दशश्लोकी (निर्वाण दशकम्)
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✦ अर्थ
दशश्लोकी (निर्वाण दशकम्) आदि शंकराचार्य के परम अद्वैत सत्य के दस श्लोक हैं — 'मैं न भूमि हूँ, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश… मैं केवल शिव हूँ, एकमात्र कल्याणमय सत्य।' यह आत्मा को शुद्ध चैतन्य और आनंद रूप में प्रकट करता है। श्रद्धा से इसका पाठ देवता की कृपा, शान्ति और रक्षा प्रदान करता है।
उत्पत्ति और कथा
Ascribed to Adi Shankaracharya · Adi Shankaracharya · Classical
दशश्लोकी (निर्वाण दशकम्) परम्परागत रूप से आदि शंकराचार्य को आरोपित है। ये आदि शंकराचार्य के परम अद्वैत सत्य के दस श्लोक हैं — 'मैं न भूमि हूँ, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश… मैं केवल शिव हूँ, एकमात्र कल्याणमय सत्य, शुद्ध चैतन्य व आनंद।'
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि सच्चे और भक्तिपूर्ण हृदय से दशश्लोकी (निर्वाण दशकम्) का पाठ करना दिव्य की कृपा के निकट जाना है, जो प्रेम से उसे पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागती।
मंत्र
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ॐ तत् सत्। भुजङ्गप्रयात । ॥ अथ दशश्लोकी ॥ न भूमिर्न तोयं न तेजो न वायुः न खं नेन्द्रियं वा न तेषां समूहः । अनेकान्तिकत्वात् सुषुप्त्येकसिद्धः (अनैकान्तिकत्वात्) तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ १॥ न माता पिता वा न देवा न लोका न वेदा न यज्ञा न तीर्थं ब्रुवन्ति । सुषुप्तौ निरस्तातिशून्यात्मकत्वात् तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ३॥ न चोर्ध्वं न चाधो न चान्तर्न बाह्यं न मध्यं न तिर्यङ् न पूर्वाऽपरा दिक् । वियद्व्यापकत्वादखण्डैकरूपः तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ५॥ न शास्ता न शास्त्रं न शिष्यो न शिक्षा न च त्वं न चाहं न चायं प्रपञ्चः । स्वरूपावबोधो विकल्पासहिष्णुः तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ७॥ अपि व्यापकत्वात् हितत्त्वप्रयोगात् (व्यापकत्वाद्धितत्त्व) स्वतः सिद्धभावादनन्याश्रयत्वात् । जगत् तुच्छमेतत् समस्तं तदन्यत् तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ९॥ ॥ इति श्रीमद् शंकराचार्यविरचितं दशश्लोकी अथवा निर्वाणदशकस्तोत्रं समाप्तं ॥
oṃ tat sat| bhujaṅgaprayāta | || atha daśaślokī || na bhūmirna toyaṃ na tejo na vāyuḥ na khaṃ nendriyaṃ vā na teṣāṃ samūhaḥ | anekāntikatvāt suṣuptyekasiddhaḥ (anaikāntikatvāt) tadeko'vaśiṣṭaḥ śivaḥ kevalo'ham || 1|| na mātā pitā vā na devā na lokā na vedā na yajñā na tīrthaṃ bruvanti | suṣuptau nirastātiśūnyātmakatvāt tadeko'vaśiṣṭaḥ śivaḥ kevalo'ham || 3|| na cordhvaṃ na cādho na cāntarna bāhyaṃ na madhyaṃ na tiryaṅ na pūrvā'parā dik | viyadvyāpakatvādakhaṇḍaikarūpaḥ tadeko'vaśiṣṭaḥ śivaḥ kevalo'ham || 5|| na śāstā na śāstraṃ na śiṣyo na śikṣā na ca tvaṃ na cāhaṃ na cāyaṃ prapañcaḥ | svarūpāvabodho vikalpāsahiṣṇuḥ tadeko'vaśiṣṭaḥ śivaḥ kevalo'ham || 7|| api vyāpakatvāt hitattvaprayogāt (vyāpakatvāddhitattva) svataḥ siddhabhāvādananyāśrayatvāt | jagat tucchametat samastaṃ tadanyat tadeko'vaśiṣṭaḥ śivaḥ kevalo'ham || 9|| || iti śrīmad śaṃkarācāryaviracitaṃ daśaślokī athavā nirvāṇadaśakastotraṃ samāptaṃ ||
अर्थ:आदि शंकराचार्य के परम अद्वैत सत्य के दस श्लोक — "मैं न भूमि हूँ, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश… मैं केवल शिव हूँ, एकमात्र कल्याणमय सत्य, शुद्ध चैतन्य व आनंद।"
दशश्लोकी (निर्वाण दशकम्) पाठ के लाभ
दशश्लोकी (निर्वाण दशकम्) का पाठ देवता की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्रदान करने वाला माना जाता है।
भक्ति को बढ़ाता है, मन को शान्त करता है और हृदय को भगवान के स्मरण में स्थिर करता है।
सोमवार को, तथा महाशिवरात्रि और श्रावण में सर्वाधिक शुभ।
एक मूल्यवान संस्कृत स्तोत्र, श्रद्धा से प्रतिदिन पाठ के लिए उपयुक्त।
दशश्लोकी (निर्वाण दशकम्) जप विधि
स्नान करके पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके देवता की प्रतिमा के सम्मुख बैठें। दीप जलाएँ और दशश्लोकी (निर्वाण दशकम्) का धीरे-धीरे, श्रद्धापूर्वक पाठ करें। इसे प्रतिदिन, अथवा विशेषतः सोमवार को तथा महाशिवरात्रि और श्रावण में पढ़ा जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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