पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
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✦ अर्थ
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो मीराबाई का सर्वाधिक प्रिय भजन है — दिव्य नाम रूपी अविनाशी धन को पाने का गीत। इसमें कहा गया है कि राम-नाम एक ऐसा खजाना है जिसे न कोई चोर चुरा सकता है और न ही वह कभी समाप्त होता है, बल्कि दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है। यह हृदय को शांति देता है और मन को भौतिक प्रयास से आंतरिक समृद्धि की ओर मोड़ता है।
उत्पत्ति और कथा
Composed by Meera Bai (16th-century bhakti tradition) · Meera Bai · 16th century
मीराबाई, वह राजपूत राजकुमारी जिन्होंने कृष्ण की भक्ति के लिए राजमहल का जीवन त्याग दिया, ने अपनी भक्ति सैकड़ों पदों में उँडेल दी। इस पद में वह घोषणा करती हैं कि उन्होंने सच्चा, अविनाशी धन — दिव्य नाम — पा लिया है, जो उनके गुरु की कृपा से प्रदान हुआ। एक ऐसे खजाने का चित्र, जो न खर्च हो सकता है, न चुराया जा सकता है, और केवल बढ़ता ही है, ने इसे भारत के सर्वाधिक प्रिय भजनों में से एक बना दिया है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
मीरा का जीवन स्वयं इस गीत का प्रमाण है — उन्होंने एक राज्य त्याग दिया और भगवान के नाम को ही अपना एकमात्र धन माना। भक्त कहते हैं कि 'पायो जी' गाने से हृदय लाभ-हानि की चिंता से उस शांत समृद्धि की ओर मुड़ जाता है, जो उसकी है जो पहले से ही एकमात्र चिरस्थायी खजाने का स्वामी है।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
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पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥
Payo ji maine Ram ratan dhan payo Vastu amolik di mere satguru, kirpa kar apnayo
अर्थ:अहा, मैंने राम-नाम रूपी अमूल्य धन पा लिया! मेरे सद्गुरु ने यह अनमोल वस्तु दी और कृपा करके मुझे अपना लिया।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो। खरचै नहिं कोई चोर न लूटै, दिन दिन बढ़त सवायो॥
Janam janam ki punji payi, jag mein sabhi khovayo Kharchai nahin koi chor na lutai, din din badhat savayo
अर्थ:मैंने जन्म-जन्म की पूँजी पाई, जबकि जगत में सब कुछ खो दिया। यह धन न खर्च होता है, न कोई चोर इसे लूट सकता है — दिन-प्रतिदिन यह सवाया बढ़ता है।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख हरख जस गायो॥
Sat ki naav khevatiya satguru, bhavsagar tar aayo Meera ke prabhu Girdhar Nagar, harakh harakh jas gayo
अर्थ:सत्य की नाव के खेवैया सद्गुरु हैं, जिनके द्वारा मैं भवसागर तर गई। मीरा के प्रभु गिरधर नागर हैं; हर्ष-हर्ष से वह उनका यश गाती है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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पायो जी मैंने राम रतन धन पायो पाठ के लाभ
मीराबाई का सर्वाधिक प्रिय भजन — दिव्य नाम के अविनाशी धन को पाने का गीत।
सिखाता है कि भगवान का नाम एक ऐसा खजाना है जिसे कोई चोर नहीं चुरा सकता और जो 'खर्च' करने पर ही बढ़ता है।
सत्संग और भक्ति-संगीत का एक प्रमुख अंग, जिसे असंख्य महान गायकों ने गाया है।
हृदय को शांति देता है और मन को भौतिक प्रयास से आंतरिक समृद्धि की ओर मोड़ता है।
सरल, पुनरावृत्त और उत्थानकारी — किसी भी समूह के लिए गाने में सहज।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो जप विधि
भाव से धीरे-धीरे गाएं, इस विचार पर मन को टिकाते हुए कि दिव्य नाम वह धन है जो कभी खो नहीं सकता। इसके लिए किसी अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं — अनेक लोग इसे मन को कृतज्ञता और भक्ति में स्थिर करने के लिए गाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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