इन्द्र सूक्तम् (यो जात एव)
अन्य नाम / खोज: sa janasa indrah · yo jata eva prathamo manasvan · indra sukta · rigveda 2.12 · gritsamada indra hymn
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✦ अर्थ
इन्द्र सूक्तम् (ऋग्वेद २.१२) वेद के सर्वाधिक प्रसिद्ध सूक्तों में से एक है, जिसकी रचना ऋषि गृत्समद ने की। प्रत्येक ऋचा इन्द्र के किसी पराक्रम का वर्णन करती है — सूखे के दैत्य वृत्र का वध, सात नदियों का मोचन, पृथिवी और पर्वतों को स्थिर करना तथा द्युलोक को थामना — और 'स जनास इन्द्रः' ('हे लोगो! वही इन्द्र है') इस गूँजते हुए ध्रुवपद से समाप्त होती है। इसका पाठ पराक्रम, विजय तथा सृष्टि को धारण करने वाली दिव्य शक्ति में अटूट श्रद्धा के लिए किया जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Rigveda 2.12 · Rishi Gritsamada Shaunahotra (Bhargava Shaunaka) · Vedic period (c. 1500–1200 BCE)
इन्द्र के प्रति यह प्रसिद्ध सूक्त ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल का है, जो ऋषि गृत्समद के कुल का ग्रन्थ है। इसकी ऋचाओं में इन्द्र को देवों में अग्रणी, सूखे के दैत्य वृत्र का वधकर्ता, सात नदियों का मोचक तथा वह कॉस्मिक नायक कहकर सराहा गया है जिसने पृथिवी को स्थिर किया और आकाश को थामा। 'स जनास इन्द्रः' ध्रुवपद इसे सम्पूर्ण वेद के सर्वाधिक स्मरणीय और बारम्बार उद्धृत सूक्तों में से एक बनाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
ऋग्वेद बताता है कि जब इन्द्र ने अपने वज्र से वृत्र को मारा, तब सूखे में रुका हुआ जल सात नदियों के रूप में फूट पड़ा और समुद्र की ओर बहा, जिससे वर्षा, फसल और जीवन पुनः जगत् में लौट आए — यह वही आदर्श वैदिक उद्धार है जिसका उत्सव इस सूक्त के गायन के साथ मनाया जाता है।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
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ॐ यो जात एव प्रथमो मनस्वान् देवो देवान्क्रतुना पर्यभूषत्। यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेतां नृम्णस्य मह्ना स जनास इन्द्रः॥
Om Yo jāta eva prathamo manasvān Devo devān kratunā paryabhūṣat Yasya śuṣmād rodasī abhyasetāṁ Nṛmṇasya mahnā sa janāsa indraḥ
अर्थ:जो जन्म लेते ही सर्वप्रथम और बुद्धिमान होकर अपने सामर्थ्य से देवताओं से भी श्रेष्ठ हुआ; जिसके बल और पराक्रम की महिमा से द्यावा-पृथिवी (आकाश और पृथ्वी) काँप उठते हैं — हे लोगो! वही इन्द्र है।
यो पृथिवीं व्यथमानामदृंहद् यः पर्वतान्प्रकुपिताँ अरम्णात्। यो अन्तरिक्षं विममे वरीयो यो द्यामस्तभ्नात्स जनास इन्द्रः॥
Yo pṛthivīṁ vyathamānām adṛṁhad Yaḥ parvatān prakupitāṁ aramṇāt Yo antarikṣaṁ vimame varīyo Yo dyām astabhnāt sa janāsa indraḥ
अर्थ:जिसने काँपती हुई पृथिवी को स्थिर किया, जिसने प्रकुपित (हिलते) पर्वतों को शान्त किया, जिसने विशाल अन्तरिक्ष को मापा और द्युलподатोक को थाम रखा — हे लोगो! वही इन्द्र है।
यो हत्वाहिमरिणात्सप्त सिन्धून् यो गा उदाजदपधा वलस्य। यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान संवृक्समत्सु स जनास इन्द्रः॥
Yo hatvāhim ariṇāt sapta sindhūn Yo gā udājad apadhā valasya Yo aśmanor antar agniṁ jajāna Saṁvṛk samatsu sa janāsa indraḥ
अर्थ:जिसने अहि (वृत्र) का वध करके सात नदियों को मुक्त किया, जिसने वल की गुफा खोलकर छिपी हुई गौओं को बाहर निकाला, जिसने दो पत्थरों के बीच अग्नि को उत्पन्न किया और संग्रामों में विजयी रहा — हे लोगो! वही इन्द्र है।
येनेमा विश्वा च्यवना कृतानि यो दासं वर्णमधरं गुहाकः। श्वघ्नीव यो जिगीवाँल्लक्षमाद- दर्यः पुष्टानि स जनास इन्द्रः॥
Yenemā viśvā cyavanā kṛtāni Yo dāsaṁ varṇam adharaṁ guhākaḥ Śvaghnīva yo jigīvāṁ lakṣam ādad Aryaḥ puṣṭāni sa janāsa indraḥ
अर्थ:जिसके द्वारा ये सब चर-जगत् रचे गए, जिसने शत्रुओं को परास्त कर गुप्त कर दिया; जो विजयी जुआरी के समान शत्रु का सारा धन हर लेता है — हे लोगो! वही इन्द्र है।
यं स्मा पृच्छन्ति कुह सेति घोरम् उतेमाहुर्नैषो अस्तीत्येनम्। सो अर्यः पुष्टीर्विज इवा मिनाति श्रद्धास्मै धत्त स जनास इन्द्रः॥
Yaṁ smā pṛcchanti kuha seti ghoram utem āhur naiṣo astīty enam So aryaḥ puṣṭīr vija ivā mināti Śraddhāsmai dhatta sa janāsa indraḥ
अर्थ:जिस भयंकर के विषय में लोग पूछते हैं 'वह कहाँ है?', और कुछ तो यहाँ तक कहते हैं 'वह है ही नहीं'; जो जुआरी के दाँव के समान शत्रु की समृद्धि को हर लेता है — उस पर श्रद्धा रखो — हे लोगो! वही इन्द्र है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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इन्द्र सूक्तम् (यो जात एव) पाठ के लाभ
इन्द्र के बल, साहस और प्रत्येक विघ्न पर विजय पाने की इच्छाशक्ति का आवाहन करता है
धर्मसंगत संघर्षों में विजय की प्रेरणा देता है, जैसे इन्द्र ने वृत्र और वल पर विजय पाई
जगत् को धारण करने वाली अदृश्य दिव्य शक्ति में श्रद्धा को सुदृढ़ करता है
सूखा, आपदा और शत्रु-शक्तियों से रक्षा हेतु पढ़ा जाता है
नेतृत्व, पराक्रम और दृढ़ता की भावना को जगाता है
जपकर्ता को देवराज द्वारा धारित कॉस्मिक व्यवस्था से जोड़ता है
इन्द्र सूक्तम् (यो जात एव) जप विधि
बल और दृढ़ विश्वास के साथ पाठ करें, यदि सीखा हो तो वैदिक स्वर में। 'ॐ' से आरम्भ करके प्रत्येक ऋचा का पाठ करें, और 'स जनास इन्द्रः' ध्रुवपद पर दिव्य शक्ति में श्रद्धा की पुष्टि के रूप में ठहरें। कल्पना करें कि आन्तरिक विघ्न वैसे ही चूर हो रहे हैं जैसे वृत्र मारा गया और ऊर्जा की नदियाँ मुक्त हुईं। साहस और संकल्प की माँग वाले क्षणों के लिए उपयुक्त।