एवं भगवती देवी सा नित्यापि
अन्य नाम / खोज: evam bhagavati devi sa nityapi · bhavakale nrinam saiva lakshmir vriddhiprada · vyaptam tayaitat sakalam brahmandam · durga saptashati chapter 12 closing verses · devi mahatmya eternal goddess
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✦ अर्थ
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के बारहवें अध्याय के ये समापन श्लोक जगन्माता के नित्य स्वरूप को प्रकट करते हैं। नित्या होने पर भी वे जगत् की रक्षा के लिए बार-बार प्रकट होती हैं; वे विश्व को मोहित भी करती हैं और प्रकट भी करती हैं, प्रार्थना करने वालों को ज्ञान और प्रसन्न होने पर समृद्धि देती हैं। वे महाकाली रूप में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं, समय पर सृष्टि, स्थिति और संहार हैं, और समृद्धि में लक्ष्मी एवं विनाश में अलक्ष्मी रूप में प्रकट होती हैं। पुष्प-धूप से पूजित होने पर वे धन, संतान, धर्म में बुद्धि और शुभ गति प्रदान करती हैं।
उत्पत्ति और कथा
Durga Saptashati Chapter 12 · Maharshi Markandeya (traditionally ascribed) · Puranic period (c. 5th–6th century CE for the Devi Mahatmya)
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती या चण्डी), मार्कण्डेय पुराण का अंश, जगन्माता की दैत्यों पर विजयों का और बारहवें अध्याय में उनकी उपासना की फलश्रुति का वर्णन करता है। चण्डिका के देवों की दृष्टि से अन्तर्धान होने के पश्चात्, ऋषि मेधा राजा सुरथ को उनके नित्य स्वरूप का बोध कराते हुए इस अध्याय का समापन करते हैं। नित्या होने पर भी वे जगत् की रक्षा के लिए बार-बार प्रकट होती हैं; वे ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाकाली, समय पर सृष्टि, स्थिति और संहार, समृद्धि में लक्ष्मी और विनाश में अलक्ष्मी हैं — और भक्ति से पूजित होने पर धन, संतान, धर्ममयी बुद्धि और शुभ गति की दात्री हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि ये श्लोक देवी को धन, संतान, बुद्धि और शुभ गति की दात्री के रूप में नामित करते हैं, इसलिए नवरात्रि में इनका श्रद्धापूर्ण पाठ समस्त परिवार में समृद्धि और कल्याण लाता है। भक्त माता की इस वर्णित रूप में श्रद्धापूर्ण उपासना द्वारा संतान, समृद्धि और धर्ममयी बुद्धि की प्रार्थनाएँ पूर्ण होने का वर्णन करते हैं।
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एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः । सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम् ॥
evaṃ bhagavatī devī sā nityāpi punaḥ punaḥ sambhūya kurute bhūpa jagataḥ paripālanam
अर्थ:इस प्रकार वह भगवती देवी नित्या होने पर भी बार-बार प्रकट होकर जगत् का पालन करती हैं, हे राजन्।
तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते । सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति ॥
tayaitanmohyate viśvaṃ saiva viśvaṃ prasūyate sā yācitā ca vijñānaṃ tuṣṭā ṛddhiṃ prayacchati
अर्थ:उन्हीं से यह विश्व मोहित होता है; वही विश्व को प्रकट करती हैं। प्रार्थना करने पर वे विज्ञान देती हैं, और प्रसन्न होने पर समृद्धि प्रदान करती हैं।
व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर । महादेव्या महाकाली महामारीस्वरूपया ॥
vyāptaṃ tayaitatsakalaṃ brahmāṇḍaṃ manujeśvara mahādevyā mahākālī mahāmārīsvarūpayā
अर्थ:हे मनुजेश्वर! महाकाली और महामारी-स्वरूपा उन महादेवी से ही यह समस्त ब्रह्माण्ड व्याप्त है।
सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा । स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी ॥
saiva kāle mahāmārī saiva sṛṣṭirbhavatyajā sthitiṃ karoti bhūtānāṃ saiva kāle sanātanī
अर्थ:वही समय आने पर महामारी हैं, वही अजन्मा सृष्टि हैं; और वही सनातनी समय पर प्राणियों की स्थिति (पालन) करती हैं।
भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे । सैवाभावे तथालक्ष्मीर्विनाशायोपजायते ॥
bhavakāle nṛṇāṃ saiva lakṣmīrvṛddhipradā gṛhe saivābhāve tathālakṣmīrvināśāyopajāyate
अर्थ:अभ्युदय के समय वे मनुष्यों के घर में वृद्धि देने वाली लक्ष्मी हैं; और अभाव (दुर्भाग्य) के समय वे ही अलक्ष्मी होकर विनाश के लिए प्रकट होती हैं।
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्गन्धधूपादिभिस्तथा । ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥
stutā sampūjitā puṣpairgandhadhūpādibhistathā dadāti vittaṃ putrāṃśca matiṃ dharme gatiṃ śubhām
अर्थ:पुष्प, गन्ध, धूप आदि से स्तुति और पूजन किए जाने पर वे धन और पुत्र, धर्म में बुद्धि तथा शुभ गति प्रदान करती हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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एवं भगवती देवी सा नित्यापि पाठ के लाभ
देवी को सृष्टि, स्थिति और संहार के पीछे की नित्य शक्ति के रूप में प्रकट करता है
माता से ज्ञान (विज्ञान) और समृद्धि (ऋद्धि) दोनों की प्रार्थना के लिए पढ़ा जाता है
उनके उपासकों को धन, संतान, धर्म में बुद्धि और शुभ गति का वचन देता है
देवी को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाकाली के रूप में पुष्ट करता है
दुर्गा सप्तशती की फलश्रुति के समापन के रूप में पढ़ा जाता है
जगत् की रक्षा के लिए बार-बार अवतरित होने वाली माता में श्रद्धा बढ़ाता है
एवं भगवती देवी सा नित्यापि जप विधि
इन श्लोकों का भक्ति-सहित पाठ करें, विशेषकर दुर्गा सप्तशती (चण्डी पाठ) के पाठ का समापन करते समय, देवी के नित्य, सर्वव्यापी स्वरूप पर चिन्तन करते हुए। श्लोकों के अनुसार उन्हें पुष्प, चन्दन और धूप से पूजें, और धन, परिवार के कल्याण, धर्ममयी बुद्धि और शुभ गति की प्रार्थना अर्पित करें। उनकी छवि के समक्ष शान्त, समर्पित हृदय से बैठें और जगत् की रक्षा के लिए बार-बार प्रकट होने वाली माता को भीतर से प्रणाम करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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