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दीपज्योतिः परब्रह्म — दीप प्रज्वलन मन्त्र

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 सन्ध्या (प्रदोष) काल में, देवालय के समक्ष सायं दीप जलाते समय·📜 Traditional Deepa-darshana / lamp-lighting shloka

अन्य नाम / खोज: deepa jyoti parabrahma deepa jyotir janardanah · deepam prayer · lamp lighting mantra · sandhya deepam shloka · deepo haratu me papam · evening lamp prayer

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अर्थ

यह संध्या के समय घर के देवालय के समक्ष दीप जलाते हुए पढ़ा जाने वाला प्रिय मन्त्र है। यह घोषित करता है कि यह ज्योति स्वयं परब्रह्म और भगवान विष्णु (जनार्दन) है, और प्रार्थना करता है कि यह प्रकाश पापों का हरण करे तथा शुभ, कल्याण, आरोग्य, धन एवं समस्त शत्रुता के नाश का वरदान दे। संध्या-वेला में इस श्लोक के साथ दीप प्रज्वलित करना हिन्दू गृह के सबसे सुन्दर नित्य अनुष्ठानों में से एक है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Deepa-darshana / lamp-lighting shloka · Traditional · Classical

संध्या-वेला में दीप जलाना हिन्दू गृह के सबसे प्राचीन और प्रिय अनुष्ठानों में से एक है। यह श्लोक सायंकालीन दीपम् के साथ पढ़ा जाता है, यह घोषित करते हुए कि यह ज्योति केवल अग्नि नहीं अपितु साक्षात् परब्रह्म और भगवान विष्णु हैं, जो प्रकाश रूप में विद्यमान हैं। इसके साथ भक्त दिन के रात्रि में बदलते समय दिव्यता का घर में स्वागत करता है, दीप से प्रार्थना करता है कि वह पाप और अन्धकार का हरण करे तथा आरोग्य, समृद्धि, शुभता और सद्भाव प्रदान करे। इसे प्रायः इसके सहचर दीप-मन्त्र 'शुभं करोति कल्याणम्' के साथ पढ़ा जाता है।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा से माना जाता है कि जिस घर में प्रति सन्ध्या इस प्रार्थना के साथ दीप जलाया जाता है, उसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़तीं, और परब्रह्म रूप में पूजी गई वह ज्योति केवल भौतिक अन्धकार ही नहीं, अपितु घर से दुर्भाग्य, रोग और दुर्भाव को भी दूर भगाती है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते

Deepa-jyotih parabrahma deepa-jyotir janardanah Deepo haratu me papam deepa-jyotir namo'stu te

अर्थ:दीप की ज्योति परब्रह्म है, दीप की ज्योति जनार्दन (विष्णु) है। यह दीप मेरे पापों का हरण करे; हे दीपज्योति, तुम्हें नमस्कार है। यह शुभ, कल्याण, आरोग्य, धन-सम्पदा प्रदान करे और शत्रुबुद्धि का नाश करे; हे दीपज्योति, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 2

शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यं धनसम्पदः शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते

Shubham karotu kalyanam arogyam dhana-sampadah Shatru-buddhi-vinashaya deepa-jyotir namo'stu te

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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दीपज्योतिः🔊deepa-jyotihदीप की ज्योति
परब्रह्म🔊parabrahmaपरब्रह्म
जनार्दनः🔊janardanahजनार्दन (विष्णु), समस्त प्राणियों का आश्रय
दीपः🔊deepahदीप
हरतु मे पापं🔊haratu me papamमेरे पापों का हरण करे
नमः अस्तु ते🔊namo'stu teतुम्हें नमस्कार हो (हे दीपज्योति)
शुभं करोतु🔊shubham karotuशुभ करे
कल्याणम्🔊kalyanamकल्याण, मंगल
आरोग्यं🔊arogyamआरोग्य, रोगरहितता
धनसम्पदः🔊dhana-sampadahधन और सम्पदा
शत्रुबुद्धिविनाशाय🔊shatru-buddhi-vinashayaशत्रुबुद्धि (शत्रुता) के नाश के लिए

दीपज्योतिः परब्रह्म — दीप प्रज्वलन मन्त्र पाठ के लाभ

गृह की वेदी के समक्ष संध्या-वेला में दीप (सन्ध्या दीपम्) जलाने का परम्परागत मन्त्र।

दीप की ज्योति को साक्षात् परब्रह्म और भगवान विष्णु (जनार्दन) की उपस्थिति मानकर पूजता है, जिससे घर दिव्य प्रकाश से भर जाता है।

पापों के हरण तथा शुभ, कल्याण, आरोग्य, धन एवं समृद्धि की प्रार्थना करता है।

घर से समस्त शत्रुता और दुर्भाव (शत्रुबुद्धि-विनाश) के नाश का आह्वान करता है।

दिन और रात्रि के पवित्र संधिकाल (सन्ध्या) में घर में शान्ति, पवित्रता और रक्षा का भाव लाता है।

नित्य पाठ के लिए सरल और मधुर; बच्चों को सिखाता है कि दीप को अन्धकार हरने वाले ज्ञान के प्रतीक रूप में सम्मान दें।

दीपज्योतिः परब्रह्म — दीप प्रज्वलन मन्त्र जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयसन्ध्या (प्रदोष) काल में, देवालय के समक्ष सायं दीप जलाते समय
दिशाFacing the deity / the lamp (ideally east or north)

सन्ध्या के समय गृह की वेदी के समक्ष तेल या घी का दीप जलाएँ और जलाते समय इस श्लोक का पाठ करें, ज्योति को दिव्यता की जीवन्त उपस्थिति मानकर उसकी ओर देखते हुए। बहुत-से लोग इसे 'शुभं करोति कल्याणम्' के साथ भी पढ़ते हैं। तत्पश्चात् सायं प्रार्थनाओं के दौरान दीप को प्रज्वलित रखें; ज्योति को श्रद्धापूर्वक सँभालें और कभी मुख से न बुझाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसका अर्थ है — 'दीप की ज्योति परब्रह्म है, दीप की ज्योति विष्णु (जनार्दन) है। यह दीप मेरे पापों का हरण करे; दीपज्योति को नमस्कार।' दूसरा श्लोक प्रार्थना करता है कि यह दीप शुभ, आरोग्य, धन तथा समस्त शत्रुता का नाश प्रदान करे।
यह संध्या-काल में घर के देवालय के समक्ष सायं दीप जलाते समय पढ़ा जाता है। दिन और रात्रि के संधिकाल में दीप जलाना हिन्दू घरों में विशेष पवित्र और शुभ माना जाता है।
प्रकाश ज्ञान, पवित्रता तथा अन्धकार और अज्ञान के नाश का प्रतीक है। यह श्लोक ज्योति को साक्षात् परब्रह्म और विष्णु बताता है, अतः दीप जलाना एक पूजा-कर्म है जो घर में दिव्य उपस्थिति और आशीर्वाद को आमन्त्रित करता है।

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