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कल्याण मन्दिर स्तोत्र

🕉️ jain·📿 1× जप·🕐 प्रातःकाल स्नान के पश्चात्, पूर्व की ओर मुख कर, पार्श्वनाथ की प्रतिमा के समक्ष या जैन मन्दिर में·📜 Kalyana Mandira Stotra (Jain devotional literature)

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अर्थ

कल्याण मन्दिर स्तोत्र तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की स्तुति में रचित प्रसिद्ध जैन स्तोत्र है, जिसके रचयिता आचार्य सिद्धसेन दिवाकर (कुमुदचन्द्र) माने जाते हैं। भक्तामर स्तोत्र के समान इसके चौवालीस श्लोक भगवान के अतुलनीय गुणों और कमठ के दुर्भाव पर उनकी विजय का वर्णन करते हैं। इस स्तोत्र का पाठ भक्ति और रक्षा-कल्याण की दृष्टि से अत्यन्त पूज्य माना जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Kalyana Mandira Stotra (Jain devotional literature) · Acharya Siddhasena Divakara (Kumudachandra) · c. 5th–7th century CE

कल्याण मन्दिर स्तोत्र की रचना आचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने पार्श्वनाथ की आराधना में की। परम्परा कहती है कि सिद्धसेन ने जिन की सर्वोच्चता दर्शाने हेतु यह स्तोत्र एक शिवलिंग के समक्ष पढ़ा; ज्यों-ज्यों श्लोक प्रकट होते गए, कहा जाता है कि वह मन्दिर खुल गया और उसमें पार्श्वनाथ की प्रतिमा प्रकट हुई, जो स्तोत्र की शक्ति का प्रमाण है। भक्तामर के देवोचित समकक्ष रूप में रचित, यह श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराओं में प्रिय है।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा मानती है कि आचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने कल्याण मन्दिर स्तोत्र एक शिवलिंग के समक्ष पढ़ा, और उनकी भक्ति की शक्ति से वह मन्दिर फट गया और उसमें पार्श्वनाथ की स्वयं प्रकट प्रतिमा दिखाई दी, जो तीर्थंकर की महिमा की घोषणा करती है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

कल्याण-मन्दिर-मुदार-मवद्य-भेदि भीताभय-प्रद-मनिन्दित-मङ्घ्रि-पद्मम्। संसार-सागर-निमज्जद-शेष-जन्तु- पोतायमान-मभिनम्य जिनेश्वरस्य॥

Kalyāṇa-mandira-mudāra-mavadya-bhedi bhītābhaya-prada-maninditamaṅghri-padmam। Saṁsāra-sāgara-nimajjada-śeṣa-jantu- potāyamānamabhinamya jineśvarasya॥

अर्थ:जो जिनेश्वर के चरण-कमल कल्याण के मन्दिर हैं, उदार हैं, समस्त पापों का भेदन करते हैं, भयभीतों को अभय देते हैं, अनिन्दित हैं, और संसार-सागर में डूबते समस्त प्राणियों के लिए नौका के समान हैं — उन चरणों को प्रणाम करके:

श्लोक 2

यस्य स्वयं सुर-गुरुर्गरिमाम्बु-राशेः स्तोत्रं सुविस्तृत-मतिर्न विभुर्विधातुम्। तीर्थेश्वरस्य कमठ-स्मय-धूम-केतो- स्तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये॥

Yasya svayaṁ sura-gururgarimāmbu-rāśeḥ stotraṁ suvistṛta-matirna vibhurvidhātum। Tīrtheśvarasya kamaṭha-smaya-dhūma-keto- stasyāhameṣa kila saṁstavanaṁ kariṣye॥

अर्थ:जो महिमा के सागर हैं, जिनकी स्तुति विस्तृत बुद्धि वाले देवगुरु बृहस्पति भी करने में समर्थ नहीं हैं, जो कमठ के अहंकार के लिए धूमकेतु के समान हैं — उन तीर्थेश्वर की स्तुति मैं करूँगा।

श्लोक 3

सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप- मस्मादृशः कथमधीश! भवन्त्यधीशाः। धृष्टोऽपि कौशिक-शिशुर्यदि वा दिवान्धो रूपं प्ररूपयति किं किल धर्म-रश्मेः॥

Sāmānyato'pi tava varṇayituṁ svarūpa- masmādṛśaḥ kathamadhīśa! bhavantyadhīśāḥ। Dhṛṣṭo'pi kauśika-śiśuryadi vā divāndho rūpaṁ prarūpayati kiṁ kila dharma-raśmeḥ॥

अर्थ:हे अधीश! जब बड़े-बड़े अधीश भी असमर्थ हैं, तब मुझ जैसे आपके स्वरूप का सामान्य रूप से भी वर्णन कैसे कर सकते हैं? क्या दिन में अंधा धृष्ट उल्लू-शिशु सूर्य के रूप का वर्णन कर सकता है?

श्लोक 4

मोहक्षयादनुभवन्नपि नाथ! मर्त्यो नूनं गुणान् गणयितुं तव क्षमेत। कल्पान्त-वान्त-पयसः प्रकटोऽपि यस्मा- न्मीयेत केन जलधेर्ननु रत्न-राशिः॥

Mohakṣayādanubhavannapi nātha! martyo nūnaṁ guṇān gaṇayituṁ na tava kṣameta। Kalpānta-vānta-payasaḥ prakaṭo'pi yasmā- nmīyeta kena jaladhernanu ratna-rāśiḥ॥

अर्थ:हे नाथ! मोह के क्षय से आपका अनुभव करते हुए भी मनुष्य निश्चय ही आपके गुणों को गिनने में समर्थ नहीं है। प्रलयकाल के जल से प्रकट होने पर भी समुद्र की रत्न-राशि को कौन गिन सकता है?

श्लोक 5

ह्रीं श्रीं पार्श्वनाथाय नमः॥

Oṁ hrīṁ śrīṁ pārśvanāthāya namaḥ॥

अर्थ:ॐ ह्रीं श्रीं पार्श्वनाथ को नमस्कार है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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कल्याण-मन्दिरम्🔊kalyāṇa-mandiramसमस्त कल्याण और मंगल का आश्रय (मन्दिर)
उदारम्🔊udāramउदार, महान, उदात्त
अवद्य-भेदि🔊avadya-bhediजो समस्त पाप और निन्दा को छिन्न करते हैं
भीत-अभय-प्रदम्🔊bhīta-abhaya-pradamभयभीतों को अभय प्रदान करने वाले
अनिन्दितम् अङ्घ्रि-पद्मम्🔊aninditam aṅghri-padmamनिर्दोष, अनिन्दित चरण-कमल
संसार-सागर-निमज्जत्🔊saṁsāra-sāgara-nimajjatसंसार-सागर में डूबते हुए
अशेष-जन्तु🔊aśeṣa-jantuसमस्त प्राणी, बिना किसी अपवाद के
पोतायमानम्🔊potāyamānamनौका के समान (उद्धार करने वाले)
अभिनम्य जिनेश्वरस्य🔊abhinamya jineśvarasyaजिनेश्वर के (चरणों) को प्रणाम करके
सुर-गुरुः🔊sura-guruḥबृहस्पति, देवताओं के गुरु
गरिम-अम्बु-राशेः🔊garima-ambu-rāśeḥमहिमा के सागर रूप (भगवान) के
न विभुः विधातुम्🔊na vibhuḥ vidhātum(उनकी स्तुति) रचने में समर्थ नहीं हैं
तीर्थेश्वरस्य🔊tīrtheśvarasyaतीर्थेश्वर (तीर्थंकर) के
कमठ-स्मय-धूम-केतोः🔊kamaṭha-smaya-dhūma-ketoḥजो कमठ के अहंकार के लिए धूमकेतु (नाशक) के समान हैं
संस्तवनं करिष्ये🔊saṁstavanaṁ kariṣyeमैं स्तुति / गुणगान करने का प्रयत्न करूँगा
कौशिक-शिशुः🔊kauśika-śiśuḥउल्लू-शिशु (दिन में अंधा छोटा उल्लू)
दिवान्धः🔊divāndhaḥदिन में अंधा
धर्म-रश्मेः🔊dharma-raśmeḥसूर्य (किरणों) के; यहाँ धर्म से देदीप्यमान भगवान
मोह-क्षयात्🔊moha-kṣayātमोह के क्षय से
गुणान् गणयितुं न क्षमेत🔊guṇān gaṇayituṁ na kṣametaआपके गुणों को गिनने में समर्थ नहीं है
पार्श्वनाथाय नमः🔊pārśvanāthāya namaḥपार्श्वनाथ को नमस्कार

कल्याण मन्दिर स्तोत्र पाठ के लाभ

तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की कृपा और रक्षा का आवाहन करता है

पाठ से कल्याण (मंगल) की प्राप्ति और पापों का नाश माना जाता है

व्याकुल या भयभीत मन को निर्भयता और स्थिरता प्रदान करता है

जिन के प्रति विनम्रता और गहन भक्ति का विकास करता है

परम्परागत रूप से बाधाओं, संकटों और कष्टों को दूर करने वाला कहा गया है

एक काव्यमय ध्यान जो किसी प्रबुद्ध आत्मा के गुणों के चिन्तन को गहन बनाता है

कल्याण मन्दिर स्तोत्र जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातःकाल स्नान के पश्चात्, पूर्व की ओर मुख कर, पार्श्वनाथ की प्रतिमा के समक्ष या जैन मन्दिर में

पवित्र, स्थिर मन और हार्दिक भक्ति से, आदर्श रूप से पार्श्वनाथ की प्रतिमा के समक्ष पाठ करें। सम्पूर्ण स्तोत्र में वसन्ततिलका छन्द में 44 श्लोक हैं; भक्त सम्पूर्ण पाठ कर सकते हैं या यहाँ दिए आरम्भिक श्लोकों से प्रारम्भ कर सकते हैं। प्रत्येक शब्द को स्पष्ट और अविलम्ब उच्चारित करें, और पार्श्वनाथ को बीज-मन्त्र नमस्कार के साथ समापन करें। स्वच्छता, अहिंसा और आन्तरिक शान्ति का पालन पाठ को सबल बनाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसकी रचना परम्परागत रूप से आचार्य सिद्धसेन दिवाकर को मानी जाती है, जो एक प्रसिद्ध जैन विद्वान-मुनि (जिन्हें कुमुदचन्द्र नाम से भी स्मरण किया जाता है) थे, जिन्होंने इसे पार्श्वनाथ की स्तुति में रचा।
यह पार्श्वनाथ (पार्श्व) को समर्पित है, जो जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में तेईसवें हैं, जिन्हें प्रायः सर्प धरणेन्द्र के फण से छाया हुआ चित्रित किया जाता है।
यह स्तोत्र 'कल्याण मन्दिर' शब्दों से आरम्भ होता है, जिसका अर्थ है 'कल्याण और मंगल का मन्दिर (आश्रय)', जो भगवान के चरणों का वर्णन करता है। परम्परा के अनुसार स्तोत्र अपने आरम्भिक शब्दों से ही नाम पाता है।
कमठ पार्श्वनाथ की जीवन-कथा का प्रतिपक्षी है — अनेक जन्मों तक का शत्रु, जिसके अहंकार और दुर्भाव को भगवान ने समता से जीता। स्तोत्र तीर्थंकर को कमठ के अहंकार के लिए 'धूमकेतु' कहता है।

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