श्रीमद्भगवद्गीता १.२८ — कृपया परयाऽऽविष्टो
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✦ अर्थ
यह श्लोक अर्जुन के विलाप का आरम्भ करता है। अपने स्वजनों को युद्ध के लिए उत्सुक एकत्र देखकर गहन करुणा से भरे और शोक से अभिभूत अर्जुन श्रीकृष्ण से बोलने लगते हैं। यहीं से शोक का वह लम्बा प्रवाह आरम्भ होता है जिसमें अर्जुन अपने सम्बन्धियों से युद्ध की सम्भावना पर अपनी व्यथा व्यक्त करते हैं -- वही विषाद जो सम्पूर्ण गीता-उपदेश का कारण बनता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 28 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
प्रथम अध्याय 'अर्जुन विषाद योग' में, दोनों सेनाओं का निरीक्षण कर और अपने स्वजनों को पहचानकर अर्जुन करुणा और शोक से अभिभूत हो जाते हैं। संजय धृतराष्ट्र को सुनाते हैं कि किस प्रकार शोकाकुल अर्जुन श्रीकृष्ण को सम्बोधित करने लगे -- यही वह विलाप का आरम्भ है जो भगवान के गीता-उपदेश को प्रेरित करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
सन्तजन मानते हैं कि भगवान ने गीता का उपदेश अर्जुन को ठीक इसलिए दिया क्योंकि उनका हृदय करुणा से इतना भरा था -- यह सिखाते हुए कि दिव्य ज्ञान प्रेम से कोमल हुए हृदय में सबसे सहजता से प्रवाहित होता है, बशर्ते वह प्रेम सम्यक् ज्ञान से जुड़ा हो।
मंत्र
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अर्जुन उवाच कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्। दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥
arjuna uvācha dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam
अर्थ:संजय ने कहा -- अत्यन्त करुणा से अभिभूत और शोकाकुल अर्जुन ये वचन बोले -- हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से यहाँ उपस्थित अपने इन स्वजनों को देखकर...
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १.२८ — कृपया परयाऽऽविष्टो पाठ के लाभ
अर्जुन के कोमल, करुणामय हृदय को प्रकट करता है जो उन्हें उपदेश के योग्य बनाता है
साधक को स्मरण कराता है कि करुणा भले ही श्रेष्ठ हो, उसे ज्ञान का मार्गदर्शन चाहिए
भगवान के प्रति अर्जुन की हार्दिक प्रार्थना के आरम्भ का चिह्न है
दर्शाता है कि अपने ही लोगों के प्रति आसक्ति से किस प्रकार शोक उत्पन्न होता है
श्रीकृष्ण के उस उत्तर की भूमिका रचता है जो शोक को ज्ञान में बदल देता है
अपनी व्यथा को सच्चाई से भगवान के समक्ष रखने को प्रेरित करता है
श्रीमद्भगवद्गीता १.२८ — कृपया परयाऽऽविष्टो जप विधि
इस श्लोक को प्रथम अध्याय का अध्ययन करते समय पढ़ें और उस करुणा तथा शोक को अनुभव करें जो अर्जुन को श्रीकृष्ण से बोलते समय अभिभूत कर देता है। चिन्तन करें कि हृदय की सच्ची कोमलता, जब तक ज्ञान से प्रकाशित न हो, किस प्रकार भ्रम बन जाती है। इसे आगे के श्लोकों तक और अन्ततः द्वितीय अध्याय तक ले जाने दें, जहाँ भगवान अर्जुन के शोक का उत्तर मुक्तिदायक ज्ञान से देते हैं।
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