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गणेश पञ्चचामर स्तोत्रम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः या सायंकाल; विशेषकर बुधवार और चतुर्थी·📜 Traditional

अन्य नाम / खोज: lalata pattalunthitamalendu rocirudbhate · ganesha panchachamara stotram lyrics · ganesha panchachamara stotra

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अर्थ

गणेश पञ्चचामर स्तोत्रम् मधुर पञ्चचामर छंद में रचित भगवान गणेश की एक स्तुति है। यह विघ्नहर्ता, गजानन तथा शिव-पार्वती-पुत्र की वंदना करती है। श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ से भगवान की कृपा, शांति और भक्ति प्राप्त होती है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional · Traditional · Classical

गणेश पञ्चचामर स्तोत्रम् एक प्रिय परम्परागत स्तोत्र है। मधुर पञ्चचामर छंद में रचित भगवान गणेश की स्तुति — जो विघ्नहर्ता, गजानन, आरंभ के अधिपति, शिव-पार्वती-पुत्र को वंदन करती है।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि गणेश पञ्चचामर स्तोत्रम् का सच्चे व श्रद्धालु हृदय से पाठ करना भगवान की कृपा के निकट पहुँचना है, जो प्रेमपूर्वक पुकारने वालों का कभी त्याग नहीं करते।

मंत्र

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श्रीगणेशाय नमः ललाट-पट्टलुण्ठितामलेन्दु-रोचिरुद्भटे वृताति-वर्चरस्वरोत्सररत्किरीट-तेजसि फटाफटत्फटत्स्फुरत्फणाभयेन भोगिनां शिवाङ्कतः शिवाङ्कमाश्रयच्छिशौ रतिर्मम १॥ अदभ्र-विभ्रम-भ्रमद्-भुजाभुजङ्गफूत्कृती- र्निजाङ्कमानिनीषतो निशम्य नन्दिनः पितुः त्रसत्सुसङ्कुचन्तमम्बिका-कुचान्तरं यथा विशन्तमद्य बालचन्द्रभालबालकं भजे २॥ विनादिनन्दिने सविभ्रमं पराभ्रमन्मुख- स्वमातृवेणिमागतां स्तनं निरीक्ष्य सम्भ्रमात् भुजङ्ग-शङ्कया परेत्यपित्र्यमङ्कमागतं ततोऽपि शेषफूत्कृतैः कृतातिचीत्कृतं नमः ३॥ विजृम्भमाणनन्दि-घोरघोण-घुर्घुरध्वनि- प्रहास-भासिताशमम्बिका-समृद्धि-वर्धिनम् उदित्वर-प्रसृत्वर-क्षरत्तर-प्रभाभर- प्रभातभानु-भास्वरं भवस्वसम्भवं भजे ४॥ अलङ्गृहीत-चामरामरी जनातिवीजन- प्रवातलोलि-तालकं नवेन्दुभालबालकम् विलोलदुल्ललल्ललाम-शुण्डदण्ड-मण्डितं सतुण्ड-मुण्डमालि-वक्रतुण्डमीड्यमाश्रये ५॥ प्रफुल्ल-मौलिमाल्य-मल्लिकामरन्द-लेलिहा मिलन् निलिन्द-मण्डलीच्छलेन यं स्तवीत्यमम् त्रयीसमस्तवर्णमालिका शरीरिणीव तं सुतं महेशितुर्मतङ्गजाननं भजाम्यहम् ६॥ प्रचण्ड-विघ्न-खण्डनैः प्रबोधने सदोद्धुरः समर्द्धि-सिद्धिसाधनाविधा-विधानबन्धुरः सबन्धुरस्तु मे विभूतये विभूतिपाण्डुरः पुरस्सरः सुरावलेर्मुखानुकारिसिन्धुरः ७॥ अराल-शैलबालिका-ऽलकान्तकान्त-चन्द्रमो- जकान्तिसौध-माधयन् मनोऽनुराधयन् गुरोः सुसाध्य-साधवं धियां धनानि साधयन्नय- नशेषलेखनायको विनायको मुदेऽस्तु नः ८॥ रसाङ्गयुङ्ग-नवेन्दु-वत्सरे शुभे गणेशितु- स्तिथौ गणेशपञ्चचामरं व्यधादुमापतिः पतिः कविव्रजस्य यः पठेत् प्रतिप्रभातकं पूर्णकामनो भवेदिभानन-प्रसादभाक् ९॥ छात्रत्वे वसता काश्यां विहितेयं यतः स्तुतिः ततश्छात्रैरधीतेयं वैदुष्यं वर्द्धयेद्धिया १०॥ इति श्रीकविपत्युपनामक-उमापतिशर्मद्विवेदि-विरचितं गणेशपञ्चचामरस्तोत्रं सम्पूर्णम्

śrīgaṇeśāya namaḥ | lalāṭa-paṭṭaluṇṭhitāmalendu-rocirudbhaṭe vṛtāti-varcarasvarotsararatkirīṭa-tejasi | phaṭāphaṭatphaṭatsphuratphaṇābhayena bhogināṃ śivāṅkataḥ śivāṅkamāśrayacchiśau ratirmama || 1|| adabhra-vibhrama-bhramad-bhujābhujaṅgaphūtkṛtī- rnijāṅkamāninīṣato niśamya nandinaḥ pituḥ | trasatsusaṅkucantamambikā-kucāntaraṃ yathā viśantamadya bālacandrabhālabālakaṃ bhaje || 2|| vinādinandine savibhramaṃ parābhramanmukha- svamātṛveṇimāgatāṃ stanaṃ nirīkṣya sambhramāt | bhujaṅga-śaṅkayā paretyapitryamaṅkamāgataṃ tato'pi śeṣaphūtkṛtaiḥ kṛtāticītkṛtaṃ namaḥ || 3|| vijṛmbhamāṇanandi-ghoraghoṇa-ghurghuradhvani- prahāsa-bhāsitāśamambikā-samṛddhi-vardhinam | uditvara-prasṛtvara-kṣarattara-prabhābhara- prabhātabhānu-bhāsvaraṃ bhavasvasambhavaṃ bhaje || 4|| alaṅgṛhīta-cāmarāmarī janātivījana- pravātaloli-tālakaṃ navendubhālabālakam | viloladullalallalāma-śuṇḍadaṇḍa-maṇḍitaṃ satuṇḍa-muṇḍamāli-vakratuṇḍamīḍyamāśraye || 5|| praphulla-maulimālya-mallikāmaranda-lelihā milan nilinda-maṇḍalīcchalena yaṃ stavītyamam | trayīsamastavarṇamālikā śarīriṇīva taṃ sutaṃ maheśiturmataṅgajānanaṃ bhajāmyaham || 6|| pracaṇḍa-vighna-khaṇḍanaiḥ prabodhane sadoddhuraḥ samarddhi-siddhisādhanāvidhā-vidhānabandhuraḥ | sabandhurastu me vibhūtaye vibhūtipāṇḍuraḥ purassaraḥ surāvalermukhānukārisindhuraḥ || 7|| arāla-śailabālikā-'lakāntakānta-candramo- jakāntisaudha-mādhayan mano'nurādhayan guroḥ | susādhya-sādhavaṃ dhiyāṃ dhanāni sādhayannaya- naśeṣalekhanāyako vināyako mude'stu naḥ || 8|| rasāṅgayuṅga-navendu-vatsare śubhe gaṇeśitu- stithau gaṇeśapañcacāmaraṃ vyadhādumāpatiḥ | patiḥ kavivrajasya yaḥ paṭhet pratiprabhātakaṃ sa pūrṇakāmano bhavedibhānana-prasādabhāk || 9|| chātratve vasatā kāśyāṃ vihiteyaṃ yataḥ stutiḥ | tataśchātrairadhīteyaṃ vaiduṣyaṃ varddhayeddhiyā || 10|| || iti śrīkavipatyupanāmaka-umāpatiśarmadvivedi-viracitaṃ gaṇeśapañcacāmarastotraṃ sampūrṇam ||

अर्थ:मधुर पञ्चचामर छंद में रचित भगवान गणेश की स्तुति — जो विघ्नहर्ता, गजानन, आरंभ के अधिपति, शिव-पार्वती-पुत्र को वंदन करती है।

गणेश पञ्चचामर स्तोत्रम् पाठ के लाभ

गणेश पञ्चचामर स्तोत्रम् का पाठ भगवान की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्रदान करता है, ऐसा माना जाता है।

भक्ति को बढ़ाता है, मन को शांत करता है और भगवान के स्मरण में हृदय को स्थिर करता है।

बुधवार और चतुर्थी को तथा गणेश चतुर्थी और संकष्टी के समय सर्वाधिक शुभ।

एक छोटा, मधुर स्तोत्र जिसे कोई भी सीखकर श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ कर सकता है।

गणेश पञ्चचामर स्तोत्रम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः या सायंकाल; विशेषकर बुधवार और चतुर्थी
दिशाEast

स्नान कर देवता की प्रतिमा के समक्ष पूर्व की ओर मुख करके बैठें। दीप जलाकर गणेश पञ्चचामर स्तोत्रम् का धीरे-धीरे और श्रद्धापूर्वक पाठ करें। इसका पाठ नित्य किया जा सकता है, अथवा विशेषकर गणेश चतुर्थी और संकष्टी के समय। कृपा और रक्षा की प्रार्थना के साथ समापन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मधुर पञ्चचामर छंद में रचित भगवान गणेश की स्तुति — जो विघ्नहर्ता, गजानन, आरंभ के अधिपति, शिव-पार्वती-पुत्र को वंदन करती है।
यह एक परम्परागत स्तोत्र है। इसका पाठ प्रातः या सायंकाल श्रद्धापूर्वक किया जाता है, और विशेषकर बुधवार और चतुर्थी को तथा गणेश चतुर्थी और संकष्टी के समय।

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