श्रीमद्भगवद्गीता 6.46 — तपस्विभ्योऽधिको योगी
अन्य नाम / खोज: tapasvibhyo adhiko yogi · bhagavad gita 6.46 · gita chapter 6 verse 46 · tasmad yogi bhavarjuna · be a yogi gita
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✦ अर्थ
ध्यानयोग अध्याय के अंत के निकट श्रीकृष्ण योगी को तपस्वी से, केवल शास्त्रज्ञानी से और कर्मकाण्डी से श्रेष्ठ बताते हैं, और अर्जुन को स्नेहपूर्वक प्रेरित करते हैं — 'इसलिए तुम योगी बनो।' यह श्लोक बाह्य तपस्या, शुष्क पाण्डित्य और केवल कर्मकाण्ड की अपेक्षा ध्यान और ईश्वर-मिलन के मार्ग की श्रेष्ठता घोषित करता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 6, Verse 46 · Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa) · Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)
जब ध्यानयोग अध्याय समाप्त होने को आता है, श्रीकृष्ण योगी को अन्य सभी आध्यात्मिक साधकों से ऊपर रखकर अर्जुन की आकांक्षा को ऊँचा उठाते हैं और उसे स्नेहपूर्वक योगी बनने का आदेश देते हैं। यह श्लोक अध्याय की ध्यान-सम्बन्धी विस्तृत शिक्षा को एक हृदयस्पर्शी प्रेरणा से अलंकृत करता है, और सीधे अन्तिम श्लोक की ओर ले जाता है जो प्रेमी भक्त को श्रेष्ठतम योगी कहकर सराहता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
गुरुजन इस श्लोक का उल्लेख डगमगाते साधकों को प्रोत्साहित करने के लिए करते हैं, यह स्मरण कराते हुए कि जिन ईमानदार साधकों ने कृष्ण की 'योगी बनो' की पुकार को माना, वे बाह्य तपस्याओं से ऊपर उठकर उस आन्तरिक मिलन के आनन्द में पहुँचे जिसका वर्णन इस अध्याय में किया गया है।
मंत्र
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तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
tapasvibhyo ’dhiko yogī jñānibhyo ’pi mato ’dhikaḥ karmibhyaśh chādhiko yogī tasmād yogī bhavārjuna
अर्थ:क्योंकि योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है और (केवल शास्त्र के) ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है तथा कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता 6.46 — तपस्विभ्योऽधिको योगी पाठ के लाभ
तपस्वी, विद्वान और कर्मकाण्डी से योगी की श्रेष्ठता की पुष्टि करता है
साधक को ध्यान और मिलन के आन्तरिक मार्ग को चुनने की प्रेरणा देता है
बाह्य तपस्या से आगे बढ़कर आन्तरिक अनुभूति की ओर प्रोत्साहित करता है
दृढ़ आध्यात्मिक साधना के लिए एक प्रेरक श्लोक
स्मरण कराता है कि प्रत्यक्ष अनुभव केवल पुस्तक-ज्ञान से बढ़कर है
कृष्ण की स्नेहभरी पुकार 'इसलिए योगी बनो' से संकल्प को सुदृढ़ करता है
श्रीमद्भगवद्गीता 6.46 — तपस्विभ्योऽधिको योगी जप विधि
इस श्लोक का पाठ अपनी साधना के प्रति संकल्प को नवीन करने के लिए करें। कृष्ण के अन्तिम शब्द 'तस्माद्योगी भवार्जुन' को एक व्यक्तिगत पुकार के रूप में गूँजने दें — योगी बनने की, तपस्या या विद्या के बाह्य प्रदर्शन की नहीं अपितु ध्यान की आन्तरिक एकता की खोज की। फिर उसी संकल्प के साथ अपनी साधना में बैठें।
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