चिन्मय लिङ्गाष्टकम्
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✦ अर्थ
चिन्मय लिङ्गाष्टकम् चिन्मय लिङ्ग — शुद्ध चैतन्य के लिङ्ग — की आठ श्लोकों की संस्कृत स्तुति है। यह शिव को रूप में नहीं, अपितु निराकार, सर्वव्यापी चेतना रूप में, जो ब्रह्मांड का सार है, ध्यान करती है। सोमवार, महाशिवरात्रि, प्रदोष तथा श्रावण मास में इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional (ascribed to Rudra) · Rudra · Classical
चिन्मय लिङ्गाष्टकम् परंपरागत रूप से रुद्र द्वारा रचित माना जाता है। यह चिन्मय लिङ्ग — शुद्ध चैतन्य के लिङ्ग — की आठ श्लोकों की स्तुति है, जो शिव को रूप में नहीं, अपितु निराकार, सर्वव्यापी चेतना रूप में, जो ब्रह्मांड का सार है, ध्यान करती है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि सच्चे और भक्ति-भरे हृदय से चिन्मय लिङ्गाष्टकम् का पाठ करना उस प्रभु की कृपा के निकट जाना है, जो प्रेमपूर्वक पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागते।
मंत्र
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(श्रीरुद्रकृतम्) ब्रह्ममुखामरपूजितलिङ्गं जिह्मगभूषणभूषितलिङ्गम् । सिंहमहामदमर्दनलिङ्गं चित्त सदा भज चिन्मयलिङ्गम् ॥ १॥ कनकधराधरकार्मुकलिङ्गं सनकमुखादिसुसन्नुतलिङ्गम् । दिनकरकोटिसुदीधितिलिङ्गं चित्त सदा भज चिन्मयलिङ्गम् ॥ २॥ अष्टविभूतिदमिष्टदलिङ्गं सृष्टजगत्त्रयरक्षकलिङ्गम् । अष्टमहाभयशिक्षकलिङ्गं चित्त सदा भज चिन्मयलिङ्गम् ॥ ३॥ मत्तगजाजिनवेष्टितलिङ्गं दग्धजगत्कृतपञ्चकलिङ्गम् । उत्तमपूरुषवत्सललिङ्गं चित्त सदा भज चिन्मयलिङ्गम् ॥ ४॥ अङ्गभवाङ्गसुभङ्गदलिङ्गं तुङ्गजटाभरशोभितलिङ्गम् । मङ्गलदायकमद्भुतलिङ्गं चित्त सदा भज चिन्मयलिङ्गम् ॥ ५॥ पङ्कजनेत्रसमर्चितलिङ्गं शङ्करमादिममच्युतलिङ्गम् । सङ्कटदोषनिवर्तकलिङ्गं चित्त सदा भज चिन्मयलिङ्गम् ॥ ६॥ अभ्रसभान्तरनर्तनलिङ्गं शुभ्रविभूतिविभूषितलिङ्गम् । शुभ्रहृदम्बुजशोभितलिङ्गं चित्त सदा भज चिन्मयलिङ्गम् ॥ ७॥ कुन्दवनान्तरमन्दिरलिङ्गं मन्दहसाननसुन्दरलिङ्गम् । वन्दितभक्तजनावृतलिङ्गं चित्त सदा भज चिन्मयलिङ्गम् ॥ ८॥ रुद्रकृताष्टकमद्भुतमेतद्भद्रकरं पठतीह मनुष्यः । इष्टफलं समवाप्य यथेष्टं शिष्टजनोत्तम एव हि स स्यात् ॥ ९॥ इति श्रीरुद्रकृतं चिन्मयलिङ्गाष्टकं सम्पूर्णम् ।
(śrīrudrakṛtam) brahmamukhāmarapūjitaliṅgaṃ jihmagabhūṣaṇabhūṣitaliṅgam | siṃhamahāmadamardanaliṅgaṃ citta sadā bhaja cinmayaliṅgam || 1|| kanakadharādharakārmukaliṅgaṃ sanakamukhādisusannutaliṅgam | dinakarakoṭisudīdhitiliṅgaṃ citta sadā bhaja cinmayaliṅgam || 2|| aṣṭavibhūtidamiṣṭadaliṅgaṃ sṛṣṭajagattrayarakṣakaliṅgam | aṣṭamahābhayaśikṣakaliṅgaṃ citta sadā bhaja cinmayaliṅgam || 3|| mattagajājinaveṣṭitaliṅgaṃ dagdhajagatkṛtapañcakaliṅgam | uttamapūruṣavatsalaliṅgaṃ citta sadā bhaja cinmayaliṅgam || 4|| aṅgabhavāṅgasubhaṅgadaliṅgaṃ tuṅgajaṭābharaśobhitaliṅgam | maṅgaladāyakamadbhutaliṅgaṃ citta sadā bhaja cinmayaliṅgam || 5|| paṅkajanetrasamarcitaliṅgaṃ śaṅkaramādimamacyutaliṅgam | saṅkaṭadoṣanivartakaliṅgaṃ citta sadā bhaja cinmayaliṅgam || 6|| abhrasabhāntaranartanaliṅgaṃ śubhravibhūtivibhūṣitaliṅgam | śubhrahṛdambujaśobhitaliṅgaṃ citta sadā bhaja cinmayaliṅgam || 7|| kundavanāntaramandiraliṅgaṃ mandahasānanasundaraliṅgam | vanditabhaktajanāvṛtaliṅgaṃ citta sadā bhaja cinmayaliṅgam || 8|| rudrakṛtāṣṭakamadbhutametadbhadrakaraṃ paṭhatīha manuṣyaḥ | iṣṭaphalaṃ samavāpya yatheṣṭaṃ śiṣṭajanottama eva hi sa syāt || 9|| iti śrīrudrakṛtaṃ cinmayaliṅgāṣṭakaṃ sampūrṇam |
अर्थ:चिन्मय लिङ्ग — शुद्ध चैतन्य के लिङ्ग — की आठ श्लोकों की स्तुति, जो शिव को रूप नहीं अपितु निराकार, सर्वव्यापी चेतना रूप में, जो ब्रह्मांड का सार है, ध्यान करती है।
चिन्मय लिङ्गाष्टकम् पाठ के लाभ
चिन्मय लिङ्गाष्टकम् का पाठ प्रभु की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्रदान करता है माना जाता है।
भक्ति जगाता है, मन को शांत करता है और प्रभु-स्मरण में हृदय को स्थिर करता है।
सोमवार, महाशिवरात्रि, प्रदोष तथा श्रावण मास में सर्वाधिक शुभ।
एक छोटी, मधुर स्तुति जिसे कोई भी सीखकर श्रद्धा सहित प्रतिदिन पढ़ सकता है।
चिन्मय लिङ्गाष्टकम् जप विधि
स्नान करके देव की प्रतिमा के सम्मुख पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दीप जलाएँ और चिन्मय लिङ्गाष्टकम् का धीरे-धीरे, भक्तिभाव से पाठ करें। इसे प्रतिदिन, विशेषकर महाशिवरात्रि, प्रदोष और श्रावण मास में पढ़ा जा सकता है। अंत में कृपा व रक्षा हेतु प्रार्थना करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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