अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं (ललिता ध्यान)
अन्य नाम / खोज: aruna karuna tarangitakshim · arunam karuna tarangitakshim · ahamityeva vibhavaye bhavanim · lalita aham dhyana
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✦ अर्थ
यह ललिता सहस्रनाम से पूर्व पढ़े जाने वाले ध्यान-श्लोकों में प्रसिद्ध 'अहम्' ध्यान-श्लोक है। इसमें भवानी को अरुण वर्ण की, करुणा-पूर्ण नेत्रों वाली, पाश-अंकुश-पुष्पबाण-धनुष धारिणी तथा सिद्धियों की किरणों से आवृत बताया गया है। इसके अन्तिम शब्द — 'मैं उन्हें अपने ही रूप में ध्यान करता हूँ' — सर्वोच्च अद्वैत भावना को व्यक्त करते हैं, जिसमें उपासक अपने आत्मा को दिव्य माता से अभिन्न मानता है।
उत्पत्ति और कथा
Dhyana verse of the Lalita Sahasranama, Brahmanda Purana (Lalitopakhyana) · Traditional (Lalitopakhyana of the Brahmanda Purana) · Ancient (Puranic)
ललिता सहस्रनाम से पूर्व आने वाले ध्यान-श्लोकों में यह 'अहम्' ध्यान विशेष स्थान रखता है। जहाँ अन्य ध्यान देवी के रूप का बाह्य पूजन हेतु वर्णन करते हैं, वहीं यह श्लोक उपासक को अन्तर्मुख ले जाता है, जिसकी परिणति 'मैं ही वह हूँ' की अनुभूति में होती है — जो ब्रह्माण्ड पुराण के ललितोपाख्यान में प्रकट श्रीविद्या मार्ग का सर्वोच्च लक्ष्य है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
श्रीविद्या आचार्य सिखाते हैं कि जो इस श्लोक के अन्तिम चिन्तन — 'मैं ही देवी हूँ' — को पूर्ण विश्वास के साथ क्षणमात्र भी धारण कर सके, वह अहंकार के बन्धन से मुक्त हो जाता है; ऐसे भक्त की ओर भवानी के करुणा-भरे नेत्र तत्काल मुड़ जाते हैं, ऐसा कहा जाता है।
मंत्र
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अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम् । अणिमादिभिरावृतां मयूखैः अहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
Aruṇāṁ karuṇātaraṅgitākṣīṁ Dhṛtapāśāṅkuśapuṣpabāṇacāpām | Aṇimādibhirāvṛtāṁ mayūkhaiḥ Ahamityeva vibhāvaye bhavānīm ||
अर्थ:मैं भवानी का ध्यान करता हूँ — जो अरुण वर्ण की हैं, जिनके नेत्र करुणा की तरंगों से तरंगित हैं, जो पाश, अंकुश, पुष्पबाण और धनुष धारण करती हैं, जो अणिमा आदि सिद्धियों की किरणों से आवृत हैं — और मैं उन्हें अपने ही स्वरूप के रूप में, 'मैं ही वह हूँ' इस भाव से ध्यान करता हूँ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं (ललिता ध्यान) पाठ के लाभ
दिव्य माता के साथ एकत्व की सर्वोच्च अद्वैत भावना ('अहम्') जगाता है
भवानी की करुणा का आवाहन करता है, जो भक्तों की ओर निरन्तर तरंगित होती कही जाती है
ध्यानी को आठ मायावी सिद्धियों के तेज से घेर देता है
ललिता सहस्रनाम के पाठ से पूर्व एकाग्रता को गहन करता है
अहंकार को आत्मा रूपी देवी में समर्पित करना सिखाता है
नित्य चिन्तन से शान्ति, कृपा और आन्तरिक बल प्रदान करता है
अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं (ललिता ध्यान) जप विधि
यह ध्यान सहस्रनाम से पूर्व अन्य ध्यान-श्लोकों के साथ पढ़ा जाता है। शान्त बैठकर भवानी की अरुण एवं करुणामयी छवि का दर्शन करें, जो चार आयुध धारण किए और प्रकाश से प्रभामण्डित हैं। अन्तिम पंक्ति पर पहुँचकर पृथकता के भाव को विलीन कर 'मैं ही वह हूँ' का चिन्तन करें और माता के साथ अभिन्नता के भाव में स्थिर रहें। इसे एक गहन नित्य ध्यान के रूप में अकेले भी प्रयोग किया जा सकता है।