' है — मन को इस प्रकार साधता है कि भगवान स्वाभाविक अन्तिम विचार बन जाएँ। इसे माला पर जपें और इसे अपने जीवन को पवित्र स्मरण से भरने के संकल्प को दृढ़ करने दें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि शरीर त्यागते समय मनुष्य जिसका स्मरण करता है, वही उसकी अगली अवस्था को निर्धारित करता है। चूँकि अन्तिम विचार जीवन भर के चिन्तन से ढलता है, इसलिए यह श्लोक जीवन भर सही स्मरण की साधना पर बल देता है, ताकि अन्तिम विचार उच्च गति की ओर ले जाए।
ठीक वैसा नहीं। श्लोक कहता है कि अन्तिम विचार निर्णायक है, परन्तु यह भी बताता है कि वह विचार उस भाव के चिन्तन में 'सदा लीन' रहने से उठता है। अतः अन्तिम विचार वस्तुतः जीवन भर के मानसिक अभ्यास का फल है, इसीलिए जीवन भर की स्थिर साधना आवश्यक है।
ठीक अगले श्लोक में श्रीकृष्ण व्यावहारिक निर्देश देते हैं: 'इसलिए सब समय मेरा स्मरण करो और युद्ध करो।' यह समझाकर कि अन्तिम विचार गति को ढालता है, वे कर्तव्य निभाते हुए अपने निरन्तर स्मरण का परामर्श देते हैं, ताकि भगवान ही स्वाभाविक अन्तिम विचार बन जाएँ।
जप, प्रार्थना, भक्ति और धर्ममय जीवन के द्वारा जीवन भर भगवान का निरन्तर स्मरण करके। जैसे अभ्यास से कोई भी विचार स्वतः उठने लगता है, वैसे ही जीवन भर का ईश्वर-स्मरण भगवान को अन्तिम क्षण में भी मन का स्वाभाविक विषय बना देता है।

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