श्रीमद्भगवद्गीता 6.16 — नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति
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✦ अर्थ
ध्यानयोग अध्याय में श्रीकृष्ण व्यावहारिक मार्गदर्शन देते हैं: योग न अधिक खाने वाले के लिए है, न बिल्कुल न खाने वाले के लिए; न अधिक सोने वाले के लिए, न सदा जागने वाले के लिए। आहार, निद्रा, कर्म और विश्राम — सभी दैनिक आदतों में संयम से ही साधना फलती है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 6, Verse 16 · Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa) · Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)
ध्यान योग अध्याय के भीतर श्रीकृष्ण ध्यान के आसन और स्थान से आगे बढ़कर उस जीवनशैली की ओर आते हैं जो ध्यान को सहारा देती है। यह श्लोक और इसके बाद वाला श्लोक मिलकर गीता का संयम का 'मध्यम मार्ग' प्रस्तुत करते हैं, जिसे साधक चंचल मन को स्थिर करने की आशा करने से बहुत पहले अपनाता है। यह उस शाश्वत ज्ञान को दर्शाता है कि देह को इस मार्ग पर शत्रु नहीं, अपितु संतुलित सहयोगी होना चाहिए।
✦ शास्त्रों में वर्णित
योगी पुष्टि करते हैं कि जो संयम के इस मध्यम मार्ग का आदर करते हैं, उनका शरीर हल्का और मन स्वच्छ रहता है, जिससे ध्यान शीघ्र गहराता है; और जो इसकी अवहेलना करते हैं, उनका सबसे श्रद्धालु अभ्यास भी जड़ता या व्याकुलता के कारण डगमगा जाता है।
मंत्र
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नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ na chāti-svapna-śhīlasya jāgrato naiva chārjuna
अर्थ:परन्तु, हे अर्जुन ! यह योग उस पुरुष के लिए सम्भव नहीं होता, जो अधिक खाने वाला है या बिल्कुल न खाने वाला है तथा जो अधिक सोने वाला है या सदा जागने वाला है।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता 6.16 — नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति पाठ के लाभ
सफल ध्यान के आधार रूप में संयम (युक्त-आहार-विहार) सिखाता है
आहार, निद्रा और कर्म की संतुलित दिनचर्या का मार्गदर्शन देता है
साधना के लिए शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्थिरता को सहारा देता है
भोग की अति और कठोर तपस्या — दोनों चरम सीमाओं को हटाता है
वह शान्त, नियमित जीवनशैली रचता है जो योग को सम्भव बनाती है
अनुशासित, सात्त्विक जीवन के लिए एक व्यावहारिक दैनिक स्मरण
श्रीमद्भगवद्गीता 6.16 — नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति जप विधि
अपनी दिनचर्या तय करने से पहले इस श्लोक का स्मरण रूप में पाठ करें। यह संयमित, नियमित आदतों को प्रेरित करे — न अधिक खाएँ न बिल्कुल कम, पर्याप्त सोएँ किन्तु अति नहीं, कर्म और विश्राम में संतुलन रखें। तब एक अनुशासित, सात्त्विक दिनचर्या आसन में बैठकर किए जाने वाले ध्यान को स्थिर और फलदायी बनाती है।
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