ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्
अन्य नाम / खोज: aum ity etad aksharam idam sarvam · om ity etad aksharam idam sarvam · omkara eva · mandukya upanishad first verse
अपनी भाषा/लिपि में पढ़ें
✦ अर्थ
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् माण्डूक्य उपनिषद् का प्रथम श्लोक है — यह प्रधान उपनिषदों में सबसे संक्षिप्त है और पूर्णतः पवित्र ओंकार को समर्पित है। यह घोषित करता है कि ओम् — वह अविनाशी शब्द — यह सम्पूर्ण जगत् है: जो कुछ भूत, वर्तमान और भविष्य है, और जो कालातीत है, वह सब ओम् ही है। यह मन्त्र ओंकार को ब्रह्म एवं चेतना की चार अवस्थाओं के प्रतीक रूप में विश्लेषित करने वाले उपनिषद् का प्रवेशद्वार है।
उत्पत्ति और कथा
Mandukya Upanishad, Verse 1 · Traditional (Upanishadic) · Vedic / Upanishadic
माण्डूक्य उपनिषद्, यद्यपि प्रधान उपनिषदों में सबसे संक्षिप्त है, फिर भी सर्वोच्च आदर का पात्र है; मुक्तिका उपनिषद् घोषित करता है कि एक उत्सुक साधक की मुक्ति के लिए अकेला माण्डूक्य ही पर्याप्त है। यह इस श्लोक से आरम्भ होता है जो ओम् को समस्त काल में सम्पूर्ण सत्ता घोषित करता है, फिर आत्मा के चार पादों — जाग्रत (वैश्वानर), स्वप्न (तैजस), सुषुप्ति (प्राज्ञ) और परम चतुर्थ (तुरीय) — के माध्यम से इस अक्षर का अर्थ खोलता है। इस प्रकार प्रथम श्लोक वेदान्त के ओम् और चेतना पर सबसे गहन ध्यानों में से एक की भूमिका तैयार करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि माण्डूक्य उपनिषद्, अपने बारह श्लोकों और गौडपाद की कारिकाओं सहित, समस्त वेदान्त का सार समेटे है, और यहाँ सिखाए अनुसार ओम् का ध्यान ज्ञाता को चेतना की तीन अवस्थाओं के पार मौन चतुर्थ (तुरीय) तक ले जाता है — वह शुद्ध, अद्वैत आत्मा जो स्वयं ब्रह्म है।
मंत्र
किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥
om ity etad akṣaram idaṁ sarvaṁ tasyopavyākhyānaṁ bhūtaṁ bhavad bhaviṣyad iti sarvam oṁkāra eva yac cānyat trikālātītaṁ tad apy oṁkāra eva
अर्थ:ओम् — यह अक्षर (अविनाशी) ही यह सब कुछ है। इसकी व्याख्या यह है — जो कुछ भूत, वर्तमान और भविष्य है, वह सब ओंकार ही है। और जो कुछ अन्य है, जो तीनों कालों से परे है, वह भी ओंकार ही है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् पाठ के लाभ
पवित्र अक्षर ओम् को ब्रह्म के प्रतीक और शब्द-रूप के रूप में प्रकट करता है, जो समस्त सत्ता को समेटे है।
ओम् को भूत, वर्तमान, भविष्य और कालातीत — सबको समाहित करने वाला बताता है।
माण्डूक्य उपनिषद् में सिखाए अनुसार ओम् (ओंकार/प्रणव) के ध्यान का आधार बनता है।
समस्त सृष्टि को एक अविनाशी शब्द में एकीकृत कर, मन को एकत्व में शान्त करता है।
उपनिषद् की जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय — इन चार अवस्थाओं की शिक्षा का प्रारम्भ करता है।
ध्यान और वैदिक पाठ के आरम्भ में मन को ब्रह्म से जोड़ने हेतु पाठ किया जाता है।
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् जप विधि
मन को स्थिर करने हेतु पहले श्लोक का पाठ करें, फिर एकमात्र अक्षर 'ओम्' का धीरे-धीरे और बारम्बार उच्चारण करें, अ-उ-म इन तीनों ध्वनियों को खींचते हुए और प्रत्येक उच्चारण के पश्चात् आने वाले मौन में विश्राम करते हुए। श्लोक की शिक्षा के अनुसार चिन्तन करें कि जो कुछ भूत, वर्तमान, भविष्य है — और जो कालातीत है — वह यही एक अविनाशी ओम् है। उच्चारण को भेदों को एक शब्द में विलीन करने दें, जो ब्रह्म का प्रतीक है, और उससे खुलने वाली निस्तब्धता में स्थित हो जाएँ।