श्रीमद्भगवद्गीता ११.४० — नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
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✦ अर्थ
सर्वव्यापी लौकिक रूप से अभिभूत अर्जुन भगवान को हर दिशा से -- आगे, पीछे और सब ओर से -- नमस्कार करते हैं। वे श्रीकृष्ण की अनन्त सामर्थ्य और अमित पराक्रम की स्तुति करते हैं, और घोषित करते हैं कि चूँकि भगवान सब कुछ में व्याप्त हैं, इसलिए वे ही सर्वस्व हैं। यह श्लोक पूर्ण शरणागति और भगवान की सर्वव्यापक उपस्थिति की पहचान की उच्च अभिव्यक्ति है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 40 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूप दर्शन योग में, जब अर्जुन असीम लौकिक रूप को देखते हैं, तो वे हर दिशा से नमस्कार अर्पित करने के लिए प्रेरित होते हैं। इस श्लोक में वे भगवान को आगे, पीछे और सब ओर से प्रणाम करते हैं, उनके अनन्त सामर्थ्य का गुणगान करते हुए और यह पहचानते हुए कि वे समस्त अस्तित्व में व्याप्त हैं तथा वे ही सर्वस्व हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि भगवान को हर दिशा से नमस्कार करना, उन्हें सर्वव्यापी जानते हुए, भक्त को भगवान की निरन्तर उपस्थिति की जागृति से भर देता है -- जिससे दिव्य से पृथकता अथवा दूरी का कोई भय शेष नहीं रहता।
मंत्र
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नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व। अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥
namaḥ purastād atha pṛiṣhṭhatas te namo ’stu te sarvata eva sarva ananta-vīryāmita-vikramas tvaṁ sarvaṁ samāpnoṣhi tato ’si sarvaḥ
अर्थ:हे सर्वस्वरूप! आपको आगे से और पीछे से नमस्कार! आपको सब ओर से नमस्कार हो! आप अनन्त सामर्थ्य और अमित पराक्रम वाले हैं; आप सब कुछ में व्याप्त हैं, इसीलिए आप ही सर्वस्व हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.४० — नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते पाठ के लाभ
भगवान को सब दिशाओं से नमस्कार (प्रणाम) करने वाला एक प्रबल श्लोक
हर दिशा में भगवान की सर्वव्यापी उपस्थिति को दृढ़ करता है
अपने अस्तित्व की हर ओर से पूर्ण शरणागति और श्रद्धा विकसित करता है
भगवान के अनन्त सामर्थ्य और पराक्रम पर विस्मय जगाता है
भक्त को दिव्य को सबमें व्याप्त सर्वस्व रूप में अनुभव करने में सहायता करता है
पूजा के समय प्रणाम अर्पित करने के लिए उत्तम
श्रीमद्भगवद्गीता ११.४० — नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते जप विधि
इस श्लोक का पाठ भगवान को हर दिशा में हृदयपूर्वक नमस्कार अर्पित करते हुए करें। पाठ करते समय अनुभव करें कि दिव्य आपके आगे, आपके पीछे और सब ओर विद्यमान है, समस्त अस्तित्व में व्याप्त है। इस पहचान को कि 'आप ही सर्वस्व हैं' पृथकता के किसी भी भाव को मिटाने दें, हृदय को सर्वव्यापी भगवान के प्रति श्रद्धा और शरणागति से भरते हुए।
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