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मार्कण्डेय शिवाष्टकम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः या संध्या; विशेषकर सोमवार को·📜 Traditional (sage Markandeya)

अन्य नाम / खोज: sada godavaryastatanikatavasam pashupatim · markandeya shivashtakam lyrics

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अर्थ

मार्कण्डेय शिवाष्टकम् ऋषि मार्कण्डेय द्वारा रचित भगवान शिव की आठ श्लोकों की स्तुति है, जिन्होंने शिव-कृपा से मृत्यु पर विजय पाई। यह गोदावरी-तट के अधिपति, पशुपति, भय व मृत्यु के नाशक की वंदना करती है। इसका भक्ति-भाव से पाठ करने से मन शांत और हृदय स्थिर होता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional (sage Markandeya) · Markandeya · Puranic

मार्कण्डेय शिवाष्टकम् परम्परागत रूप से ऋषि मार्कण्डेय को आरोपित है। यह ऋषि मार्कण्डेय — जिन्होंने शिव-कृपा से मृत्यु पर विजय पाई — द्वारा भगवान शिव की आठ श्लोकों की स्तुति है, जो गोदावरी-तट के अधिपति, पशुपति, भय व मृत्यु के नाशक की वंदना करती है।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि मार्कण्डेय शिवाष्टकम् का सच्चे और भक्तिपूर्ण हृदय से पाठ करना भगवान की कृपा के निकट जाना है, जो प्रेमपूर्वक उन्हें पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागते।

मंत्र

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सदा गोदावर्यास्तटनिकटवासं पशुपतिं वदान्यं सर्वेशं वरदमखिलार्थैक घटनम् शिवं गौरीनाथं शशिधरमनन्तार्चितपदं भजे मार्कण्डेयं भसितनिटलं भव्यनटनम् १॥ सदा कैलासाद्रि स्वपदमनघं सर्वजगतां प्रभुं श्रीविश्वेशं प्रकटित परन्धामसरथम् नटेशं गौरीशं ललितरविचन्द्रानलसदृशं भजे मार्कण्डेयं भसितनिटलं भव्यनटनम् २॥ महादेवं सर्वं मधुरिपुसखं मङ्गलकरं परं शम्भुं साम्बं पुरमथनमीशं भवहरम् स्मरारिं सर्वज्ञं स्मरहरमनादिं मृगधरं भजे मार्कण्डेयं भसितनिटलं भव्यनटनम् ३॥ प्रदोषेषु स्वान्तं प्रबलतरतौर्यत्रिककृतं त्रयत्रिंशत्कोटि त्रिशदप्रवरैः सं परिवृतम् रमावाणीन्द्र श्रीपति विधिकृतोल्लास्यकरणं भजे मार्कण्डेयं भसितनिटलं भव्यनटनम् ४॥ भवानीहृत्पद्मारुणमहिनि नीलोत्पलगलं सहस्रारे पद्मानिशमविवसन्तं सुरगुरुम् स्तुतिभ्यो भक्तानां निखिलसुखदं सुस्थिरपदं भजे मार्कण्डेयं भसितनिटलं भव्यनटनम् ५॥ शिवस्त्वं विष्णुत्वं सकलभुवनस्त्वं रविशशि- नभस्त्वं कायस्त्वं सकलजगात्मा त्वमसि भो यतिर्देयं सान्ते सुखतमखिलं जैमिनिवरेः भजे मार्कण्डेयं भसितनिटलं भव्यनटनम् ६॥ सदोच्चैराह्वानं हरहरहरेति प्रवचसा सदा भक्त्यानन्दो शिवशिवशिवेति स्वमनसा स्तुतिं वारं वारम्भवभवभवेति प्रतिभया भजे मार्कण्डेयं भसितनिटलं भव्यनटनम् ७॥ यमाहूतं भीतं मुनिवरनुतं पाशनिहतिं भवन्तं सद्भक्त्या हृदिशिशुमवन्तं करुणया शरण्यं भक्तानां परमगतिमीशं परशिवं भजे मार्कण्डेयं भसितनिटलं भव्यनटनम् ८॥ श्रीकोलाचलसद्वंशवारिदेस्तु सुधाकरः यज्ञेशो भूसुरश्चक्रे मार्कण्डेयशिवाष्टकम् ९॥ इति श्रीमार्कण्डेयकृतं शिवाष्टकं सम्पूर्णम्

sadā godāvaryāstaṭanikaṭavāsaṃ paśupatiṃ vadānyaṃ sarveśaṃ varadamakhilārthaika ghaṭanam | śivaṃ gaurīnāthaṃ śaśidharamanantārcitapadaṃ bhaje mārkaṇḍeyaṃ bhasitaniṭalaṃ bhavyanaṭanam || 1|| sadā kailāsādri svapadamanaghaṃ sarvajagatāṃ prabhuṃ śrīviśveśaṃ prakaṭita parandhāmasaratham | naṭeśaṃ gaurīśaṃ lalitaravicandrānalasadṛśaṃ bhaje mārkaṇḍeyaṃ bhasitaniṭalaṃ bhavyanaṭanam || 2|| mahādevaṃ sarvaṃ madhuripusakhaṃ maṅgalakaraṃ paraṃ śambhuṃ sāmbaṃ puramathanamīśaṃ bhavaharam | smarāriṃ sarvajñaṃ smaraharamanādiṃ mṛgadharaṃ bhaje mārkaṇḍeyaṃ bhasitaniṭalaṃ bhavyanaṭanam || 3|| pradoṣeṣu svāntaṃ prabalataratauryatrikakṛtaṃ trayatriṃśatkoṭi triśadapravaraiḥ saṃ parivṛtam | ramāvāṇīndra śrīpati vidhikṛtollāsyakaraṇaṃ bhaje mārkaṇḍeyaṃ bhasitaniṭalaṃ bhavyanaṭanam || 4|| bhavānīhṛtpadmāruṇamahini nīlotpalagalaṃ sahasrāre padmāniśamavivasantaṃ suragurum | stutibhyo bhaktānāṃ nikhilasukhadaṃ susthirapadaṃ bhaje mārkaṇḍeyaṃ bhasitaniṭalaṃ bhavyanaṭanam || 5|| śivastvaṃ viṣṇutvaṃ sakalabhuvanastvaṃ raviśaśi- nabhastvaṃ kāyastvaṃ sakalajagātmā tvamasi bho | yatirdeyaṃ sānte sukhatamakhilaṃ jaiminivareḥ bhaje mārkaṇḍeyaṃ bhasitaniṭalaṃ bhavyanaṭanam || 6|| sadoccairāhvānaṃ haraharahareti pravacasā sadā bhaktyānando śivaśivaśiveti svamanasā | stutiṃ vāraṃ vārambhavabhavabhaveti pratibhayā | bhaje mārkaṇḍeyaṃ bhasitaniṭalaṃ bhavyanaṭanam || 7|| yamāhūtaṃ bhītaṃ munivaranutaṃ pāśanihatiṃ bhavantaṃ sadbhaktyā hṛdiśiśumavantaṃ karuṇayā | śaraṇyaṃ bhaktānāṃ paramagatimīśaṃ paraśivaṃ bhaje mārkaṇḍeyaṃ bhasitaniṭalaṃ bhavyanaṭanam || 8|| śrīkolācalasadvaṃśavāridestu sudhākaraḥ | yajñeśo bhūsuraścakre mārkaṇḍeyaśivāṣṭakam || 9|| iti śrīmārkaṇḍeyakṛtaṃ śivāṣṭakaṃ sampūrṇam |

अर्थ:ऋषि मार्कण्डेय — जिन्होंने शिव-कृपा से मृत्यु पर विजय पाई — द्वारा भगवान शिव की आठ श्लोकों की स्तुति, जो गोदावरी-तट के अधिपति, पशुपति, भय व मृत्यु के नाशक को वंदन करती है।

मार्कण्डेय शिवाष्टकम् पाठ के लाभ

मार्कण्डेय शिवाष्टकम् का पाठ भगवान की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्रदान करने वाला माना जाता है।

यह भक्ति को बढ़ाता है, मन को शांत करता है और भगवान के स्मरण में हृदय को स्थिर करता है।

सोमवार को, तथा महाशिवरात्रि, प्रदोष और श्रावण मास में इसका पाठ सर्वाधिक शुभ होता है।

एक छोटी, मधुर स्तुति जिसे कोई भी सीख सकता है और श्रद्धा से प्रतिदिन पाठ कर सकता है।

मार्कण्डेय शिवाष्टकम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः या संध्या; विशेषकर सोमवार को
दिशाEast or North

स्नान करके देवता की प्रतिमा के सामने पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। दीप जलाएँ और मार्कण्डेय शिवाष्टकम् का धीरे-धीरे भक्ति-भाव से पाठ करें। इसे प्रतिदिन, अथवा विशेषकर महाशिवरात्रि, प्रदोष और श्रावण मास में पाठ किया जा सकता है। कृपा और रक्षा की प्रार्थना के साथ समापन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऋषि मार्कण्डेय — जिन्होंने शिव-कृपा से मृत्यु पर विजय पाई — द्वारा भगवान शिव की आठ श्लोकों की स्तुति, जो गोदावरी-तट के अधिपति, पशुपति, भय व मृत्यु के नाशक को वंदन करती है।
यह ऋषि मार्कण्डेय (परम्परागत — ऋषि मार्कण्डेय) को समर्पित है। इसका पाठ प्रातः या संध्या को भक्ति के साथ किया जाता है, और विशेषकर सोमवार को तथा महाशिवरात्रि, प्रदोष और श्रावण मास में।

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