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मूल मंत्र

🕉️ sikh·📿 108× जप·🕐 अमृत वेला (भोर से पूर्व, 3-6 बजे) — सिख साधना का सर्वाधिक शुभ समय·🎵 ऑडियो सहित·📜 Guru Granth Sahib (opening verse)

अन्य नाम / खोज: ik onkar satnam · ek onkar · ik onkar sat naam · mool mantra

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अर्थ

मूल मंत्र गुरु ग्रंथ साहिब का आरंभिक छंद है, जिसे गुरु नानक देव जी ने रचा। यह सिख धर्म के परमात्मा के स्वरूप के संपूर्ण सार को समेटे है — एक निर्भय, निर्वैर, अकाल और स्वयंभू ईश्वर, जिसे गुरु की कृपा से जाना जाता है। इस पर ध्यान करने से अहंकार, भय और द्वेष दूर होते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Guru Granth Sahib (opening verse) · Guru Nanak Dev Ji · 1469-1539 CE

गुरु नानक ने सुल्तानपुर लोधी में बेईं नदी पर अपने रूपांतरकारी अनुभव के बाद मूल मंत्र की रचना की। तीस वर्ष की आयु में नानक नदी में स्नान करने गए और तीन दिन तक लुप्त रहे। उनके परिवार को भय हुआ कि वे डूब गए। जब वे प्रकट हुए, तो एक दिन मौन रहे, फिर अपने पहले शब्द कहे: 'न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान। तो मैं किसका मार्ग अपनाऊँ? मैं परमात्मा का मार्ग अपनाऊँगा।' मूल मंत्र वह पहला प्रकाश था जो उन्होंने साझा किया — समस्त मानवीय विभाजनों से परे एक परमात्मा का वर्णन।

शास्त्रों में वर्णित

सिख परंपरा में अंकित है कि जब गुरु नानक ने सम्राट बाबर की सेना के समक्ष मूल मंत्र का पाठ किया, तो आक्रमण करने को उद्यत सैनिक अपने स्थान पर जड़ हो गए, हिल न सके। बाबर स्वयं गुरु नानक के पास आया और मूल मंत्र सुनकर अपने सभी बंदियों को मुक्त कर दिया। मंत्र की शक्ति इतनी गहन थी कि कहा जाता है बाबर रो पड़ा और क्षमा माँगी।

सुनें और साथ में जपें

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

ਸਤਿ ਨਾਮੁ करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ।।

Ik Onkar Sat Naam Karta Purakh Nirbhau Nirvair Akal Murat Ajooni Saibhang Gur Prasad ||

अर्थ:एक ही सर्वव्यापक सृष्टिकर्ता परमेश्वर है। उसका नाम सत्य है। वह सबका रचयिता है। वह भयरहित है। वह बैररहित है। वह कालातीत और निराकार है। वह जन्म-मृत्यु से परे, स्वयंभू है। वह गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

श्लोक 2

इक ओंकार सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि

Om Ik Onkar Sat Naam Karta Purakh Nirbhau Nirvair Akal Murat Ajooni Saibhang Gur Prasad

अर्थ:ॐ। एक परमेश्वर। सत्य ही उसका नाम है। वह सबका रचयिता है। भयरहित। बैररहित। कालातीत स्वरूप। जन्म-मृत्यु से परे। स्वयं-प्रकाशित। गुरु की कृपा से जाना जाता है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

इक ओंकार🔊Ik Onkarएक ही परमेश्वर है, सर्वव्यापक सृष्टिकर्ता
सतिनामु🔊Sat Naamउसका नाम सत्य है, शाश्वत सत्य
करता पुरखु🔊Karta Purakhवह सबका रचयिता है
निरभउ🔊Nirbhauभयरहित
निरवैरु🔊Nirvairबैररहित, शत्रुतारहित
अकाल मूरति🔊Akal Muratकालातीत स्वरूप, मृत्यु से परे
अजूनी🔊Ajooniजन्म-मृत्यु से परे, अजन्मा
सैभं🔊Saibhangस्वयंभू, स्वयं-प्रकाशित
गुर प्रसादि🔊Gur Prasadगुरु की कृपा से प्राप्त

मूल मंत्र पाठ के लाभ

समस्त सिख आध्यात्मिक साधना का आधार — इसमें सिख धर्म-दर्शन का संपूर्ण सार समाया है।

मूल मंत्र पर ध्यान करने से अहंकार, भय और द्वेष दूर होते हैं।

गहरी शांति और सार्वभौमिक परमात्मा से जुड़ाव लाता है।

निर्भयता (निरभउ) और वैर से मुक्ति (निरवैर) विकसित करता है।

प्रतिदिन 108 बार पाठ करने से सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और बाधाएँ दूर होती हैं, ऐसा कहा जाता है।

सार्वभौमिक संदेश — धर्म से परे समस्त मानवता पर लागू।

मूल मंत्र जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयअमृत वेला (भोर से पूर्व, 3-6 बजे) — सिख साधना का सर्वाधिक शुभ समय

स्वच्छ, शांत स्थान पर बैठें। आदर्श समय अमृत वेला है, भोर से पूर्व। आँखें बंद करें और प्रत्येक शब्द के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करें। धीरे-धीरे पाठ करें, परमात्मा के प्रत्येक गुण को अनुभव करते हुए। सिख परंपरा में मूल मंत्र को प्रायः जपजी साहिब के आरंभ रूप में पढ़ा जाता है, परंतु इसे गहन ध्यान के लिए स्वतंत्र रूप से भी पढ़ा जा सकता है। चाहें तो माला का प्रयोग करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मूल मंत्र गुरु ग्रंथ साहिब, सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ, का आरंभिक छंद है। गुरु नानक देव जी द्वारा रचित, इसे वह मूल मंत्र माना जाता है जो परमात्मा के स्वरूप के विषय में सिख विश्वास के संपूर्ण सार को समेटे है।
गुरु नानक देव जी (1469-1539), सिख धर्म के संस्थापक, ने मूल मंत्र की रचना की। यह बेईं नदी पर उनके आत्मज्ञान के अनुभव के बाद उनकी पहली रचना थी, जहाँ वे तीन दिन तक लुप्त रहे और इस घोषणा के साथ लौटे: 'न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान।'
हाँ। मूल मंत्र का संदेश सार्वभौमिक है — यह उस एक परमात्मा का वर्णन करता है जो सभी धर्मों, भयों और द्वेषों से परे है। गुरु नानक की शिक्षाएँ बल देती हैं कि परमात्मा समस्त मानवता का है।
इक का अर्थ है एक। ओंकार का अर्थ है परमात्मा/सृष्टिकर्ता (ओम से व्युत्पन्न)। मिलकर, इक ओंकार का अर्थ है 'एक ही परमात्मा है' — सिख धर्म का मूल विश्वास कि एक ही सार्वभौमिक सृजनात्मक शक्ति है।

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