बुध कवचम्
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✦ अर्थ
ब्रह्मवैवर्तपुराण का बुध कवच बुध — बुद्धि, वाणी एवं विद्या के ग्रह — की रक्षात्मक कवच-स्तुति है, जिसके ऋषि कश्यप हैं। पुस्तक धारण किए, कुङ्कुम-वर्ण, पीताम्बरधारी, चन्द्र एवं रोहिणी के पुत्र के रूप में बुध का चित्रण करते हुए यह उन्हें भक्त के अंग-प्रत्यंग की रक्षा हेतु आमन्त्रित करता है। इसका फलश्रुति कहता है कि यह दिव्य कवच समस्त पापों का नाश, रोगों का शमन, दुःखों का निवारण करता है, तथा आयु, आरोग्य, सन्तान एवं सर्वत्र विजय प्रदान करता है।
उत्पत्ति और कथा
Brahma-Vaivarta Purana (Budha Kavacham) · Sage Kashyapa (rishi of the mantra) · Puranic
बुध कवचम् ब्रह्मवैवर्तपुराण में संरक्षित है, जिसमें ऋषि कश्यप इसके द्रष्टा एवं अनुष्टुप् इसका छन्द बताया गया है। यह ग्रह (नवग्रह) कवच-स्तुतियों के उस परिवार का अंग है जो ग्रह-शान्ति, अर्थात् नौ ग्रहों की शान्ति हेतु पढ़ी जाती हैं। पौराणिक लोक में बुध चन्द्र एवं तारा के पुत्र तथा बुद्धि, वाणी व विद्या के स्वामी हैं; पुस्तक धारण किए एवं पीत वस्त्र पहने, वे इस कवच द्वारा भक्त के अंग-प्रत्यंग की रक्षा तथा उसे ज्ञान, आरोग्य व सफलता का आशीर्वाद देने के लिए आमन्त्रित किए जाते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कवच का फलश्रुति वचन देता है कि जो भी बुध के इस दिव्य कवच को पढ़ता या मात्र सुनता है, वह 'सर्वत्र विजयी होता है' — पाप एवं रोग से मुक्त, आयु, आरोग्य एवं सन्तान से धन्य — क्योंकि बुद्धि के सौम्य स्वामी उस भक्त के प्रत्येक अंग की रक्षा करते हैं जो उनकी शरण लेता है।
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श्रीगणेशाय नमः । अस्य श्रीबुधकवचस्तोत्रमन्त्रस्य कश्यप ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, बुधो देवता, बुधप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ॥
śrīgaṇeśāya namaḥ | asya śrībudhakavacastotramantrasya kaśyapa ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ, budho devatā, budhaprītyarthaṃ jape viniyogaḥ ||
अर्थ:श्रीगणेश को नमस्कार। इस बुध कवच स्तोत्र मन्त्र के ऋषि कश्यप हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता बुध हैं; बुध की प्रसन्नता के लिए इसका जप किया जाता है।
बुधस्तु पुस्तकधरः कुङ्कुमस्य समद्युतिः । पीताम्बरधरः पातु पीतमाल्यानुलेपनः ॥ १॥
budhastu pustakadharaḥ kuṅkumasya samadyutiḥ | pītāmbaradharaḥ pātu pītamālyānulepanaḥ || 1||
अर्थ:पुस्तक धारण किए, कुङ्कुम के समान कान्ति वाले, पीताम्बरधारी, पीत माला एवं पीत अनुलेपन से सुशोभित बुध मेरी रक्षा करें।
कटिं च पातु मे सौम्यः शिरोदेशं बुधस्तथा । नेत्रे ज्ञानमयः पातु श्रोत्रे पातु निशाप्रियः ॥ २॥
kaṭiṃ ca pātu me saumyaḥ śirodeśaṃ budhastathā | netre jñānamayaḥ pātu śrotre pātu niśāpriyaḥ || 2||
अर्थ:सौम्य मेरी कटि एवं शिरःप्रदेश की रक्षा करें; ज्ञानमय मेरे नेत्रों की रक्षा करें, निशाप्रिय मेरे कानों की।
घ्राणं गन्धप्रियः पातु जिह्वां विद्याप्रदो मम । कण्ठं पातु विधोः पुत्रो भुजौ पुस्तकभूषणः ॥ ३॥
ghrāṇaṃ gandhapriyaḥ pātu jihvāṃ vidyāprado mama | kaṇṭhaṃ pātu vidhoḥ putro bhujau pustakabhūṣaṇaḥ || 3||
अर्थ:गन्धप्रिय मेरी नासिका की रक्षा करें, विद्याप्रद मेरी जिह्वा की; विधु (चन्द्र) के पुत्र मेरे कण्ठ की रक्षा करें, पुस्तकभूषण मेरी भुजाओं की।
वक्षः पातु वराङ्गश्च हृदयं रोहिणीसुतः । नाभिं पातु सुराराध्यो मध्यं पातु खगेश्वरः ॥ ४॥
vakṣaḥ pātu varāṅgaśca hṛdayaṃ rohiṇīsutaḥ | nābhiṃ pātu surārādhyo madhyaṃ pātu khageśvaraḥ || 4||
अर्थ:वराङ्ग मेरे वक्षःस्थल की रक्षा करें, रोहिणीसुत मेरे हृदय की; सुराराध्य मेरी नाभि की रक्षा करें, खगेश्वर मेरे मध्यभाग की।
जानुनी रौहिणेयश्च पातु जङ्घेऽखिलप्रदः । पादौ मे बोधनः पातु पातु सौम्योऽखिलं वपुः ॥ ५॥
jānunī rauhiṇeyaśca pātu jaṅghe'khilapradaḥ | pādau me bodhanaḥ pātu pātu saumyo'khilaṃ vapuḥ || 5||
अर्थ:रौहिणेय मेरे जानुओं की रक्षा करें, अखिलप्रद मेरी जङ्घाओं की; बोधन मेरे पादों की रक्षा करें, और सौम्य मेरे समस्त शरीर की रक्षा करें।
एतद्धि कवचं दिव्यं सर्वपापप्रणाशनम् । सर्वरोगप्रशमनं सर्वदुःखनिवारणम् ॥ ६॥
etaddhi kavacaṃ divyaṃ sarvapāpapraṇāśanam | sarvarogapraśamanaṃ sarvaduḥkhanivāraṇam || 6||
अर्थ:यह दिव्य कवच समस्त पापों का नाशक, समस्त रोगों का शमन करने वाला, एवं समस्त दुःखों का निवारण करने वाला है।
आयुरारोग्यशुभदं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७॥
āyurārogyaśubhadaṃ putrapautrapravardhanam | yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi sarvatra vijayī bhavet || 7||
अर्थ:यह आयु, आरोग्य एवं शुभ प्रदान करता है, तथा पुत्र-पौत्रों की वृद्धि करता है; जो इसे पढ़ता या सुनता है वह सर्वत्र विजयी होता है।
॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे बुधकवचं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrībrahmavaivartapurāṇe budhakavacaṃ sampūrṇam ||
अर्थ:इस प्रकार ब्रह्मवैवर्तपुराण में बुध कवच सम्पूर्ण हुआ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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बुध कवचम् पाठ के लाभ
अंग-प्रत्यंग की रक्षा करने वाला 'कवच' जो बुध की रक्षा को सम्पूर्ण शरीर पर आमन्त्रित करता है, हानि एवं अनिष्ट से बचाव करता है।
बुध बुद्धि, वाणी, विद्या, व्यापार एवं संचार के स्वामी हैं — तीक्ष्ण स्मृति, ज्ञान, वाक्पटुता तथा अध्ययन, व्यापार व परीक्षा में सफलता हेतु यह कवच पढ़ा जाता है।
इसका फलश्रुति समस्त पापों के नाश एवं समस्त रोगों के शमन का वचन देता है — आरोग्य हेतु, विशेषतः बुध से सम्बद्ध स्नायु एवं त्वचा रोगों के लिए पढ़ा जाता है।
यह आयु, आरोग्य एवं शुभ प्रदान करता है तथा सन्तान (पुत्र-पौत्र) की वृद्धि करता है, ऐसा कहा गया है।
वचन देता है कि पाठक या श्रोता भी 'सर्वत्र विजयी होता है' — समस्त कार्यों में सफलता हेतु इसका आह्वान किया जाता है।
जन्मकुण्डली में दुर्बल या पीड़ित बुध तथा बुध दोष का पारम्परिक परिहार।
बुधवार को, बुध के वार, हरे या पीले अर्पण के साथ पढ़ना सर्वाधिक शुभ है।
बुध कवचम् जप विधि
स्नान कर बुध या नवग्रह के चित्र के समक्ष उत्तर या पूर्व की ओर मुख कर बैठें, यथासम्भव घी का दीप एवं हरे या पीले पुष्प, हरी मूँग तथा पीत या हरित वस्त्र के अर्पण के साथ। पहले विनियोग, फिर ध्यान एवं प्रत्येक अंग की रक्षा करने वाले कवच-श्लोक, और अन्त में फलश्रुति का पाठ करें। यह बुधवार को सर्वाधिक शक्तिशाली है तथा कठिन बुध दशा की अवधि में या अध्ययन व वाणी में सफलता हेतु प्रतिदिन पढ़ा जा सकता है।