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श्रीमद्भगवद्गीता १.३१ — निमित्तानि च पश्यामि

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रथम अध्याय के अध्ययन के समय, चिन्तनशील प्रातःकालीन मनन में·📜 Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 31

अन्य नाम / खोज: nimittani cha pashyami · viparitani keshava · bhagavad gita 1.31 · gita 1 31 · arjuna sees ill omens · hatva svajanam ahave

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अर्थ

शोक और भय से अभिभूत अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि उन्हें केवल अपशकुन ही दिखाई दे रहे हैं, और युद्ध में अपने स्वजनों को मारने से कोई कल्याण होता नहीं दिखता। यह श्लोक उनकी गहराती निराशा और इस विश्वास को व्यक्त करता है कि ऐसी विजय से कोई वास्तविक हित नहीं हो सकता। यह उस विषाद का एक महत्त्वपूर्ण चरण है जिससे श्रीकृष्ण का मुक्तिदायक उपदेश आरम्भ होता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 31 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग में, दोनों ओर अपने स्वजनों को देखकर अर्जुन का संकल्प टूट जाता है। श्रीकृष्ण को केशव कहकर सम्बोधित करते हुए वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें केवल अमंगल शकुन दिखाई दे रहे हैं और अपने ही लोगों को मारने में कोई कल्याण नहीं। संजय इस बढ़ती निराशा को धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण के उपदेश की प्रस्तावना के रूप में सुनाते हैं।

शास्त्रों में वर्णित

टीकाकार कहते हैं कि वास्तविक कल्याण से रहित 'विजय' को न चाहना अर्जुन के उदात्त हृदय को दर्शाता है, और यही वास्तविक श्रेय की यह लालसा थी जिसका उत्तर श्रीकृष्ण ने गीता के अविनाशी ज्ञान को प्रकट करके दिया।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

निमित्तानि पश्यामि विपरीतानि केशव। श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥

nimittāni cha paśhyāmi viparītāni keśhava na cha śhreyo ’nupaśhyāmi hatvā sva-janam āhave

अर्थ:हे केशव! मैं अपशकुनों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ, और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर मुझे कोई कल्याण भी दिखाई नहीं देता।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

निमित्तानि🔊nimittāniशकुन; लक्षण; संकेत
🔊chaऔर
पश्यामि🔊paśhyāmiमैं देख रहा हूँ
विपरीतानि🔊viparītāniविपरीत; अमंगल; प्रतिकूल
केशव🔊keśhavaहे केशव (श्रीकृष्ण)
🔊naनहीं
🔊chaऔर; भी
श्रेयः🔊śhreyaḥकल्याण; हित; भलाई
अनुपश्यामि🔊anupaśhyāmiमैं देखता हूँ; मुझे आभास होता है
हत्वा🔊hatvāमारकर; वध करके
स्वजनम्🔊sva-janamअपने स्वजनों को
आहवे🔊āhaveयुद्ध में

श्रीमद्भगवद्गीता १.३१ — निमित्तानि च पश्यामि पाठ के लाभ

प्रभु के समक्ष संशय एवं आशंका की सच्ची स्वीकृति को प्रकट करता है

साधक को उन कार्यों पर प्रश्न करने को स्मरण कराता है जो कोई वास्तविक कल्याण (श्रेय) नहीं देते

दर्शाता है कि किस प्रकार आसक्ति विजय को भी खोखला बना देती है

श्रीकृष्ण द्वारा प्रिय (प्रेय) एवं श्रेय के भेद की भूमिका तैयार करता है

सांसारिक लाभ एवं स्थायी आध्यात्मिक हित के बीच विवेक को प्रोत्साहित करता है

अपने भय को श्रीकृष्ण के समक्ष रखने में अर्जुन की सच्चाई के प्रति सराहना को गहरा करता है

श्रीमद्भगवद्गीता १.३१ — निमित्तानि च पश्यामि जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रथम अध्याय के अध्ययन के समय, चिन्तनशील प्रातःकालीन मनन में

अध्याय एक का अध्ययन करते हुए इस श्लोक को पढ़ें, अनुभव करते हुए कि अर्जुन श्रीकृष्ण को केशव कहकर सम्बोधित करते समय किस आशंका से भरे हैं। इस अन्तर्दृष्टि पर मनन करें कि आसक्ति एवं शोक से प्रेरित कार्य से कोई वास्तविक हित ('श्रेय') नहीं हो सकता। इसे दूसरे अध्याय की ओर ले जाने दें, जहाँ श्रीकृष्ण क्षणिक सुख एवं आत्मा के स्थायी कल्याण के भेद का उपदेश देते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि उन्हें केवल अमंगल शकुन दिखाई दे रहे हैं और अपने ही स्वजनों को युद्ध में मारने से कोई कल्याण होता नहीं दिखता। यह उनके बढ़ते शोक और इस विश्वास को व्यक्त करता है कि ऐसे युद्ध से कोई वास्तविक हित नहीं हो सकता।
'केशव' श्रीकृष्ण का एक नाम है, जिसकी परम्परागत व्याख्या सुन्दर केशों वाले अथवा केशी दैत्य के संहारक के रूप में होती है। अर्जुन अपने संशय व्यक्त करते हुए भी श्रीकृष्ण को आदरपूर्वक सम्बोधित करते हैं, जो भ्रम के बीच भी प्रभु के प्रति उनके विश्वास को दर्शाता है।
'श्रेय' का अर्थ है वास्तविक हित या स्थायी कल्याण, जो केवल सुख या अल्पकालिक लाभ के विपरीत है। अर्जुन कहते हैं कि उन्हें युद्ध में कोई 'श्रेय' नहीं दिखता, यह वह विषय है जिसे श्रीकृष्ण आगे प्रिय (प्रेय) एवं वास्तविक हित (श्रेय) के भेद के उपदेश द्वारा विकसित करते हैं।

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