श्रीमद्भगवद्गीता २.१६ — नासतो विद्यते भावो
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✦ अर्थ
सांख्य योग अध्याय का यह प्रसिद्ध श्लोक वेदान्त के मूल सत्यों में से एक को बताता है — असत् वस्तु, अर्थात् सदा परिवर्तनशील नश्वर शरीर और जगत् का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है, जबकि सत्, अर्थात् नित्य आत्मा का कभी अभाव नहीं होता। तत्त्वदर्शी ज्ञानियों ने इन दोनों का निष्कर्ष देख लिया है। श्रीकृष्ण अर्जुन को एक आध्यात्मिक आधार देते हैं — नश्वर और शाश्वत में भेद करना सीखो, तब नाशवान् वस्तुओं पर शोक स्वयं ही समाप्त हो जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 16 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
दूसरे अध्याय सांख्य योग में, श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र पर अर्जुन की विषादग्रस्त अवस्था को आत्मा की अविनाशी प्रकृति का उपदेश देकर सम्बोधित करते हैं। शरीर को अन्तर्निहित आत्मा से अलग करके बताने के पश्चात्, वे अपने समस्त उपदेश के आधारभूत दार्शनिक सिद्धान्त को कहते हैं — अनित्य का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं और नित्य का कभी विनाश नहीं — यह सत्य उन लोगों द्वारा अनुभूत है जो वस्तुओं के सार को देखते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
वेदान्त के आचार्यों की पीढ़ियों ने इस एक श्लोक को एक सम्पूर्ण ध्यान के रूप में प्रस्तुत किया है, और अनेक साधक बताते हैं कि 'नासतो विद्यते भावो' के स्थिर चिन्तन ने उनके हानि के भय को नष्ट कर दिया और अमर आत्मा में स्थित एक अटल आन्तरिक स्थिरता को प्रकट किया।
मंत्र
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नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥
nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ ubhayorapi dṛiṣhṭo ’nta stvanayos tattva-darśhibhiḥ
अर्थ:असत् वस्तु का तो अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व, तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों के द्वारा देखा गया है।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता २.१६ — नासतो विद्यते भावो पाठ के लाभ
विवेक — सत् और असत् के बीच भेद करने की शक्ति विकसित करता है
मन को अपरिवर्तनशील, नित्य आत्मा में स्थिर करके शान्ति प्रदान करता है
नश्वर शरीर से तादात्म्य में निहित शोक और भय को नष्ट करता है
सत् और असत् पर वेदान्तिक ध्यान का आधार बनाता है
जीवन के निरन्तर परिवर्तनों के बीच समता विकसित करता है
साधक को आत्मा के अमर स्वरूप के प्रति जाग्रत करता है
श्रीमद्भगवद्गीता २.१६ — नासतो विद्यते भावो जप विधि
इस श्लोक का धीरे-धीरे पाठ करें और उस भेद पर चिन्तन करें जो यह बताता है — कि परिवर्तनशील का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं और नित्य कभी नष्ट नहीं होता। प्रत्येक आवृत्ति को मन को अनित्य से हटाकर अविचल आत्मा की ओर ले जाने दें। आत्म-विचार और वेदान्त के अध्ययन के समय यह एक चिन्तनशील मन्त्र (मनन) के रूप में विशेष रूप से शक्तिशाली है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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