अङ्गारक स्तोत्रम्
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✦ अर्थ
स्कन्दपुराण का अङ्गारक स्तोत्रम् एक संक्षिप्त एवं शक्तिशाली स्तुति है जिसमें मङ्गल (मार्स) के इक्कीस पवित्र नामों — अङ्गारक, भौम, कुज, धरासुत आदि — का पाठ है। पारम्परिक विनियोग (ऋषि, देवता एवं छन्द का नामकरण) के पश्चात् यह मङ्गल को लाल शरीर वाले, शक्ति-धारी, पृथ्वी-पुत्र के रूप में स्तुति करता है जो ऋण, रोग एवं दरिद्रता हरते हैं। इसका फलश्रुति वचन देता है कि जो इन नामों का नियमित पाठ करता है वह ऋण, दौर्भाग्य एवं अभाव से मुक्त होकर धन, उत्तम पत्नी एवं योग्य पुत्र पाता है।
उत्पत्ति और कथा
Skanda Purana (Angaraka Stotram) · Sage Virupangiras (rishi of the mantra) · Puranic
अङ्गारक स्तोत्रम् स्कन्दपुराण में संरक्षित है, जिसके ऋषि विरूपाङ्गिरस, अधिष्ठाता देवता अग्नि एवं छन्द गायत्री है। यह ग्रह-शान्ति — नौ ग्रहों के शमन — हेतु पढ़े जाने वाले ग्रह (नवग्रह) स्तोत्रों के परिवार से सम्बन्धित है। पुराणों में मङ्गल को भूमिपुत्र, पृथ्वी देवी का पुत्र, एक उग्र, लाल, चतुर्भुज योद्धा कहा गया है जो ऊर्जा, साहस एवं भूमि का अधिपति है; यह स्तोत्र उसके सर्वाधिक पवित्र नामों को एकत्र करता है ताकि पाठक उसकी कृपा प्राप्त कर ऋण, रोग एवं अभाव से मुक्त हो सके।
✦ शास्त्रों में वर्णित
स्तोत्र की अपनी फलश्रुति एक दृढ़ वचन देती है — 'नात्र संशयः', 'इसमें सन्देह नहीं': कि जो भौम के इन नामों का निरन्तर पाठ करता है उसका ऋण, दौर्भाग्य एवं दरिद्रता नष्ट हो जाते हैं, वह विपुल धन, प्रिय पत्नी एवं वंश को गौरव देने वाला पुत्र पाता है, और मङ्गल ग्रह से उत्पन्न समस्त पीड़ा निश्चय ही दूर हो जाती है।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
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अस्य श्री अङ्गारकस्तोत्रस्य । विरूपाङ्गिरस ऋषिः । अग्निर्देवता । गायत्री छन्दः । भौमप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
asya śrī aṅgārakastotrasya | virūpāṅgirasa ṛṣiḥ | agnirdevatā | gāyatrī chandaḥ | bhaumaprītyarthaṃ jape viniyogaḥ |
अर्थ:इस अङ्गारक स्तोत्र के ऋषि विरूपाङ्गिरस हैं, देवता अग्नि हैं, छन्द गायत्री है; भौम (मङ्गल) की प्रसन्नता के लिए इसका जप किया जाता है।
अङ्गारकः शक्तिधरो लोहिताङ्गो धरासुतः । कुमारो मङ्गलो भौमो महाकायो धनप्रदः ॥ १॥
aṅgārakaḥ śaktidharo lohitāṅgo dharāsutaḥ | kumāro maṅgalo bhaumo mahākāyo dhanapradaḥ || 1||
अर्थ:अङ्गारक (दहकता अंगारा), शक्ति (भाला) धारण करने वाले, लाल शरीर वाले, पृथ्वी के पुत्र; कुमार मङ्गल, भौम, महाकाय, धन प्रदान करने वाले।
ऋणहर्ता दृष्टिकर्ता रोगकृद्रोगनाशनः । विद्युत्प्रभो व्रणकरः कामदो धनहृत् कुजः ॥ २॥
ṛṇahartā dṛṣṭikartā rogakṛd roganāśanaḥ | vidyutprabho vraṇakaraḥ kāmado dhanahṛt kujaḥ || 2||
अर्थ:ऋण हरने वाले, दृष्टि देने वाले, रोग के कर्ता एवं रोग के नाशक; विद्युत् के समान प्रभा वाले, व्रण (घाव) करने वाले, कामनापूरक, धन हरने वाले — वे कुज हैं।
सामगानप्रियो रक्तवस्त्रो रक्तायतेक्षणः । लोहितो रक्तवर्णश्च सर्वकर्मावबोधकः ॥ ३॥
sāmagānapriyo raktavastro raktāyatekṣaṇaḥ | lohito raktavarṇaśca sarvakarmāvabodhakaḥ || 3||
अर्थ:सामगान के प्रिय, रक्तवस्त्रधारी, विशाल लाल नेत्रों वाले; लोहित, रक्तवर्ण, समस्त कर्मों के ज्ञापक।
रक्तमाल्यधरो हेमकुण्डली ग्रहनायकः । नामान्येतानि भौमस्य यः पठेत्सततं नरः ॥ ४॥
raktamālyadharo hemakuṇḍalī grahanāyakaḥ | nāmānyetāni bhaumasya yaḥ paṭhet satataṃ naraḥ || 4||
अर्थ:लाल पुष्पों की माला धारण करने वाले, स्वर्ण कुण्डलधारी, ग्रहों के नायक — ये भौम के नाम हैं; जो मनुष्य इन्हें निरन्तर पढ़ता है,
ऋणं तस्य च दौर्भाग्यं दारिद्र्यं च विनश्यति । धनं प्राप्नोति विपुलं स्त्रियं चैव मनोरमाम् ॥ ५॥
ṛṇaṃ tasya ca daurbhāgyaṃ dāridryaṃ ca vinaśyati | dhanaṃ prāpnoti vipulaṃ striyaṃ caiva manoramām || 5||
अर्थ:उसका ऋण, दौर्भाग्य और दरिद्रता नष्ट हो जाते हैं; वह विपुल धन और मनोरम (प्रिय) स्त्री प्राप्त करता है।
वंशोद्द्योतकरं पुत्रं लभते नात्र संशयः । योऽर्चयेदह्नि भौमस्य मङ्गलं बहुपुष्पकैः ॥ ६॥
vaṃśoddyotakaraṃ putraṃ labhate nātra saṃśayaḥ | yo'rcayedahni bhaumasya maṅgalaṃ bahupuṣpakaiḥ || 6||
अर्थ:वह वंश को उद्द्योतित करने वाला पुत्र प्राप्त करता है — इसमें संशय नहीं; और जो दिन में भौम (मङ्गल) की बहुत से पुष्पों से अर्चना करता है,
सर्वा नश्यति पीडा च तस्य ग्रहकृता ध्रुवम् ॥ ७॥
sarvā naśyati pīḍā ca tasya grahakṛtā dhruvam || 7||
अर्थ:उसकी ग्रह-जनित समस्त पीड़ा निश्चय ही नष्ट हो जाती है।
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे अङ्गारकस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
|| iti śrīskandapurāṇe aṅgārakastotraṃ saṃpūrṇam ||
अर्थ:इस प्रकार स्कन्दपुराण में अङ्गारक स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अङ्गारक स्तोत्रम् पाठ के लाभ
मङ्गल (मार्स) के प्रसिद्ध नामों का पाठ करता है और जन्मकुण्डली में पीड़ित अथवा अशुभ मङ्गल के लिए सर्वप्रमुख परिहारों (उपायों) में से एक है।
पारम्परिक रूप से ऋण-मोचन के लिए जपा जाता है — ऋण, कर्ज एवं आर्थिक बन्धन से मुक्ति, क्योंकि अङ्गारक को 'ऋणहर्ता' अर्थात् ऋण हरने वाला कहा गया है।
इसका फलश्रुति दरिद्रता एवं दौर्भाग्य के नाश तथा विपुल धन की प्राप्ति का वचन देता है।
कहा जाता है कि यह भक्त को प्रेममयी पत्नी एवं वंश को उज्ज्वल करने वाला योग्य पुत्र प्रदान करता है।
मङ्गल दोष (कुज / मांगलिक पीड़ा) को शान्त करने तथा विवाह, सम्पत्ति एवं मुकदमे की बाधाओं को दूर करने के लिए पढ़ा जाता है।
मङ्गल साहस, ऊर्जा, भूमि एवं भाइयों का अधिपति है — यह स्तोत्र वीरता, शत्रुओं पर विजय एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवाहित किया जाता है, और यह समस्त ग्रह-पीड़ा को दूर करता है।
मङ्गलवार को लाल पुष्पों के अर्पण के साथ पढ़ने पर सर्वाधिक प्रभावी होता है।
अङ्गारक स्तोत्रम् जप विधि
स्नान करके मङ्गल अथवा नवग्रह की प्रतिमा के समक्ष दक्षिण अथवा पूर्व की ओर मुख करके बैठें, घी अथवा तिल-तेल का दीप जलाएँ तथा लाल पुष्पों (जैसे लाल गुड़हल) एवं रक्त चन्दन का अर्पण करें। पहले विनियोग पढ़ें, फिर नामों के श्लोक, फिर फलश्रुति। स्तोत्र का 11 अथवा 21 बार पाठ किया जा सकता है, और यह मङ्गलवार को अथवा प्रतिकूल मङ्गल दशा या गोचर की अवधि में ऋण एवं मङ्गल दोष से राहत हेतु विशेष फलदायी है।