वाहेगुरु
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✦ अर्थ
वाहेगुरु सिख धर्म का गुरमंत्र है — परमात्मा का पावन नाम और ईश्वर के प्रति विस्मय एवं प्रेम की पुकार। सिख इसे हर श्वास के साथ सिमरन रूप में जपते हैं, जिससे मन शांत होकर परमात्मा में लीन हो जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Sikh tradition — the Gurmantar revealed through the Guru lineage · Sikh Guru tradition · From the time of Guru Nanak (15th–16th century) onward
वाहेगुरु सिखी का गुरमंत्र है — परमात्मा का वह नाम जो गुरु द्वारा शिष्य को दिया जाता है। जहाँ गुरु नानक का मूल मंत्र उस एक के स्वरूप का वर्णन करता है, वहीं 'वाहेगुरु' वह एकमात्र शब्द है जिसमें एक सिख उस एक को धारण करता और प्रेम करता है, उसे सिमरन में तब तक दोहराता है जब तक साधक और नाम अभिन्न न हो जाएँ। इसे हर्ष और शोक में, गुरुद्वारे और हृदय में, समस्त विश्व के सिख उच्चारित करते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
सिख कहते हैं कि निरंतर वाहेगुरु सिमरन व्यक्ति को भीतर से रूपांतरित कर देता है — भय और अहंकार को शांत करके हृदय को चढ़दी कला से भर देता है, एक अदम्य, उठती हुई आत्मिक शक्ति से। गुरुओं ने सिखाया कि नाम ही आत्मा को संसार-सागर के पार ले जाता है; असंख्य भक्त साक्षी हैं कि जब शोक या भय आता है, तो एक हृदयपूर्ण 'वाहेगुरु' शांति और गुरु द्वारा थामे जाने का भाव लौटा देता है।
मंत्र
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वाहिगुरू
Waheguru
अर्थ:वाहेगुरु — 'हे अद्भुत प्रभु!' यह सिख धर्म का गुरमंत्र है, परमात्मा का पावन नाम, जो ईश्वर के प्रति विस्मय और प्रेम की अभिव्यक्ति है। सिख इसे सिमरन रूप में — हर श्वास के साथ प्रभु-नाम के निरंतर, प्रेममय स्मरण के रूप में — जपते हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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वाहेगुरु पाठ के लाभ
सिखी का गुरमंत्र — वह एक शब्द जिसमें परमात्मा का सम्पूर्ण स्मरण समाया है।
श्वास के साथ सिमरन रूप में जपने से मन शांत होकर परमात्मा में लीन हो जाता है।
इसे ऊँचे स्वर में (जाप), फुसफुसाहट में, या हृदय में मौन रूप से — कहीं भी, कभी भी जपा जा सकता है।
माला पर, संगत में, तथा अमृत वेला (पावन भोर-पूर्व समय) में इसका जाप किया जाता है।
गहरी शांति, संतोख तथा गुरु की अनुभूत उपस्थिति प्रदान करता है।
वाहेगुरु जप विधि
'वाहेगुरु' को कोमलता और प्रेम से दोहराएँ, आदर्श रूप से इसे श्वास के साथ बहने दें — श्वास भीतर लेते हुए 'वाहे' और श्वास छोड़ते हुए 'गुरु'। कोई कर्मकांड नहीं है: माला पर, संगत में, या हृदय में मौन रूप से जप करें, जब तक नाम स्वयं ही अपने आप दोहराता न रहे (अजपा सिमरन)।