मूल मंत्र
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✦ अर्थ
मूल मंत्र गुरु ग्रंथ साहिब का आरंभिक छंद है, जिसे गुरु नानक देव जी ने रचा। यह सिख धर्म के परमात्मा के स्वरूप के संपूर्ण सार को समेटे है — एक निर्भय, निर्वैर, अकाल और स्वयंभू ईश्वर, जिसे गुरु की कृपा से जाना जाता है। इस पर ध्यान करने से अहंकार, भय और द्वेष दूर होते हैं।
उत्पत्ति और कथा
Guru Granth Sahib (opening verse) · Guru Nanak Dev Ji · 1469-1539 CE
गुरु नानक ने सुल्तानपुर लोधी में बेईं नदी पर अपने रूपांतरकारी अनुभव के बाद मूल मंत्र की रचना की। तीस वर्ष की आयु में नानक नदी में स्नान करने गए और तीन दिन तक लुप्त रहे। उनके परिवार को भय हुआ कि वे डूब गए। जब वे प्रकट हुए, तो एक दिन मौन रहे, फिर अपने पहले शब्द कहे: 'न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान। तो मैं किसका मार्ग अपनाऊँ? मैं परमात्मा का मार्ग अपनाऊँगा।' मूल मंत्र वह पहला प्रकाश था जो उन्होंने साझा किया — समस्त मानवीय विभाजनों से परे एक परमात्मा का वर्णन।
✦ शास्त्रों में वर्णित
सिख परंपरा में अंकित है कि जब गुरु नानक ने सम्राट बाबर की सेना के समक्ष मूल मंत्र का पाठ किया, तो आक्रमण करने को उद्यत सैनिक अपने स्थान पर जड़ हो गए, हिल न सके। बाबर स्वयं गुरु नानक के पास आया और मूल मंत्र सुनकर अपने सभी बंदियों को मुक्त कर दिया। मंत्र की शक्ति इतनी गहन थी कि कहा जाता है बाबर रो पड़ा और क्षमा माँगी।
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ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ।।
Ik Onkar Sat Naam Karta Purakh Nirbhau Nirvair Akal Murat Ajooni Saibhang Gur Prasad ||
अर्थ:एक ही सर्वव्यापक सृष्टिकर्ता परमेश्वर है। उसका नाम सत्य है। वह सबका रचयिता है। वह भयरहित है। वह बैररहित है। वह कालातीत और निराकार है। वह जन्म-मृत्यु से परे, स्वयंभू है। वह गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
ॐ इक ओंकार सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि
Om Ik Onkar Sat Naam Karta Purakh Nirbhau Nirvair Akal Murat Ajooni Saibhang Gur Prasad
अर्थ:ॐ। एक परमेश्वर। सत्य ही उसका नाम है। वह सबका रचयिता है। भयरहित। बैररहित। कालातीत स्वरूप। जन्म-मृत्यु से परे। स्वयं-प्रकाशित। गुरु की कृपा से जाना जाता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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मूल मंत्र पाठ के लाभ
समस्त सिख आध्यात्मिक साधना का आधार — इसमें सिख धर्म-दर्शन का संपूर्ण सार समाया है।
मूल मंत्र पर ध्यान करने से अहंकार, भय और द्वेष दूर होते हैं।
गहरी शांति और सार्वभौमिक परमात्मा से जुड़ाव लाता है।
निर्भयता (निरभउ) और वैर से मुक्ति (निरवैर) विकसित करता है।
प्रतिदिन 108 बार पाठ करने से सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और बाधाएँ दूर होती हैं, ऐसा कहा जाता है।
सार्वभौमिक संदेश — धर्म से परे समस्त मानवता पर लागू।
मूल मंत्र जप विधि
स्वच्छ, शांत स्थान पर बैठें। आदर्श समय अमृत वेला है, भोर से पूर्व। आँखें बंद करें और प्रत्येक शब्द के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करें। धीरे-धीरे पाठ करें, परमात्मा के प्रत्येक गुण को अनुभव करते हुए। सिख परंपरा में मूल मंत्र को प्रायः जपजी साहिब के आरंभ रूप में पढ़ा जाता है, परंतु इसे गहन ध्यान के लिए स्वतंत्र रूप से भी पढ़ा जा सकता है। चाहें तो माला का प्रयोग करें।