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चन्द्रशेखर अष्टकम्

🕉️ hindu·📿 8× जप·🕐 सोमवार प्रातः, प्रदोष काल, महाशिवरात्रि, अथवा भय, रोग या संकट के समय·📜 Traditional Shaiva stotra literature, popularly attributed to the sage Markandeya

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अर्थ

चन्द्रशेखर अष्टकम् भगवान शिव की एक शक्तिशाली स्तुति है, जिसमें उन्हें 'चन्द्रशेखर' — अर्थात् 'मस्तक पर चन्द्रमा धारण करने वाले' — के रूप में सम्बोधित किया गया है। प्रत्येक श्लोक शिव के किसी दिव्य रूप या लीला का सजीव वर्णन करता है और इस निर्भय टेक के साथ समाप्त होता है — 'मैं चन्द्रशेखर की शरण लेता हूँ, फिर यमराज मेरा क्या कर सकता है?' परम्परा के अनुसार यह बालक ऋषि मार्कण्डेय से जुड़ा है जिन्होंने शिव की शरण लेकर मृत्यु पर विजय पाई; यह रक्षा, निर्भयता और मृत्यु-भय पर विजय के लिए पढ़ा जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Shaiva stotra literature, popularly attributed to the sage Markandeya · Traditionally attributed to Markandeya Rishi · Classical (ancient)

चन्द्रशेखर अष्टकम् परम्परागत रूप से मार्कण्डेय से जुड़ा है, वह बालक जो सोलह वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त होने वाला था। जैसे ही नियत समय आया और यम का पाश उतरा, मार्कण्डेय ने शिवलिङ्ग का आलिङ्गन कर अपनी भक्ति उँडेल दी। मृत्युञ्जय भगवान शिव लिङ्ग से प्रकट हुए, यम को आघात किया, और बालक को अमरत्व का वरदान दिया। इस स्तुति की निर्भय टेक — 'मैं चन्द्रशेखर की शरण लेता हूँ, यम मेरा क्या कर सकता है?' — भक्ति की मृत्यु पर विजय को व्यक्त करती है, और तब से इसे निर्भयता एवं रक्षा हेतु पढ़ा जाता रहा है।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि बालक ऋषि मार्कण्डेय, जब यम का पाश उन पर गिरा तब शिवलिङ्ग का आलिङ्गन करते हुए, मृत्यु से भी बच गए जब भगवान शिव प्रकट होकर उन्हें चिर-यौवन का वरदान दिया। भक्तों का विश्वास है कि इसी पूर्ण शरण के भाव से चन्द्रशेखर अष्टकम् का पाठ अकाल मृत्यु से रक्षा करता है और हृदय को पूर्णतः निर्भय बना देता है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहि माम्। चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्ष माम्॥

Chandrashekhara Chandrashekhara Chandrashekhara Pahi Mam Chandrashekhara Chandrashekhara Chandrashekhara Raksha Mam

अर्थ:हे चन्द्रशेखर, चन्द्रशेखर, चन्द्रशेखर — मेरी रक्षा करो! हे चन्द्रशेखर, चन्द्रशेखर, चन्द्रशेखर — मुझे बचाओ!

श्लोक 2

रत्नसानुशरासनं रजताद्रिशृङ्गनिकेतनं शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युताननसायकम्। क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवन्दितं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥

Ratna-sanu-sharasanam Rajatadri-shringa-niketanam Shinjini-krita-pannageshvaram Achyutanana-sayakam Kshipra-dagdha-pura-trayam Tridashalayair-abhivanditam Chandrashekharam-ashraye Mama Kim Karishyati Vai Yamah

अर्थ:जिनका धनुष रत्नमय पर्वत (मेरु) है, जो रजत पर्वत (कैलास) के शिखर पर निवास करते हैं, जिन्होंने नागराज वासुकि को प्रत्यञ्चा और विष्णु को बाण बनाया, जिन्होंने शीघ्र ही त्रिपुर को भस्म कर दिया, जो देवताओं द्वारा वन्दित हैं — उन चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर यमराज मेरा क्या कर सकता है?

श्लोक 3

पञ्चपादपपुष्पगन्धपदाम्बुजद्वयशोभितं भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम्। भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशनं भवमव्ययं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥

Pancha-padapa-pushpa-gandha-padambuja-dvaya-shobhitam Bhala-lochana-jata-pavaka-dagdha-manmatha-vigraham Bhasma-digdha-kalevaram Bhava-nashanam Bhavam-avyayam Chandrashekharam-ashraye Mama Kim Karishyati Vai Yamah

अर्थ:जिनके दोनों चरणकमल पुष्पों की सुगन्ध से सुशोभित और पूजित हैं, जिन्होंने अपने ललाट-नेत्र की अग्नि से कामदेव का शरीर भस्म कर दिया, जिनका शरीर भस्म से लिप्त है, जो संसार-बन्धन के नाशक एवं स्वयं अविनाशी हैं — उन चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर यमराज मेरा क्या कर सकता है?

श्लोक 4

मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं पङ्कजासनपद्मलोचनपूजिताङ्घ्रिसरोरुहम्। देवसिन्धुतरङ्गसीकरसिक्तशुभ्रजटाधरं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥

Matta-varana-mukhya-charma-kritottariya-manoharam Pankajasana-padma-lochana-pujitanghri-saroruham Deva-sindhu-taranga-sikara-sikta-shubhra-jatadharam Chandrashekharam-ashraye Mama Kim Karishyati Vai Yamah

अर्थ:जो मतवाले गजराज के चर्म का उत्तरीय धारण किए मनोहर हैं, जिनके चरणकमल कमलासन कमललोचन ब्रह्मा द्वारा पूजित हैं, जो देवनदी गंगा की तरंगों के जल-कणों से सिक्त उज्ज्वल जटा धारण करते हैं — उन चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर यमराज मेरा क्या कर सकता है?

श्लोक 5

यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम्। क्ष्वेलनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥

Yaksha-raja-sakham Bhagaksha-haram Bhujanga-vibhushanam Shaila-raja-sutaparishkrita-charu-vama-kalevaram Kshvela-neela-galam Parashvadha-dharinam Mriga-dharinam Chandrashekharam-ashraye Mama Kim Karishyati Vai Yamah

अर्थ:जो यक्षराज (कुबेर) के मित्र हैं, जिन्होंने भग के नेत्र हरे, जो सर्पों से विभूषित हैं, जिनके सुन्दर वाम अंग को पर्वतराज-पुत्री (पार्वती) सुशोभित करती हैं, जिनका कण्ठ विष से नीला है, जो परशु और मृग धारण करते हैं — उन चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर यमराज मेरा क्या कर सकता है?

श्लोक 6

कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वरकुण्डलं वृषवाहनं नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम्। अन्धकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥

Kundali-krita-kundalishvara-kundalam Vrisha-vahanam Naradadi-muneeshvara-stuta-vaibhavam Bhuvaneshvaram Andhakantakam-ashritamara-padapam Shamanantakam Chandrashekharam-ashraye Mama Kim Karishyati Vai Yamah

अर्थ:जो कुण्डलित नागराज को कुण्डल रूप में धारण करते हैं, जो वृषभ पर सवार हैं, जिनका वैभव नारद आदि मुनीश्वरों द्वारा स्तुत है, जो भुवनेश्वर हैं, अन्धकासुर के अन्तक हैं, शरणागतों के लिए कल्पवृक्ष हैं, यम के भी अन्तक हैं — उन चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर यमराज मेरा क्या कर सकता है?

श्लोक 7

भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं दक्षयज्ञविनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम्। भुक्तिमुक्तिफलप्रदं सकलाघसङ्घनिबर्हणं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥

Bheshajam Bhava-roginam-akhilapadam-apaharinam Daksha-yajna-vinashanam Triguna-atmakam Tri-vilochanam Bhukti-mukti-phala-pradam Sakalagha-sangha-nibarhanam Chandrashekharam-ashraye Mama Kim Karishyati Vai Yamah

अर्थ:जो संसार-रोगियों के लिए औषधि हैं, समस्त आपदाओं को हरने वाले हैं, जिन्होंने दक्ष-यज्ञ का विनाश किया, जो त्रिगुणात्मक और त्रिनेत्र हैं, जो भोग और मोक्ष दोनों के फलदाता तथा सब पाप-समूहों के नाशक हैं — उन चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर यमराज मेरा क्या कर सकता है?

श्लोक 8

भक्तवत्सलमर्चितं निधिमक्षयं हरिदम्बरं सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनुत्तमम्। सोमवारिनभोहुताशनसोमपामरमेश्वरं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥

Bhakta-vatsalam-architam Nidhim-akshayam Haridambaram Sarva-bhuta-patim Paratparam-aprameyam-anuttamam Soma-vari-nabho-hutashana-somapa-mareshvaram Chandrashekharam-ashraye Mama Kim Karishyati Vai Yamah

अर्थ:जो भक्तवत्सल, पूजित, अक्षय निधि, दिगम्बर (आकाश रूपी वस्त्रधारी), सर्वभूतपति, परात्पर, अप्रमेय और अनुत्तम हैं, जो चन्द्र, जल, आकाश, अग्नि, सोमपान करने वाले तथा महेश्वर हैं — उन चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर यमराज मेरा क्या कर सकता है?

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

चन्द्रशेखर🔊Chandrashekharaचन्द्रशेखर — जो अपने मस्तक (शेखर) पर चन्द्रमा (चन्द्र) धारण करते हैं — भगवान शिव
पाहि माम्🔊Pahi Mamमेरी रक्षा करो
रक्ष माम्🔊Raksha Mamमुझे बचाओ, मेरी रखवाली करो
रत्नसानुशरासनं🔊Ratna-sanu-sharasanamजिनका धनुष रत्नमय पर्वत मेरु है
रजताद्रिशृङ्गनिकेतनं🔊Rajatadri-shringa-niketanamजिनका निवास रजत पर्वत (कैलास) का शिखर है
शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरम्🔊Shinjini-krita-pannageshvaramजिन्होंने नागराज वासुकि को अपनी प्रत्यञ्चा बनाया
क्षिप्रदग्धपुरत्रयं🔊Kshipra-dagdha-pura-trayamजिन्होंने शीघ्र ही त्रिपुर (तीन नगरों) को भस्म कर दिया
त्रिदशालयैरभिवन्दितं🔊Tridashalayair-abhivanditamजो स्वर्गवासियों (देवों) द्वारा वन्दित हैं
माश्रये🔊Ashrayeमैं शरण लेता हूँ
मम किं करिष्यति वै यमः🔊Mama Kim Karishyati Vai Yamahफिर मृत्यु के स्वामी यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?
भाललोचनजातपावक🔊Bhala-lochana-jata-pavakaललाट के नेत्र (तीसरे नेत्र) से उत्पन्न अग्नि
दग्धमन्मथविग्रहम्🔊Dagdha-manmatha-vigrahamजिन्होंने मन्मथ (कामदेव, इच्छा के देव) का शरीर भस्म कर दिया
भस्मदिग्धकलेवरं🔊Bhasma-digdha-kalevaramजिनका शरीर पवित्र भस्म (विभूति) से लिप्त है
देवसिन्धुतरङ्ग🔊Deva-sindhu-tarangaदेवनदी (गंगा) की तरंगें
शुभ्रजटाधरं🔊Shubhra-jatadharamजो उज्ज्वल जटाएँ धारण करते हैं
क्ष्वेलनीलगलं🔊Kshvela-neela-galamजिनका कण्ठ (हलाहल) विष से नीला है
वृषवाहनं🔊Vrisha-vahanamजिनका वाहन वृषभ (नन्दी) है
अन्धकान्तकम्🔊Andhakantakamअन्धक असुर के संहारक
भेषजं भवरोगिणाम्🔊Bheshajam Bhava-roginamसंसार-रूपी रोग से पीड़ितों के लिए औषधि
भुक्तिमुक्तिफलप्रदं🔊Bhukti-mukti-phala-pradamभोग और मोक्ष दोनों के फलदाता
सर्वभूतपतिं🔊Sarva-bhuta-patimसमस्त प्राणियों के स्वामी
परात्परम्🔊Paratparamउच्चतम से भी उच्चतर, परम सर्वोच्च

चन्द्रशेखर अष्टकम् पाठ के लाभ

निर्भयता तथा मृत्यु के भय (मृत्यु-भय) से मुक्ति प्रदान करता है

दुर्घटनाओं, रोग एवं अकाल संकट के विरुद्ध शिव की रक्षा का आह्वान करता है

'यम मेरा क्या कर सकता है?' की टेक गहन साहस एवं समर्पण का संचार करती है

मार्कण्डेय की मृत्यु पर विजय से जुड़ा — दीर्घायु हेतु पढ़ा जाता है

बाधाओं, आपदाओं एवं संचित पापों के भार को दूर करता है

सांसारिक कल्याण (भुक्ति) तथा मुक्ति दोनों प्रदान करता है

मन को शान्त करता है एवं भगवान शिव में अटल भक्ति को गहरा करता है

चन्द्रशेखर अष्टकम् जप विधि

जप संख्या8बार
उत्तम समयसोमवार प्रातः, प्रदोष काल, महाशिवरात्रि, अथवा भय, रोग या संकट के समय

शिव के चित्र अथवा लिङ्ग के सम्मुख पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें, दीपक जलाएँ, और आरम्भिक टेक 'चन्द्रशेखर... पाहि माम्... रक्ष माम्' तीन बार से प्रारम्भ करें। फिर आठ श्लोकों का धीरे-धीरे पाठ करें, हृदय में अन्तिम पंक्ति 'मम किं करिष्यति वै यमः' को पूर्ण शरण की घोषणा रूप में लौटाते हुए। इसे विशेषतः रोग अथवा भय के समय, तथा रोगी की रक्षा एवं आरोग्य के निमित्त पढ़ा जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चन्द्रशेखर का अर्थ है 'जो चन्द्रमा (चन्द्र) को अपने मस्तक के मुकुट-रत्न (शेखर) रूप में धारण करते हैं'। यह भगवान शिव के सबसे प्रिय नामों में से एक है, जो उनकी जटाओं को सुशोभित करते अर्धचन्द्र को दर्शाता है — उनकी शान्ति एवं काल पर अधिकार का प्रतीक।
'मैं चन्द्रशेखर की शरण लेता हूँ — फिर यम मेरा क्या कर सकता है?' यह टेक निर्भय समर्पण को व्यक्त करती है। एक बार पूर्ण रूप से शिव, मृत्युञ्जय, की शरण ले लेने पर यम का भी भय नहीं रहता। इसीलिए यह स्तुति रक्षा एवं मृत्यु-भय से मुक्ति हेतु पढ़ी जाती है।
हाँ। सोलह वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त होने वाले बालक ऋषि मार्कण्डेय ने शिवलिङ्ग का आलिङ्गन किया और जब शिव प्रकट होकर यम को रोक दिया तो वे बच गए। शिव से लिपटकर मृत्यु को ललकारने वाला इस स्तुति का निर्भय भाव उसी कालातीत कथा को दर्शाता है, और इसे प्रायः दीर्घायु एवं रक्षा हेतु पढ़ा जाता है।
इसे आदर्शतः सोमवार (शिव के दिन), प्रदोष काल एवं महाशिवरात्रि को पढ़ा जाता है। रोग, भय अथवा संकट के समय तथा रोगियों के निमित्त भी इसे शिव की रक्षात्मक कृपा के आह्वान हेतु पढ़ा जाता है।

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